नमस्कार, दैनिक जनवाणी डॉटकॉम वेबसाइट पर आपका हार्दिक स्वागत और अभिनंदन है। शारदीय नवरात्रि का पर्व इस वर्ष तिथियों की वृद्धि के कारण 10 दिनों तक मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार, सप्तमी तिथि दो दिन रहने के कारण नवरात्रि की अवधि में एक दिन की वृद्धि हुई है। 11 अक्तूबर से शुरू होने वाला यह पर्व 20 अक्तूबर को विजयादशमी और दशहरे के साथ संपन्न होगा। हालांकि, नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की ही पूजा-अर्चना की जाएगी।
पंचांग के मुताबिक, सप्तमी तिथि 17 अक्तूबर को सुबह 5 बजकर 54 मिनट से शुरू होकर 18 अक्तूबर को सुबह 8 बजकर 27 मिनट तक रहेगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब कोई तिथि लगातार दो दिनों तक सूर्योदय के समय विद्यमान रहती है, तो उसे तिथि वृद्धि कहा जाता है। इस बार इसी कारण नवरात्रि का पर्व सामान्य से एक दिन अधिक चलेगा।
नवरात्रि के पहले दिन कब होगी घटस्थापना?
नवरात्रि के प्रथम दिन घटस्थापना यानी कलश स्थापना का विशेष महत्व होता है। इसी के साथ नौ दिनों तक चलने वाली देवी आराधना की शुरुआत होती है। इस वर्ष प्रतिपदा तिथि के दौरान चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग का संयोग बन रहा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन परिस्थितियों में कलश स्थापना के लिए शुभ मुहूर्त का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
पंचांग के अनुसार, प्रतिपदा तिथि 10 अक्तूबर, शनिवार को रात 9 बजकर 19 मिनट से शुरू होकर 11 अक्तूबर, रविवार को रात 9 बजकर 30 मिनट तक रहेगी। 11 अक्तूबर को चित्रा नक्षत्र रात 10 बजकर 32 मिनट तक और वैधृति योग रात 9 बजकर 5 मिनट तक रहेगा। शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार, चित्रा नक्षत्र के शुरुआती दो चरणों को छोड़कर या अभिजीत मुहूर्त में घटस्थापना करना शुभ माना जाता है।
कलश स्थापना के शुभ मुहूर्त
नवरात्रि के पहले दिन श्रद्धालु निम्नलिखित मुहूर्त में घटस्थापना कर सकते हैं:
चौघड़िया मुहूर्त: सुबह 10 बजकर 4 मिनट से 11 बजकर 55 मिनट तक।
अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11 बजकर 32 मिनट से दोपहर 12 बजकर 18 मिनट तक।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शुभ मुहूर्त में कलश स्थापना करने से पूजा का विधिवत शुभारंभ होता है। श्रद्धालुओं को अपने स्थानीय पंचांग के अनुसार मुहूर्त की पुष्टि भी कर लेनी चाहिए।
हाथी पर सवार होकर आएंगी मां दुर्गा
इस वर्ष शारदीय नवरात्रि में मां दुर्गा का आगमन हाथी पर माना जा रहा है। धार्मिक मान्यताओं और देवी भागवत पुराण की परंपरा में हाथी को शुभता, शक्ति, स्थिरता, धैर्य और समृद्धि का प्रतीक माना गया है।
मान्यता है कि देवी का हाथी पर आगमन अच्छी वर्षा, कृषि की समृद्धि और सुख-शांति का संकेत देता है। इसी वजह से भक्त मां दुर्गा के आगमन को लेकर विशेष उत्साह और श्रद्धा रखते हैं।
मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की होगी पूजा
शारदीय नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना की जाती है। प्रत्येक स्वरूप का अपना धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है।
- मां शैलपुत्री: नवरात्रि के पहले दिन इनकी पूजा होती है। पर्वतराज हिमालय की पुत्री मां शैलपुत्री वृषभ पर सवार होती हैं। इन्हें स्थिरता और दृढ़ संकल्प का प्रतीक माना जाता है।
- मां ब्रह्मचारिणी: दूसरे दिन इनकी आराधना की जाती है। मां ब्रह्मचारिणी तपस्या, ज्ञान, वैराग्य और संयम की प्रतीक हैं।
- मां चंद्रघंटा: तीसरे दिन इनकी पूजा होती है। मान्यता है कि इनकी आराधना से भय दूर होता है और भक्तों को साहस मिलता है।
- मां कूष्मांडा: चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा की जाती है। इन्हें सृष्टि की रचयिता और आरोग्य, आयु तथा यश प्रदान करने वाली देवी माना जाता है।
- मां स्कंदमाता: पांचवें दिन इनकी आराधना होती है। भगवान कार्तिकेय की माता स्कंदमाता को वात्सल्य और संतान सुख की देवी माना जाता है।
- मां कात्यायनी: छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इनकी कृपा से दांपत्य जीवन में सुख और शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है।
- मां कालरात्रि: सातवें दिन इनकी पूजा होती है। मां कालरात्रि को नकारात्मक शक्तियों और अंधकार का नाश करने वाली देवी माना जाता है।
- मां महागौरी: आठवें दिन मां महागौरी की आराधना की जाती है। इन्हें पवित्रता, शांति और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
- मां सिद्धिदात्री: नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा होती है। मान्यता है कि इनकी कृपा से भक्तों को ज्ञान, आध्यात्मिक उन्नति और सिद्धियां प्राप्त होती हैं।
विजयादशमी के साथ होगा नवरात्रि पर्व का समापन
नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद विजयादशमी का पर्व मनाया जाता है, जिसे दशहरा भी कहा जाता है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।
इस वर्ष तिथियों की वृद्धि के कारण नवरात्रि का पर्व 10 दिनों तक चलेगा, लेकिन देवी के नौ स्वरूपों की पूजा की परंपरा पहले की तरह ही रहेगी। श्रद्धालु घटस्थापना के साथ पूजा शुरू कर नौ दिनों तक व्रत, आराधना और धार्मिक अनुष्ठान करेंगे तथा विजयादशमी के साथ पर्व का समापन होगा।

