Sunday, June 14, 2026
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गहरे सदमे में बीते थे नेहरू के अंतिम दिन

Nazariya 22


krishna pratap singhस्वतंत्रता संघर्ष के दौरान अपने जीवन के आठ साल, ग्यारह महीने और सात दिन अंग्रेजों की जेलों के बिताने वाले पं. जवाहरलाल नेहरू के बारे में जब भी चर्चा हो, उसमें यह जरूर कहा जाता है कि स्वतंत्रता के बाद वे 16 साल प्रधानमंत्री रहे और ‘आधुनिक भारत के निर्माता’ कहलाए। लेकिन उनके सदमे से भरे अंतिम (खासकर 1962 के चीनी हमले में अपमानजनक पराजय के बाद के) दिन कैसे बीते और 27 मई, 1964 को अपने निधन से पहले उन्होंने कितनी तकलीफें झेलीं, इस बाबत कम ही बात होती है। अलबत्ता, बीबीसी संवाददाता रेहान फजल ने दो साल पहले उनकी पुण्यतिथि पर प्रकाशित अपने एक लेख में लिखा था कि ‘1962 में चीन से हुई लड़ाई ने उनको तोड़कर रख दिया था और उसके सदमे से वे कभी उबर नहीं पाए।’ परिणाम यह हुआ कि ‘उनकी पुरानी शारीरिक ताकत, बौद्धिक कौशल और नैतिक चमक बीते दिनों की बात हो गई और वे निराश व थके हुए से दिखने लगे। उनके कंधे झुक गए और उनकी आंखें भी सोई-सोई सी दिखने लगीं। उनकी चाल में जो तेजी हुआ करती थी, वह भी लुप्त हो गई।’ इसी लेख में फजल ने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के तत्कालीन समाचार सम्पादक ट्रेवर ड्राइवर्ग के हवाले से बताया था कि ‘एक रात में ही नेहरू थके हुए, निराश और बूढे शख्स दिखने लगे। उनके चेहरे पर कई झुुर्रियां उभर आर्इं और उनका तेज हमेशा के लिए जाता रहा।’ 1964 आते-आते उनकी स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएं और गंभीर हो गर्इं। इसके बावजूद वे भुवनेश्वर में हो रहे कांगे्रस के वार्षिक सम्मेलन में भाग लेने गए। सम्मेलन के कार्यक्रम में आठ जनवरी, 1964 को उन्हें बोलना था। लेकिन इसके लिए पुकारे जाने पर वे उठे तो डगमगाकर सामने की तरफ इस तरह गिर पड़े कि उठ नहीं पाए। तब वहां उपस्थित उनकी पुत्री इंदिरा गांधी ने सम्मेलन के स्वयंसेवकों व नेताओं के सहयोग से उन्हें उठाया और संभाला। थोड़ी ही देर बाद डॉक्टरों ने जांच की तो पाया कि उनके शरीर का बायां हिस्सा पक्षाघात का शिकार हो गया है।

फिर तो गहरी चिंता के बीच सम्यक चिकित्सा के लिए उन्हें भुवनेश्वर स्थित राजभवन ले जाया गया। लेकिन डॉक्टरों की भरसक कोशिशों के बावजूद उन्हें इतना स्वास्थ्यलाभ नहीं हो सका कि वे सम्मेलन में अपना स्थगित भाषण दे सकें। 12 जनवरी को वे लस्त-पस्त से नई दिल्ली लौट आए तो डॉक्टरों ने उनसे कहा कि बेहतर होगा कि वे दोपहर में भी थोड़ी देर सोने की आदत डाल लें। आम तौर पर वे रोजाना 17 घंटे काम करते थे। दोपहर में सोने के लिए उन्हें इनमें पांच घंटों की कटौती करनी पड़ी। उन्हें इसका लाभ भी मिला। 26 जनवरी तक उनका स्वास्थ्य इतना सुधर गया कि वे गणतंत्र दिवस समारोह में सुभीते से भाग ले पाए। लेकिन जल्दी ही उनकी शक्ति फिर क्षीण होने लगी, जिसके चलते फरवरी में आयोजित संसद के उस साल के पहले सत्र में वे बैठे-बैठे ही भाषण देने को विवश हुए।

फिर भी उन्होंने आत्मविश्वास नहीं खोया और गर्मियों तक इतनी शक्ति संचित कर ली कि किसी का सहारा लिए बिना सामान्य दिनचर्या निपटा सकें। यह उनका आत्मविश्वास ही था कि अपने निधन से महज पांच दिन पहले 22 मई को एक संवाददाता सम्मेलन में (जो उनके जीवन का अंतिम संवाददाता सम्मेलन सिद्ध हुआ) पत्रकारों के बार-बार ‘नेहरू के बाद कौन?’ पूछने पर उन्होंने उन्हें झिड़कते हुए से कह दिया था कि ‘मैं इतनी जल्दी मरने वाला नहीं हूं।’ लेकिन दबे पांव आई मौत ने उनके इस दावे को गलत सिद्ध करके ही दम लिया। उक्त संवाददाता सम्मेलन के अगले दिन वे बेटी इंदिरा के साथ छुट्टी मनाने देहरादून चले गए और 26 मई को लौटे तो जरूरी कामकाज निपटाकर नींद की गोली खाई और सो गए। लेकिन सुबह आंखें खुलीं तो पाया कि उनकी पीठ में बहुत दर्द है।

कुछ देर बाद उन्होंने इस बाबत एक सेवक को बताया। लेकिन उससे सूचना पाकर डॉक्टर उनके पास पहुंचे तो उनकी हालत गंभीर हो गई थी। उनका अपने पर नियंत्रण खोता जा रहा था और वे कुछ दिग्भ्रमित से हो चले थे। जब तक डॉक्टर कोई उपचार करते, वे बेहोश हो गए। बाद में पता चला कि उनकी बड़ी धमनी फट गई है और प्राणरक्षा के लिए उन्हें फौरन खून चढ़ाना पड़ेगा। लेकिन जब तक खून चढ़ाया जाता, वे कोमा में चले गए। कुछ रिपोर्टों के अनुसार इसी बीच उन्हें एक और पक्षाघात हुआ, जिसके बाद हृदयाघात से भी गुजरना पड़ा। इसके बाद उन्हें होश में लाने का कोई भी चिकित्सीय उपाय कारगर नहीं सिद्ध हुुआ और कोमा में ही दोपहर बाद एक बजकर चवालीस मिनट पर उन्होंने अंतिम सांस ले ली। आकाशवाणी ने दोपहर 2 बजकर 5 मिनट पर देश को यह उनके निधन की खबर दी तो पूरे देश में शोक की लहर छा गई। अवध के एक लोककवि ने इसे इस रूप में याद किया: मई माह तारीख सताइस सन चांैसठ कै काल, दिनवां बुुद्धवार कै झुकति रही दुपहरिया, डगरिया नेहरू स्वर्ग की धरे।

चूंकि उस दिन गौतम बुद्ध की जयंती थी, इसे इस रूप में भी देखा गया कि जिस दिन को बुुद्ध ने इस संसार में अपने आने के लिए चुना था, उसे ही नेहरू ने अपने महाप्रयाण के लिए चुना। फिर तो एक कवि के अनुसार ‘हिला हिमालय, पिघला पत्थर, मचिगै हाहाकार’ जैसी स्थिति पैदा हो गई और ‘भीर भई दिल्ली मां भारी खबर पाइ ओंकार’। गौरतलब है कि उन्होंने वसीयत कर रखी थी कि उनकी अन्त्येष्टि में किसी भी धार्मिक रीति रिवाज का पालन न किया जाए, लेकिन 29 मई को वह हिंदू रीति से ही सम्पन्न की गई। वैदिक मंत्रोच्चार और ‘द लास्ट पोस्ट’ के बिगुलवादन के बीच उनके 17 साल के नाती संजय गांधी ने उन्हें मुखाग्नि दी।


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