Saturday, January 22, 2022
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कागज रहित होतीं अदालतें

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पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड ने कोच्चि में केरल हाईकोर्ट के ई-फाइलिंग, पेपरलेस कोर्ट और ई-आफिस प्रोजेक्ट का उद्घाटन किया। मालूम हो कि अदालतों की कार्यप्रणाली को विकेंद्रित करने की दिशा में ई-फाइलिंग और पेपरलेस कोर्ट बड़े कदम हैं। बता दें कि इससे न्याय तक त्वरित पहुंंच, पूर्ण पारदर्शिता के साथ लोगों के लिए न्याय सुलभ होगा। साथ ही इसमें जनशक्ति और प्राकृतिक संसाधनों की भारी बचत भी होगी। खुशी की बात है कि केरल उच्च न्यायालय पहला पेपरलेस कोर्ट बनने की ओर बढ़ चला है।
विदित हो कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट सहित बहुत सी अदालतों में ई-फाइलिंग की सुविधा पहले से ही मौजूद है। यही वजह था कि लॉकडाउन के दौरान उच्चतम न्यायालय ने सभी आपात मामलों की सुनवाई के लिए वर्चुअल कोर्ट का सहारा लिया और विडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अनेकों मामलों की सुनवाई भी की। यहां तक कि देश की अधिकतर निचली अदालतों में भी लॉकडाउन के समय आॅनलाइन सुनवाई करने पर जोर दिया गया था। सवाल है कि क्या आपदा के समय ही ई-फाइलिंग, ई-कोर्ट अर्थात पेपरलेस कोर्ट आदि की जरूरत होती है। जवाब है, बिल्कुल नहीं। यही वजह है कि अब न्यायिक प्रक्रिया में सुधार को गति देने बाबत कार्य प्रारंभ कर दिया गया है, और इसका उदाहरण केरल उच्च न्यायालय हमारे सामने है।

पेपरलेस कोर्ट जैसा कि नाम से ही पता चलता है कि एक अदालत है, जो भौतिक कागज के बिना काम करती है, जहां सभी न्यायाधीश डिजिटल अदालत के रिकॉर्ड पर भरोसा करते हैं और अदालत की कार्यवाही को सुविधाजनक बनाने के लिए टैक्नोलॉजी का उपयोग करते हैं। बता दें कि पेपरलेस कोर्ट बनाने की प्रक्रिया के पहले चरण में कोर्ट रूम को स्मार्ट कोर्ट में बदला जाता है। फिर इन अदालतों में वकीलों को केस की फाइलें उनके सामने लगे कंप्यूटर स्क्रीन पर उपलब्ध कराई जाती है। साथ ही दस्तावेजों की प्रतियां विरोधी पक्ष और न्यायाधीश के सामने रखे कंप्यूटर पर देखी जा सकती हैं। सिस्टम में वकीलों को अदालत में पेश होने और अपने साथ केस फाइल लाए बिना बहस करने की अनुमति होती है।
बहरहाल, हम सबने कोरोना काल में देखा था कि कैसे ई-कोर्ट काम कर रहे थे। बता दें कि ई-कोर्ट के लिए एक वीडियो एप मोबाइल जारी किया गया था, जिसके माध्यम से अधिवक्ता घर बैठे ही अपने आवेदन टाइप करके भेजते थे। फिर न्यायालय द्वारा स्वीकृत मिलने पर सीधे तौर पर अधिवक्ता के साथ जुड़कर आगे की कार्रवाई होती थी। ऐसी व्यवस्था की जरुरत सालों लंबित पड़े मामलों के निपटान के लिए सदैव से महसूस की जा रही थी, क्योंकि धीमी न्याय व्यवस्था का समाज पर बहुत बुरा असर पड़ता है। लेकिन इस आपदा ने भारत के न्याय तंत्र में माकूल परिवर्तन करने पर विवश कर दिया था, जिसकी वजह से आज त्वरित न्याय की परिकल्पना साकार होने की ओर बढ़ रही है, जिसका उदाहरण हमारे सामने पेपरलेस कोर्ट और ई-कोर्ट के रुप में आ रहे हैं। उल्लेखनीय है कि भारत में अदालतें सालाना लगभग ग्यारह मिलियन कागज इस्तेमाल करती हैं। पेपरलेस सुनवाई होने से हर वर्ष अदालतों में इस्तेमाल होने वाले करीब 110 करोड़ कागजों की बचत होगी। इससे न केवल वृक्षों का संरक्षण होगा बल्कि देश में कार्बन का फैलाव भी रुक सकेगा। साथ ही सरकारी बजट की बचत भी होगी। आज की परिस्थिति में आॅनलाइन सुनवाई और पेपरलेस कोर्ट के फायदों को अनदेखा नहीं किया जा सकता। क्योंकि त्वरित न्याय के साथ अगर पर्यावरण संरक्षण को भी साथ लेकर चलेंगे तो यह सोने में सुहागा की तरह ही होगा।

बता दें कि हमारे देश के न्यायालयों में करोड़ों मामले आज भी लंबित पड़े हैं। एक अनुमान के अनुसार अगर हमारे न्यायाधीश प्रत्येक घंटे सौ मामले भीे निपटाए तो भी सभी मामलों को निपटाने में लगभग पैंतीस साल का एक लंबा समय लगेगा। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के मुताबिक, देशभर के न्यायालयों में सितंबर 2021 तक में लंबित मामलों की संख्या 4.5 करोड़ से ज्यादा थी। इसमें अधीनस्थ न्यायालयों में 87.6 फीसदी मामले लंबित पाए गए, वहीं उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों का आंकड़ा 12.3 प्रतिशत रहा।
अगर राज्य स्तर पर देखें तो राजस्थान उच्च न्यायालय में ही 11530 मामले ऐसे हैं जो 20 वर्ष या इससे अधिक समय से लंबित चल रहे हैं। लेकिन लंबित मामले तो एक तथ्य है। विशेष वजह तो न्यायालयों में न्यायधीशों की कमी है। राजस्थान हाईकोर्ट में ही न्यायाधीशों के बाइस पद रिक्त हैं। वहीं जिला एवं अधिनस्थ न्यायाधीशों के भी 273 पद खाली पड़े हैं। चिंता की बात है कि ऐसे में त्वरित न्याय की कल्पना कैसे संभव होगी।
गौरतलब है कि संविधान के अनुच्छेद 348 में स्पष्ट कहा गया है कि उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के कामकाज की भाषा अंग्रेजी होगी। यही भाषाई संकट है, जिसके कारण लोग स्वयं को अदालतों में असहाय महसूस करते हैं और सोचते हैं कि अदालत का मुंह न ही देखना पड़े तो अच्छा है। सदैव से यह मांग की जाती रही है कि अदालतों के कामकाज की भाषा ऐसी हो जिसे आम आदमी भी समझ सके और उसे हर बात के लिए वकीलों पर निर्भर न रहना पड़े। अक्सर ऐसा होता है कि मुवक्किल को यह भी पता नहीं चल पाता कि उसका वकील उसका पक्ष रखने के लिए अदालत के सामने क्या तथ्य अथवा बात रख रहा है।

इसलिए आज देश के लोगों की मांग है कि आजाद और लोकतांत्रिक देश में अदालती कामकाज की भाषा अंग्रेजी न होकर हिन्दी और अन्य भाषाएं हों। क्या अंग्रेजी भाषा को साथ लेकर पेपरलेस अदालतों की ओर बढ़ने से लोगों को न्यायिक फैसला सुनने, समझने और पढ़ने में बड़ी कठिनाईयों का सामना नहीं करना होगा? इसलिए सबसे पहले इस बात पर देनी होगी कि कैसे हिंदी भाषा में फैसला लोगों तक पहुंचाया जाए। अगर ऐसा संभव नहीं बनाया गया तो पेपरलेस कोर्ट की अवधारणा जन-मानस में लोकप्रियता हासिल नहीं कर सकेगी।


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