
जौ का पीला रतुआ
जौ का पीला रतुआ रोग पक्सीनिया स्ट्राईफॉर्मिस एफ स्पे होर्डाई नामक कवक से होता है।
रोग-लक्षण
पीला रतुआ का संक्रमण सर्दी के मौसम में प्रारम्भ होता है जब तापमान 10झ्र20 त्उ के बीच होता है और नमी प्रचुरता में उपलब्ध होती है। रोग के लक्षण संकरी धारियों के रूप में प्रकट होते हैं जिनमें पीले से संतरी पीले रंग के स्फॉट (पस्च्यूल्स) पत्ती के फलक, पत्ती आवरण, गर्दन और ग्लूम्स पर बनते हैं। तीव्र संक्रमण में यह पस्च्यूल्स बालियों और आॅन्स पर भी दिखाई दे सकते हैं। इसका अधिक प्रकोप होने से जौ की उपज मारी जाती है।
रोग-प्रबंधन
- -प्रतिरोधी/सहिष्णु किस्मों जैसे डीडब्ल्यूआरयूबी 52, डीडब्ल्यूआरबी 73, डीडब्ल्यूआरयूबी 64, डीडब्ल्यूआरबी 91 और डीडब्ल्यूआरबी 92 आदि की बुवाई करें।
- रोग के दिखाई देने के तुरंत बाद प्रोपिकोनाजोल 25 प्रतिशत ईसी @ 0.1 प्रतिशत या ट्रायडाइमफोन 50 प्रतिशत @ 0.1 प्रतिशत या टेबूकोनाजोल 9 प्रतिशत ईसी @ 0.1 प्रतिशत (1 मिली दवा प्रति लीटर पानी) का छिड़काव करें।
अनावृत कंडवा (लूज स्मट)
रोग-लक्षण
पूरा पुष्पक्रम (रैचिस को छोडकर) काले चूर्ण समूह वाली धूसर बाली में बदल जाता है। रोग अन्त: बीज जनित रोगजनक अस्टिलगो नुडा के कारण होता है और केवल फूल आने के समय ही प्रकट होता है। संक्रमित बालियों में नुकसान सौ फीसदी रहता है।
रोग-प्रबंधन
- अनावृत कंडवा के के लिए कार्बोक्सिन 75 प्रतिशत डब्ल्यू पी या कार्बेंडाजिम 50 प्रतिशत डब्ल्यू पी या कार्बोक्सिन 5प्रतिशत + थीरम 37.5 प्रतिशत डब्ल्यू एस. @ 2.0-2.5 ग्राम/किग्रा बीज से बीज उपचार करें।
- बीज को मई-जून के महीने में सौर उपचारित किया जा सकता है। बीज को चार घंटे के लिए पानी में भिगोकर 10-12 घंटे के लिए धूप में रख दें। इसके बाद बीजों को सूखी जगह पर भंडारित करें।
- खेत में संक्रमित बालियों को एकत्र करके करके खेत के बाहर जला दें।
आवृत कंडवा रोग
जौ का यह रोग अस्टीलैगो होर्डाई नामक कवक से होता है।
रोग-लक्षण
गहरे भूरे रंग के स्मट बीजाणु पौधों की पूरी बाली की जगह लेते हैं और बीजाणु पौधे की परिपक्वता तक एक पारदर्शी झिल्ली से घिरे रहते हैं। थ्रेसिंग से बीजाणु अलग होकर स्वस्थ बीज को संक्रमित कर देते हैं।
रोग-प्रबंधन
- आवृत कंडवा के लिए कार्बोक्सिन 5प्रतिशत + थीरम 37.5प्रतिशत डब्ल्यूएस @ 2.0-2.5 ग्रा/किग्रा बीज या टेबूकोनाजॉल 2 डीएस (2प्रतिशत डब्ल्यू/डब्ल्यू) से @ 1.5 ग्राम/किलोग्राम बीज से बीज उपचार करें।
- बीज को मई-जून के महीने में सौर उपचारित किया जा सकता है। बीज को चार घंटे के लिए पानी में भिगोकर 10-12 घंटे के लिए धूप में रख दें। इसके बाद बीजों को सूखी जगह पर भंडारित करें।
- खेत में संक्रमित बालियों को एकत्र करके करके खेत के बाहर जला दें।
पत्ती झुलसा या स्पॉट ब्लॉच
पत्ती झुलसा मुख्यत: बाइपोलारिस सोरोकिनियाना द्वारा उत्पन्न होता है।
रोग-लक्षण
स्पॉट ब्लॉच रोगजनक पौधों के सभी भागों यानी इंटरनोड्स, तना, नोड्स, पत्तियों, तुष, ग्लूम्स और बीज में रोग के लक्षण पैदा करने में सक्षम है। पत्तियों पर शुरूआती विक्षत छोटे, गहरे भूरे रंग के 1 से 2 मिमी लंबे विक्षत होते हैं जो बिना हरिमाविहीन परिधि के होते हैं। रोग सुग्राही किस्मों में यें धब्बें या विक्षत जल्दी बढकर हल्के भूरे से गहरे भूरे रंग के अंडाकार अथवा लम्बें ब्लोच्स में बदल जाते हैं जो पत्ती की झुलसा जैसा प्रतीत होते हैं। अनुकूल वातावरण में बालियां (स्पाइकलेट्स) संक्रमित हो जाती है जिससे दानों का आकार सिकुड़ जाता है।
रोग-प्रबंधन
- स्वस्थ रोगमुक्त फसल के लिए बुवाई हेतू स्वस्थ एवं रोगमुक्त बीज का चयन करें।
- कार्बोक्सिन 5प्रतिशत + थाइरम 37.5प्रतिशत के 2.5 ग्राम प्रति किग्रा बीज की दर से बीज उपचार करें।
सस्य क्रियाएं: फसल चक्र को अपनाना, सही मात्रा में उर्वरक विशेषत: नत्रजनयुक्त उर्वरक का प्रयोग व फसल अवशेषों, खरपतवारों एवं कोलेट्रल पोषक पौधों को नष्ट करें। संस्तुत बीज दर को अपनाए।
रोगरोधी किस्मों का प्रयोग: क्षेत्र विशेष के लिए संस्तुत स्पॉट ब्लोच प्रतिरोधी किस्मों की बुवाई करें।
पर्णीय छिडकाव: प्रोपिकोनाजोल या क्रेसोक्सिम-मिथाइल 3प्रतिशत एससी @ 0.1 प्रतिशत और मैनकोजेब 75 प्रतिशत डब्ल्यूपी @ 0.2 प्रतिशत के साथ पर्ण छिडकाव करके रोग प्रभावी ढंग से प्रबंधित किया जा सकता है।


