- जन प्रतिनिधि विकास का स्वप्न दिखाकर खोखले वादों के सहारे पहनते हैं जीत का ताज
- परीक्षितगढ़ की दुर्दशा आखिर कब तक होती रहेगी
- चुनावी समर में विकास के वादों की लगती है झडी
जनवाणी संवाददाता |
परीक्षितगढ़: रामायण एवं महाभारतकालीन नगरी परीक्षितगढ़ वर्षों से जन प्रतिनिधियों की उपेक्षा की शिकार है। परीक्षितगढ़ में दर्शकों से परीक्षितगढ़ पर्यटन, खरखाली गंगा घाट पर पुल, कन्या महाविद्यालय, परीक्षितगढ़ को तहसील बनाने का मुद्दा प्रमुखता से उठता चला आ रहा है।
विधानसभा चुनाव में परीक्ष्तिगढ़ में विकास कराने का जन प्रतिनिधि स्वप्न दिखाकर जीत जाते है और जीत का ताज सिर पर पहन लेते हैं। चुनाव जीतने के बाद जन प्रतिनिधि जनता से किए गए वादों को याद नहीं रखते चुनावी सरगर्मी के दौरान चुनावी मुद्दों के साथ वादे भी हवा हवाई हो जाते हैं। चुनावी मुद्दों को लेकर नगर के सामाजिक लोगों ने नगर के गांधारी सरोवर पर बैठक में चर्चा करते हुए जनवाणी संवाददाता से अपने विचार व्यक्त किए।

अखिल विद्या समिति अध्यक्ष विष्णु अवतार रूहेला का कहना है कि परीक्षितगढ़ महाभारत कालीन है। लेकिन चुनाव के दौरान नेता परीक्षितगढ़ में विकास कराने का वादा कर जीत तो हासिल कर लेते हैं, लेकिन जीतने के बाद जैसे चुनावी मुद्दों के साथ वादे भी गायब हो जाते हैं। महाभारत के वीर धनुर्धर अर्जुन के पुत्र वीर अभिमन्यु के पुत्र चक्रवर्ती सम्राट राजा परीक्षित की नगर 64 वर्ष राजधानी रही। पर्यटन विकास की दृष्टि से यह नगर कब का एक विकसित पर्यटन स्थल हो जाना चाहिए था। लेकिन आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है।
महिला परिषद अध्यक्ष पूनम रूहेला का कहना है कि चुनावी समर में नेताओं द्वारा विकास कराने की बौछार की जाती है। और तरह-तरह के विकास कराने का लालच देकर वोट हासिल कर लेते है। लेकिन परीक्षितगढ़ में वर्षों से बलिकाओं के लिए कन्या महाविद्यालय नहीं बन सका। परीक्षितगढ़ ऐतिहासिक नगरी का दुर्भाग्य है।
युवती स्वाति चौधरी ने कहा कि सरकार बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ पर जितना जोर दे रही है, लेकिन परीक्षितगढ़ दर्शकों से कन्या महाविद्यालय से वंचित है। लगभग 30 वर्षों से यह मुद्दा उठाया जा रहा है। छात्राओं को इंटर के बाद आगे पढ़ने के लिए यहां से दूर जाना पड़ता है। जिस कारण छात्राएं आगे पढ़ने से भी वंचित रह जाती है। महिलााओं के लिए पिंक बस का संचालन होना चाहिए।
संतराम सैनी बोले कि जन प्रतिनिधि चुनाव लड़ते हैं और जीत जाने के बाद वह लोगों से किए गए वादों को दर किनार कर देते हैं। केवल जनता की याद चुनाव समर में ही आती है। और विकास कराने के दम पर वोट हासिल करने का लक्ष्य प्राप्त करने के साथ विकास के मुद्दे गायब हो जाते है।
समाजसेवी चौधरी रामपाल सिंह का कहना है कि परीक्षितगढ़ में तहसील बनाने का मुद्दा उठता चला आ रहा है। परीक्षितगढ़ की जनता को विकास का इंतजार है। परीक्षितगढ़ नगरी अपनी गोद में महाभारतकालीन यादे संजोए हुए है। इसके बावजूद जन प्रतिनिध की अनदेखी के कारण यहां के बांशिदे मांग उठाते चले आ रहे हैं। चुनाव के दौरान मुद्दों का बाजार गर्म होता है। चुनाव समर के बाद मुद्दे कहीं भी नजर नहीं आते।
नंद किशोर पप्पू ने कहा कि क्षेत्र के युवा रोजगार के लिए भटकते फिरते हैं। ऐतिहासिक नगरी परीक्षितगढ़ व क्षेत्र में लघु उद्योग की मांग जनता वर्षों से करती आ रही है। चुनाव के दौरान नेता परीक्षितगढ़ में विकास कराने का जनता को स्वपन दिखाते हैं और जीत के बाद भूल जाते हैं।
समाजसेवी महिला रेखा सैनी कहती है कि नगर क्षेत्र में केवल प्राइवेट बसों का संचालन होता है। महिलाओं की सुरक्षा का कोई प्रबंध नहीं होता है। छात्राओं को आगे की शिक्षा ग्रहण करने के लिए बड़ी मुश्किलों से रूबरू होना पड़ता है। यह मुद्दा अनेकों बार उठाया जा चुका है। लेकिन जन प्रतिनिधियों से आश्वसन मिलता रहता है। समाधान आज तक नहीं हुआ है।
किसान सुभाष गुर्जर ने कहा कि क्षेत्र में खरखाली गंगा घाट पर सेतु निर्माण की मांग दर्शकों से हो रही है। यह चुनावी मुद्दा बनकर रह गया है। यह पुल बन जाए तो रोजगार के नए अवसर प्रदान व क्षेत्रवासियों को लाभ मिलेगा। चुनाव के बाद विकास के मुद्दे दम तोड़ देते हैं।
राजू गुुर्जर, राम अवतार गुुर्जर, महकार, अनिल गुप्ता, मोहिनी वर्मा, मा. जितेंद्र सिंह, महावीर, अमित वर्मा, रजनी अग्रवाल, बोबी आर्य ने चुनावी मुद्दों को लेकर विचार रखे।

