Tuesday, September 21, 2021
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Homeसंवादजनतंत्र के खिलाफ नया हथियार!

जनतंत्र के खिलाफ नया हथियार!

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यह साफ होता जा रहा है कि हुक्मरानों के लिए अपने आप को किन्हीं वक्रोक्तियों के सहारे या किसी अंतर्राष्ट्रीय षडयंत्र का हवाला देते हुए या अन्य कोई ऐसी बात छेड़ कर छिपना मुमकिन नहीं होगा। अब स्पायवेयर का मसला, जिसके चपेट में अलग-अलग मुल्कों के पत्रकार, एक्टिविस्टस, राजनेता आते दिखे हैं, दुनिया भर में सुर्खियां बनी हैं। भारत-जो विश्वगुरू होने का दावा करता है-के हुक्मरानों की बेचैनी बढ़ाने वाला मसला यह भी है कि इस मसले पर कम से कम विश्व मीडिया के निगाहों में अपने आप को सऊदी अरब, हंगेरी, कजाकिस्तान, रवांडा आदि मुल्कों की कतार में पा रहा है, जहां हुकमती ताकत का इस्तेमाल गलत कारणों के लिए किए जाने के आरोप अक्सर लगते हैं, और जिनकी जांच भी नहीं होती। आने वाले दिनों में, सप्ताहों में भारत की सरकार क्या कदम उठाती है, इसकी तरफ दुनिया की निगाह लगी रहेगी। यह हकीकत कि इस डिजिटल युग में कोई भी व्यक्ति अपने मोबाइल या पर्सनल कंप्यूटर के जरिए इस किस्म के स्पायवेयर हमले का शिकार हो सकता है, जो उसकी निजी आजादी, सुरक्षा, निजता को खतरे मे डाल सकता है, किसी आपराधिक/आतंकी गतिविधि में उसे फंसाया जा सकता है, जिंदगी भर के लिए उस पर लांछन लगाया जा सकता है और जिसकी परिणति उसकी मौत में भी हो सकती है, इस संभावना के प्रगट होने के बावजूद इससे कोई गुस्सा नहीं पनपता दिखा था।

बमुश्किल दो साल पहले प्रख्यात सउदी अरब पत्रकार और सऊदी अरब सरकार के आलोचक जमाल खशोगी की इस्तंबुल स्थित सऊदी कान्सुलेट में ही हत्या की गई थी, इसमें भी स्पायवेयर का प्रयोग करने के आरोप लगे थे। टोरोन्टो विश्वविद्यालय में बनी सिटिजन लैब जैसी संस्थाओं में सर्विलांस तकनीक पर अनुसंधान का काम तेजी से आगे बढ़ा था और अपने रिसर्च में उन्होंने पाया था कि किस तरह दर्जनों पत्राकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के खिलाफ स्पायवेयर का प्रयोग किया जा रहा है। लेकिन जासूसी सॉफ्टवेयर के माध्यम से किसी को भी फंसा सकने की इस संभावना पर, इस अलग किस्म के साइबर हथियार के इस्तेमाल पर मौन बना रहा।

पेगासस प्रोजेक्ट के खुलासे के बाद अब उम्मीद की जा सकती है चीजें निश्चित ही वैसी नहीं बनी रहेंगी। इस मामले में हो रह खुलासों के पीछे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक ऐसे सहयोग की कहानी है, जिसे लंबे समय तक याद रखा जाएगा। दस मुल्कों के 17 मीडिया संस्थानों के 80 पत्रकारों की साझी कोशिशों के चलते ही यह सब उजागर हो पा रहा है, जिन्होंने मोबाइल फोन पर हुए स्पायवेयर हमले की जांच के लिए उनकी फोरेंसिक जांच करने, उन तमाम लोगों से संपर्क करने जिनके फोन इस हमले के चपेट में आए हैं या लीक हुई डाटाबेस में शामिल पाए गए हैं, काफी मेहनत की है और इसके लिए जबरदस्त जोखिम उठाया है। उनके इस संगठित प्रयासों का समन्वय ‘फॉर्बिडन स्टोरीज’ नामक बिना लाभ के चलने वाली सामाजिक संस्था ने किया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकार कार्यों के लिए मशहूर एमनेस्टी इंटरनेशनल ने उसके लिए तकनीकी सहयोग प्रदान किया।

इन खुलासें के परिणामों का-जिसके तहत इस्त्राइल की एक कंपनी एनएसओ, विवादों के घेरे में है, जो स्पायवेयर के काम में दुनिया भर में सक्रिय है और जिसके इस्राइल की सरकार के साथ करीबी संबंध बताए जाते हैं-अभी पूरा आकलन भी नहीं हो सका है। सोचने की बात है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र कहलाने वाले मुल्क में उसके नागरिकों की सर्विलांस काम किसी विदेशी कंपनी के तहत हो-जैसे कि प्रमाण पेश किए जा रहे हैं -और खुद भारत की संसद भी इससे अनभिज्ञ हो, तो यह भारत के जनतंत्र की गुणवत्ता, यहां के नागरिकों की निजी आजादी के बारे में किन निष्कर्षों तक पहुंचाता है।

और एक महत्वपूर्ण बात यह है कि खुद एनएसओ ने अपने पेगासस सॉफ्टवेयर को इस कदर स्मार्ट बनाया है कि अब दुनिया भर का कोई भी स्मार्टफोन उसके चपेट में आ सकता है, भले ही उसका वाहक स्पायवेयर के मामले में बहुत सतर्क हो। पहले होता यह था कि जिस फोन में वह इस जासूसी साफटवेयर डालना चाहता है, उसके वाहक को कोई लिंक या कोई मैसेज क्लिक करना होता था, अब उसकी भी जरूरत नहीं रह गई है। वह बिना आप के कुछ किए आप के फोन में पहुंच सकता है। जांच महज औपचारिक बन कर रह जाएगी, यह इस बात से भी प्रमाणित होता है कि स्पायवेयर-जिसे खुद इस्त्राइली सरकार हथियार मानती है और इसी की वजह से ऐसा स्पायवेयर बेचने के लिए संबंधित देश के प्रधानमंत्री/राष्टÑपति/ग्रहमंत्री आदि की सहमति अनिवार्य मानी जाती है।

एक क्षेपक के तौर पर यह भी बताना मौजूं होगा कि दुनिया भर में कमसे 500 निजी कंपनियां हैं, जो ऐसे स्पायवेयर के निर्माण में लगी हैं, जिन्हें वह दमनकारी हुकूमतों को बेचती हैं जिसके जरिए यह सरकारें अपने ही नागरिकों का उत्पीड़न करती हैं। ध्यान रहे कि एनएसओ ने हमेशा ही इस बात को रेखांकित किया है कि वह इस सॉफ्टवेयर को सरकारों को ही बेचती है, जो ‘अपराध और आतंकवाद’ से लड़ रहे हैं। बिना संबंधित राष्टÑ के प्रमुखों की अनुमति मिले उस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल उस देश में नहीं हो सकता।

यह भी सोचना अजीब लग सकता है कि झारखंड में सुरक्षा बलों के कथित दमन का खुलासा करने वाले, आदिवासियों पर हो रहे अत्याचारों को जुबां देने वाले स्थानीय पत्राकार रूपेश कुमार सिंह, उनकी पत्नी/पार्टनर तथा उसकी बहन के फोन में किसी विदेशी मुल्क की अचानक रूचि जाग्रत हो उठेगी, जिनके नाम भी पेगासस प्रोजेक्ट में पाए गए हैं। अपनी निजता का उल्लंघन करने तथा उनकी व्यक्तिगत आजादी को खतरे में डालने के मनमानेपन के खिलाफ पत्रकार ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने का निर्णय लिया है।

राजनेताओं, राजनीतिक पार्टियां, पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और सरोकारों से लैस आम नागरिकों द्वारा यही मांग बुलंद की जा रही है कि सरकार इस मामले में जांच बिठा दे। प्रेस क्लब आफ इंडिया द्वारा इस मामले में दिया गया बयान तमाम लोगों के सरोकारों को आवाज देता दिखता है, जिसमें उसने इस बात को रेखांकित किया है कि ‘इस मुल्क के इतिहास में पहली दफा जनतंत्र के सभी खंभों-न्यायपालिका, सांसद, मीडिया और मंत्रियों की-जासूसी की गई है, जो अभूतपूर्व है और उसकी जबरदस्त भर्त्सना की जानी चाहिए।’ बयान यह भी बताता है कि किस तरह एक ‘विदेशी एजेंसी को-जिसे मुल्क के राष्टीय हित के साथ कोई सरोकार नहीं है-उसे नागरिकों की जासूसी के लिए तैनात किया गया।’


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