
धर्म को राजनीति में घुसा देने पर धर्म, धर्म नहीं रह जाता, वह भी राजनीति हो जाता है। भारत में धर्म को राजनीति में घुसा कर जनता को जनता से लड़ाने की साजिशें 1857 से ही जारी हैं। ऐसी परिस्थिति में बहुसंख्यक धर्म के गरीबों को बहुत ज्यादा खतरा है। राजनीति में धर्म को घुसा देना बहुसंख्यक धर्म के दलालों के हित में ही होता है। परंतु जो अल्पसंख्यक हैं, उनके लिए धर्म को राजनीति में घुसाना खतरे से खाली नहीं है। इसे अधिकांश अल्पसंख्यक बुद्धिजीवी समझता है। वह जानता है कि धर्म को राजनीति में घुसाने से अल्पसंख्यकों पर खतरा बढ़ जाता है। आज भारत का अल्पसंख्यक ज्यादा खतरा महसूस कर रहा है, खास तौर पर मुसलमान ज्यादा खतरा महसूस कर रहा है, उस पर हमले बढ़ रहे हैं, वह डरा हुआ है। इस डर से निकलने के लिए कुछ मुसलमान कांग्रेस की शरण में जाना चाहते हैं।