Friday, May 1, 2026
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संसद हुई विपक्ष मुक्त

Samvad 52


lalit kumarदुनिया में जब भी सत्ता लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को कुचलकर दिन-रात अपनी सफलता के कसीदे पढ़ने में लग जाए, तो समझ लेने चाहिए कि उस देश की सत्ता अधिनायकवादी व्यवस्था की ओर बढ़ने जा रही हैं और वह अपने विरोधियों पर नकेल कसने के लिए तमाम तरह के हथकंडे अपनाने में लग जाती है। संसद हमले की 22वीं बरसी वाले दिन भारतीय संसद की सुरक्षा में हुई सेंधमारी का मामला इतना गंभीर मुद्दा है कि उस दिन देश में कुछ भी अनहोनी हो सकती थी। लेकिन ऐसे मामलों पर सरकार अपनी जवाबदेही से बचने के लिए विपक्षी सांसदों द्वारा सदन में सवाल पूछने वाले 141 सांसदों का निलंबन कर दिया जोकि सही निर्णय नही है। सरकार संसदीय सुरक्षा सेंधमारी मामले की जांच पर ज्यादा फोकस न करने के बजाए सदन में सवाल खड़े करने वालों उन सांसदों के खिलाफ क्यों अपना वक़्त जाया करने में लगी हैं? साथ ही ऐसे लोगों पर तुरंत कार्यवाही करने से क्यों झिझक रही हैं? ये कुछ ऐसे सवाल है, जिसको लेकर हर आम नागरिक सोच रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कर्नाटक के मैसूर-कोडागु लोकसभा सीट से बीजेपी सांसद प्रताप सिम्हा का नाम इस मामले में सामने आते ही विपक्षी दलों ने सीधे सरकार को घरने शुरू कर दिया। जिसमें एक अरोपी के पास से एंट्री गेट पर बीजेपी सांसद की महुर लगी मिली हैं। आखिर सरकार अपनी पार्टी के नेता को क्यों बचाने में लगी है।

सदन से उन सभी 141 सांसदों का निलंबन इस बात का सॉल्यूशन नहीं है कि संसद में सवाल पूछने वालें की संख्या कम हो जाएगी, बल्कि इससे विपक्षी एकता को ओर बल मिल सकता है। खासकर सुरक्षा से जुड़े हुए ऐसे गंभीर मसलों पर सरकार का रवैया एकदम क्लियर होना चाहिए कि जो भी दोषी इस घटना के जिम्मेदार है उनके खिलाफ सख्त से सख्त कार्यवाही होगी लेकिन ऐसा नही है। देश की संदन में मौजूद हर सांसद देश की जनता का प्रतिनिधित्व करता है, जो चुनावी प्रक्रिया के जरिए चुनाव जीतकर सदन में पहुंचता है। अगर सत्तापक्ष विपक्षी सांसदों के मुंह पर ताला लगाना चाहती है तो लोकतांत्रिक व्यवस्था का इससे बुरा दौर कोई हो नही सकता। इसका मतलब साफ है कि अगर देश में कुछ भी गलत हो रहा है और सरकार के चश्मे की नजर में वह सही है तो फिर बाकी को भी वह सही दिखना चाहिए। क्योंकि सरकार के देखने का नजरिया और उसकी कार्यप्रणाली अब अधिनायकवादी हो चली है।

भारत के इतिहास में अब से पहले आज तक इतनी बड़ी संख्या में सांसदों का कभी निलंबन नहीं हुआ। इससे पहले 15 मार्च 1989 को लोकसभा से जब 63 सांसदों का निकल गया था। उस वक्त इंदिरा गांधी हत्याकांड को लेकर आयोग के सामने रिपोर्ट पेश करने की बात कही गयी थी। ऐसे वक्त में उन सभी तमाम दिग्गज सांसदों का निलंबन करना जो राज्यसभा और लोकसभा में जनता के हक और अधिकार की बात करते हैं। वह भी ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर जब देश की संसद की सुरक्षा में सेंधमारी हुई और सरकार इस चुप रहे। जब विपक्षी सांसदों ने सत्ता पक्ष से सवाल पूछने शुरू किए, तो आखिर सरकार उन सभी सांसदों को किनारे करके देश को क्या संदेश देना चाहती है। अगर जनता के प्रतिनिधि सदन में सवाल नही पूछेंगे तो फिर कौन पूछेगा? जनता सरकार से कभी सीधे सवाल कर नही सकती, तो ऐसे में उन सभी सांसदों का निलंबन कतई सही नहीं है जो आम जनता के प्रतिनिधि बनाकर सरकार से सदन में सीधे सवाल करते हैं। वर्तमान सत्ता ‘विपक्ष मुक्त’ देश की बात इसलिए करती है कि ताकि उनके काम करने में कोई बाधा न बने और बिना विपक्ष के वह देश पर राज करते रहें।

लोकसभा और राज्यसभा कार्रवाई के दौरान जब दोनों सदनों के विपक्षी नेताओं ने बीजेपी सांसद पर सवाल खड़े करने शुरू किए, तो सरकार को ये सवाल कांटे की तरह चुभने लगे। इसलिए सरकार अब विपक्षी सांसदों पर कार्यवाही करके उन्हें बाहर का रास्ता दिखाने में लगी है। इसका मतलब साफ है कि सरकार की नियत और नियति में कितना अंतर है? इसलिए सरकार सवाल पूछने वालों को एक एक करके किनारे करती जा रही है। क्योंकि उनका लगता है कि सदन में अगर ऐसे नेता मौजूद होंगे, तो उनको यह कतई बर्दाश्त नही होगा। संसद में अभी कई अहम् बिलों पर चर्चा होनी हैं। यही वजह है कि सरकार बिना विपक्ष के उन सभी बिल को पास करना चाहती है। इसलिए सरकार ने लोकसभा के 95 और राज्यसभा के 46 सांसदों को निलंबन करके उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया, जिनमें निलम्बित किए गए कांग्रेस पार्टी के सांसदों की संख्या सबसे ज्यादा है। यह संसद सत्र इस सरकार के दूसरे कार्यकाल का अंतिम सत्र है, क्योंकि अगले वर्ष लोकसभा चुनाव होने हैं। जिसको देखते हुए सरकार अपनी छवि पर जरा भी दाग नहीं लगने देना चाहती है। क्योंकि सरकार को लगता है कि अगर सरकार अपने ही नेता पर कार्यवाही करती है तो हो सकता है कि उससे सरकार की छवि खराब हो। इसलिए सरकार अपने नेता को बचाकर विपक्षी सांसदों का निलंबन करने में लगी है। विपक्षी नेताओं को इस तरह से खामोश करके आखिर सरकार देश को क्या संदेश देना चाहती है, इस पर चिंतन बहुत जरूरी है।

इस वक़्त भारत दो धारा में बंटता हुआ नजर आ रहा हैं। एक वह धारा है जिसमें सरकार को लगता है कि दुनिया में देश का नाम विकसित देशों की तरह बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था में शामिल होने जा रहा है। यानी सरकार का एकपक्षीय विकास जहां धार्मिक स्थलों का विकास, उपजाऊ भूमि एवं पहाड़ों पर बड़े हाईवे और पुल का बनवाना। सरकारी संपतियों को बेचकर निजी औद्योगिकीकरण का विकास, तो वहीं दूसरी धारा जो सरकार की नाकमियां पर लगातार सवाल खड़े कर रही है। जहां लोकतांत्रिक मूल्यों पर होता हमला, सरकारी संस्थाओं और प्राकृतिक संसधानों पर बड़े उद्योग घरानों का कब्जा, युवा पीढ़ी को शिक्षा से दूर करके उन्हें धर्म की राजनीति में ढकेलना। साथ ही बेरोजगारी दर का सबसे निचले स्तर पर जाना, धार्मिक एवं सामाजिक ध्रुवीकरण के कारण लोगों में नफरती माहौल पैदा करके चुनाव जीतना, युवाओं को बेरोजगारी की दलदल में धकेलना और देश के शिक्षण संस्थानों पर लगातार नकेल कसना। यह देश के मुख्य सवाल बनते जा रहे है और सरकार को लगता है कि दुनिया में भारत विश्व गुरु बनने की ओर अग्रसर है।


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