Thursday, April 25, 2024
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अभिभावक पक्षपाती रवैया अपनाने से बचें

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BALWANI


बड़ा भाई होने के नाते तुम्हें अधिक समझदार होना चाहिए था, पर है विपरीत। तुम बड़े हो तुम्हें समझदारी से काम लेना चाहिए था। अगर तुम्हारा छोटा भाई भी तुम्हारे जैसा नासमझ होता तो क्या होता? अपने भाई से क्यों नहीं कुछ सीखते , उसके जैसा बनने की कोशिश क्यों नहीं करते ?…आदि आदि कुछ ऐसे वाक्य हैं, जो अक्सर घरों में अभिभावकों की ओर से सुनने को मिलते रहते हैं। जब तक इस प्रकार के उलहाने अपने ही परिवार में दिए या सुने जाते हैं, वहां तक तो समझ आता है। पर जब इसी प्रकार की बच्चों के बीच भेदभाव करने वाली बातें आस-पड़ोस के लोगों या फिर दोस्त मित्रों के सामने की जाने लगती हैं तो बच्चे इन्हे गंभीरता से लेते हैं और इसे एक तरह से अपने आत्मसम्मान पर चोट के रूप में देखते हैं।

मन में ऐसा सोचने की बात तो ठीक है लेकिन जब उनकी बातों, भावनाओं और क्रियाकलापों में उनका पक्षपाती रवैया साफ झलकता है तो इससे बच्चे बहुत आहत महसूस करते हैं। कई बार तो अभिभावक एक बच्चे के प्रति बेहद नम्र तथा कोमल तो दूसरे के प्रति बहुत कठोर व्यवहार करते हैं। उसके सामने वह दूसरे बच्चों की आलोचना करते हैं और इस तरह हर समय उपेक्षित होने वाला बच्चा, अपने माता पिता के प्रति भी अपनी विपरीत धारणा बना लेता है। इसमें दोनों बच्चों के बीच होड़ और ईर्ष्या की भावना पैदा हो जाती है। हर समय अपेक्षा और पेरेंट्स के पक्षपात पूर्ण रवैया का शिकार बच्चा गुस्सैल और निराशा व्यक्तित्व वाला हो जाता है। जिसका उसकी बाद की जिंदगी पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यही नकारात्मकता उसके व्यक्तित्व पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं, जो बच्चे के व्यक्तित्व विकास में एक बड़े अवरोधक का काम करता है।

सामान्यत: ऐसे बच्चे हीन भावना का शिकार हो जाते हैं। यदि आप भी अपने बच्चों के बीच भेदभाव करते हैं और आपको अपने बच्चों पर इस भेदभाव के गंभीर भावात्मक प्रभाव देखने लगे हैं तो तुरंत संभल जाएं। क्योंकि यह वह स्थिति है जब आपके पक्षपातपूर्ण रवैया के शिकार बच्चों को नहीं बल्कि आपको काउंसलिंग की ज्यादा जरूरत होगी।

नकारात्मक टिप्पणियां
तुम मेरे नाम पर बट्टा लगाओगे या फिर तुम तो हमारा नाम डुबो दोगे या तुम किसी काम के नहीं हो हमारी नाक कटवाओगे। बच्चों में बच्चों के विषय में इस तरह के नकारात्मक टिप्पणियां, उन्हें अपनी नजरों में गिरा देते हैं। ऐसे बच्चे अक्सर गुस्सैल और आक्रमक होते हैं । ऐसे बच्चे हताशा और निराशा में नशे की गिरफ्त में आसानी से आ जाते हैं। ऐसे में पढ़ाई में पिछड़ना भी स्वाभाविक ही हैं ।

बच्चों का अति समर्थन से बचें
अक्सर देखा गया है कि कई बार पेरेंट्स अपने पक्षपातपूर्ण रवैए के चलते, एक बच्चे की त्रुटिओं को नजरंदाज कर, उसका अति समर्थन करना आरंभ कर देते हैं। ऐसा में बच्चा निंदक या चुगलखोर बन जाता है। प्राय: परिवारों में देखा गया है कि ज्यादा प्यारा बच्चा, घर के हर सदस्य को एक दूसरे की बात बताता है, जिससे घर में कलह का वातावरण बन जाता है। इससे बच्चे के व्यक्तित्व में नकारात्मक गुणों जैसे दूसरों की निंदा करना का विकास होता है जो उसके भविष्य को असुरक्षित बना सकता है।

बुजुर्गों की सलाह पर गौर करें
अपने ही हाथ की पांचों उंगलियां एक समान नहीं होती तो बताइए एक ही अभिभावक के सभी बच्चे एक समान कैसे हो सकते हैं? हर बच्चा दूसरे से अलग होता है। ऐसा प्रकृति ने उसे बनाया। माता- पिता को भी बच्चों के स्वभाव और उसकी प्रवृत्ति के अनुसार उसके साथ पेश आना चाहिए। यदि कोई परिवार के बड़े बुजुर्ग या शुभचिंतक आपको इस विषय में सलाह या चेतावनी दें तो उनकी बात ध्यान से सुननी चाहिए और समझना चाहिए कि किस तरह आप एक बच्चे की अनजाने में ही उपेक्षा करके उसे अपना विरोधी बन रहे हैं। ऐसे बच्चों के लिए उनके अभिभावक ही उन्हे अपने शत्रु नजर आने लगते हैं। उन्हे उनकी अच्छी बातें भी नही भाती है।

अपने ही बच्चों को एक दूसरे का प्रतिद्वंदी न बनाएं
माता पिता का बच्चों के बीच तुलात्मक व्यवहार बच्चों के बीच आपसी होड़ या प्रतिद्वंद्ता का कारण बन सकता है। इससे उनके बीच धीरे-धीरे प्यार की जगह ईर्ष्या और शत्रुता ले लेती है। बच्चों में होड़ पैदा करने की बजाय आपसी प्रेम और सहयोग की भावना पैदा करने की कोशिश की जानी चाहिए। उन्हें एक दूसरे की मदद करना, साथ खेलने और घर परिवार की समस्याओं पर बातचीत करने के लिए प्रेरित करना चाहिए ताकि वे जिम्मेदार बनने के साथ ही आने वाले जीवन में मजबूत संबंध विकसित कर सकें।

बच्चों के बीच पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने के पीछे अक्सर पेरेंट्स यह तर्क देते हैं कि वह कमजोर का पक्ष लेते हैं, जो बड़ा ही हास्यपद लगता है। क्योंकि अभिभावक कमजोर का नहीं, बल्कि उसको कमजोरी का पक्ष लेकर उसे और ज्यादा कमजोर बना देते हैं। क्योंकि जो पहले से पढ़ाई में अच्छा है उसे भी उतने ही प्यार और सहयोग की जरूरत है। यदि एक बच्चा अपने आप को उपेक्षित महसूस करता है तो उसे प्यार से समझाएं कि दूसरे बच्चे को आपके ज्यादा सपोर्ट की जरूरत है।                                                                           -राजेंद्र कुमार शर्मा


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