
किसी गांव में सज्जन नामक एक संत स्वभाव का व्यक्ति सुबह-शाम समुद्र के किनारे छटपटाती मछलियों को वापस समुद्र में डाल देता था। उसकी इस आदत का कई लोग मजाक उड़ाते थे। सज्जन ने कभी इसकी परवाह नहीं की। एक दिन जब वह मछलियों को वापस समुद्र में डाल रहा था, तो वहां एक साधू आए और सज्जन के पास आ कर बोले, ‘हे बालक, यह तुम क्या कर रहे हो?’ सज्जन विनम्रता से बोले, ‘हे महात्मा, समुद्र की तेज लहरों के साथ कई मछलियां किनारे आ जाती हैं और जल विहीन होकर तड़पने लगती हैं। उनका जीवन संकट में आ जाता है।
मैं अपनी यथाशक्ति उन मछलियों को वापस समुद्र की धारा में प्रवाहित कर उन्हें जीवन दान देता हूं।’ साधु बोले, ‘यह तो बड़ा ही अच्छा काम है, लेकिन समुद्र के किनारे तो ऐसी लाखों मछलियां हैं, तुम कितनों को बचा सकोगे?’ सज्जन ने कहा, ‘हे महात्मा, मैं सभी मछलियों को तो नहीं बचा सकता, लेकिन जितनों को बचा सकता हूं, उनके लिए मैं रोज ही यह काम करता हूं।’ साधु ने उसे आशीर्वाद देते हुए कहा, ‘हे सज्जन, तुम धन्य हो। तुम्हारी इच्छाशक्ति धन्य है। हम सभी को अपनी यथाशक्ति कार्य करना चाहिए। कार्य के स्वरूप या परिणाम की चिंता हमे कमजोर बना देती है। सुखी रहो।’ सज्जन फिर अपने काम में लग गया। काम करते हुए अनायास ही उसके मुख से ये पंक्तियां निकल पड़ीं, ‘माना की ना कर सके गुलजार हम इस चमन को, मगर जिस राह से गुजरे खार तो कुछ कम हुए।’


