Tuesday, May 19, 2026
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परिवर्तन संसार का नियम है 


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श्रीप्रकाश शर्मा

किसी उपवन में पुष्प की कली के प्रस्फुटन और इस धरती पर एक शिशु के प्रादुर्भाव के बारे में यदि कभी संजीदगी से सोचें तो यह सत्य समझते देर नहीं लगती है कि ये दोनों कोई सामान्य कुदरती घटनाएं नहीं हैं। इन दोनों घटनाओं की कोख में दुनिया की धारणीयता के भ्रूण छुपे होते हैं। कलियों के प्रस्फुटन में महज एक फूल के समग्र जीवन-चक्र का रहस्य ही नहीं छुपा होता है, बल्कि इसमें कायनात के समस्त जीवों, प्राणियों और पादपों के अस्तित्व की निरंतरता का सत्य भी जीवित हो उठता है। किसी कली से पुष्प और शिशु से मानव-निर्माण की प्राकृतिक प्रक्रिया में एक सर्वाधिक सारगर्भित और कालजयी दर्शन जो हमारे सामने उजागर होता है, वो यह है कि इस नश्वर संसार में परिवर्तन एक शाश्वत और चिरंतन नियम है, जिसे कोई भी झुठला नहीं सकता है।

संपूर्ण सृष्टि में अपरिहार्य तब्दीलियों के शाश्वत चक्र से कोई भी शख्स खुद को महफूज नहीं रख सकता है। प्रकृति में शाश्वत परिवर्तनों का दौर चलता रहता है। उगते सूर्य के साथ संसार के हर प्राणी में जीवन का संचार शुरू होता है तो डूबता सूर्य यह संदेश दे जाता है जो आज अस्तित्व में है वह कभी-न-कभी विनाश को प्राप्त होगाक नील गगन में उगते और चढ़ते सूर्य को शाम में अपने ढलने की बारी की प्रतीक्षा करनी होती है। नूतन चीजें समय के साथ पुरातन बन जाती हैं, वर्तमान भूत बन जाता है और भूत के गर्भ से भविष्य जन्म लेने की प्रतीक्षा करता रहता है। समस्त संसार में जीवन के साथ मृत्यु का चक्र महज परिवर्तन के इस अमूल्य संदेश को उजागर कर जाता है कि इस दुनिया में स्थायी कुछ भी नहीं है। कालजयी कुछ भी नहीं है। सब कुछ क्षणभंगुर है, नश्वर है।

शून्य से शिखर, शिखर से शून्य और जन्म से मृत्यु और पुन: जन्म-ब्रह्मांड में परिवर्तनों का दौर अबाध गति से चलता रहता हैक परिवर्तनों के इस चक्र से समय भी अछूता नहीं रहता है। वक़्त का हर लम्हा अपनी रफ़्तार से निरंतर गुजरता जाता है। जो चीज थोड़ी देर पहले थी अभी नहीं है, जो अभी है थोड़ी देर बाद नहीं रहेगी। अर्थात इस दुनिया में कुछ भी शाश्वत नहीं है, कुछ भी स्थायी नहीं है। लिहाजा सबसे स्थायी शै परिवर्तन ही है।

लेकिन दुर्भाग्यवश हर व्यक्ति अपने जीवन में परिवर्तनों से घबराता है। अपनी मां के उदर में नौ महीनों के बाद जन्म के समय एक शिशु के रुदन में यही संदेश छुपा होता है कि मानव को परिवर्तन पसंद नहीं होता है, वह परिवर्तनों से घबराता है। वह जीवन को एक ढर्रे पर जीना चाहता है, परिवर्तन के करवटों से महफूज रहने की हर संभव प्रयास करता है और जीवन में कुछ अप्रत्याशित और अनियोजित घट जाए तो खुद को अभिशप्त महसूस करता है।

क्या आपने कभी किसी गड्डे में पानी को देखा है? इस पानी में कोई बहाव नहीं होता, यह स्थिर रहता है और कुछ समय बाद इससे दुर्गंध आनी शुरू हो जाती है। अपने जीवन में परिवर्तनों की मुखालफत करने वाले लोगों का जीवन इससे जरा भी अलग नहीं है। नदियों के पानी के बहाव में आईना सरीखा पारदर्शिता होती है, क्योंकि यह निरंतर बहता रहता है। परिवर्तनों से घबराने वाले व्यक्ति ‘कम्फर्ट जोन’ में रहना पसंद करते हैं और यही कारण है कि उनके सपनों और उपलब्धियों के संसार का क्षितिज काफी छोटा होता है। वक़्त के साथ हर पल बदलने वाला और हवा के बदलते रुख के साथ खुद को समायोजित करके चलनेवाला इंसान ही जीवन में उन ख्वाबों को साकार कर पाता है जिनकी चाहत इस धरती पर जन्म लेने वाले हर इंसान को होती है।

स्पेन की एक कहावत है, ‘बुद्धिमान व्यक्ति समय के साथ खुद के सोच के ढंग और नजरिये को बदलता रहता है, मुर्ख ऐसा नहीं कर पाता है।’ परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढाल लेने और परिवर्तनों को स्वीकार कर जीवन में आत्मसात कर लेने से हम बेशुमार परेशानियों से बचे रह जाते हैं और प्रगति की राह प्रशस्त कर लेते हैं। जीवन की कहानी गाड़ी के एक पहिये की तरह की होती है, जो आज नीचे है वह कल ऊपर होगा, जो ऊपर है वह नीचे आएगा। पहिये का ऊपर और नीचे आना-जाना ही गति है, जीवन है, सफर है, मंजिल की प्राप्ति है। सच पूछिए तो जीवन चलने का नाम है। जीवन का स्थिर होना ही इसका अवसान है, मृत्यु है। सांसों का चलना ही जीवन है। इनका विराम ही मृत्यु है। यही जीवन है और इससे दूसरी बड़ी कोई सच्चाई नहीं हो सकती है। जीवन है तो परिवर्तन है, परिवर्तन है तो जीवन शेष है, परिवर्तनों की गैर-मौजूदगी ही जीवन का अंत है और यही संसार का शाश्वत नियम है।

 


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