Thursday, April 25, 2024
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ध्वस्तीकरण पर उठते सवाल

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Samvad 51


SUBHASH GATADEउत्तराखंड में हल्द्वानी के बनभूलपुरा इलाके में ‘अवैध मस्जिद और मदरसे’ के ध्वस्तीकरण से उठे सवाल लंबे समय तक विलुप्त नहीं होंगे। अब जबकि इलाके में प्रशासन की निगाह में शांति और अमन लौट रहा है, तब वह सवाल भी नए सिरे से गूंज रहे हैं कि ध्वस्तीकरण के उस आॅपरेशन को जिस तरह अंजाम दिया गया-जिसका नतीजा आधिकारिक तौर पर कम से कम 6 लोगों की मौत और कई लोगों के घायल होने में हुआ, जिसमें कई पुलिसकर्मी भी शामिल थे। ये भी सवाल है कि कहीं उसमें गैर-जरूरी जल्दबाजी तो नहीं दिखाई गई और क्या यह इंसाफ का तकाजा नहीं है कि पूरे मामले की न्यायिक जांच की जाए, संभवत: सुप्रीम कोर्ट के ही किसी रिटायर्ड न्यायाधीश द्वारा ताकि मामले की तह तक पहुंचा जा सके। तय बात है हिंसा किसी भी तरह से हो, उसे सही नहीं ठहराया जा सकता और जनता के हर विरोध आंदोलन को संविधान के दायरे में ही होना चाहिए और अगर किसी ने जान-बूझकर हिंसा को भड़काया है तो उस पर भी उचित कानूनी कार्रवाई होनी ही चाहिए। यूं तो राज्य सरकार द्वारा इस मामले की मैजिस्ट्रेट जांच के आदेश दिए गए हैं, लेकिन इस बात को मद्देनजर रखते हुए यह वही अधिकारी हैं, जिनके मातहत अधिकारियों ने इस ध्वस्तीकरण की कार्रवाई को अमलीजामा पहनाया गया तो फिर जांच की वस्तुनिष्ठता किस हद तक सर्वमान्य होगी, यह बात भी उठ रही है। सच्चाई की तह तक कितना पहुंचा जा सकेगा, यह कहना मुश्किल है! इस ध्वस्तीकरण की कार्रवाई से जिस तरह के सवाल उठ रहे हैं, उनका जवाब न्यायिक जांच में ही मिलेगा। दरअसल जो चित्र उभर रहा है वह ध्वस्तीकरण के इस आॅपरेशन में उजागर हुई प्रशासन की कार्यप्रणाली को प्रश्नांकित कर रहा है:

मीडिया के एक हिस्से में यह बात भी कही जा रही है कि ‘जिला प्रशासन के पास ध्वस्तीकरण के लिए आवश्यक अदालती आदेश का भी अभाव था’। ऐसी कार्रवाइयों को अंजाम देने के पहले प्रशासन अपने गुप्तचर विभाग से ऐसे कदम के संभावित अंजाम को जानने के लिए इनपुट्स भी लेती है, जिनकी प्रस्तुत मामले में अवहेलना किए जाने की भी खबरें कई स्थानों पर प्रकाशित हुई हैं। इस पर भी सवाल उठे हैं कि आखिर इन दो ‘अवैध ढांचों को’ ध्वस्त करने की ऐसी क्या जल्दबाजी थी, जबकि मामला अदालत में विचाराधीन होने के चलते दोनों जगहें पुलिस के कब्जे में ही थीं, जिस पर प्रशासन ने अपने ताले लगाए थे और उत्तराखंड हाईकोर्ट 14 फरवरी को ही इस मामले की सुनवाई करने वाली थी।
जिला प्रशासन द्वारा यह दलील दी जा रही है कि दोनों ढांचे नजूल जमीन पर बसे थे और प्रशासन द्वारा अंजाम दिए जा रहे अतिक्रमण विरोधी अभियान के तहत इस ध्वस्तीकरण को संपन्न किया गया। इस मामले में सरकार के दावों को पत्रकारों, सामाजिक कार्यकतार्ओं, नागरिक समाज के प्रबुद्ध जनों तथा राजनीतिक संगठनों की तरफ से राज्यपाल को दिए गए ज्ञापन में स्पष्ट किया गया कि अकेले बनभूलपुरा में नहीं खुद हल्द्वानी में आबादी का बड़ा हिस्सा-जिसमें सभी धर्मों के लोग शामिल हैं-नजूल जमीन पर बसा है और समूचे उत्तराखंड में इसी किस्म की स्थिति है। गौरतलब है कि इस स्थिति को देखते हुए खुद राज्य सरकार की तरफ से केंद्र के पास यह प्रस्ताव गया है कि नजूल जमीन पर बसे लोगों को जमीन का मालिकाना हक दिया जाए। राज्यपाल से मिलने गए नागरिक समाज के इन लोगों ने यह सवाल भी उठाया कि अगर ऐसी स्थिति है तो फिर बनभूलपुरा के लोगों को खास तौर पर निशाना क्यों बनाया गया, जिनके बारे में खुद आला अदालत ने कहा था कि ‘बल प्रयोग से लोगों को विस्थापित नहीं किया जा सकता।’ अगर संतुलित निगाह से इस मामले को देखने की कोशिश की जाए तो पता चलता है कि न केवल जिला प्रशासन बल्कि खुद राज्य प्रशासन को ही इस मामले में अपनी तरफ से स्पष्टीकरण की दरकार रहेगी। वजह यह है कि महज एक साल पहले शांतिपूर्ण आंदोलन के इस इलाके में, जिसके बारे में आला अदालत ने खास निर्देश दिए हैं, वहां ऐसी कार्रवााई बिना राज्य सरकार को विश्वास में लिए बगैर नहीं की गई होगी।

राज्य सरकार को यह भी पूछा जाएगा कि क्या उसे इस बात का अंदेशा नहीं था कि बलप्रयोग की कोई भी कोशिश विपरीत प्रतिक्रिया को जन्म देगी, जबकि इन स्थानीय निवासियों को सर्वोच्च न्यायालय की तरफ से यह भरोसा मिला है कि बिना वैकल्पिक इंतजाम के उन्हें विस्थापित नहीं किया जाएगा। अगर जिले के खुफिया विभाग ने इस मामले में दिए गए इनपुट्स की कथित तौर पर जिला प्रशासन ने उपेक्षा की, तो क्या उसका यह फर्ज नहीं बनता था कि वह इस बारे में जिला महकमे को निर्देश देता। राज्यपाल से मिलने गए प्रतिनिधिमंडल में शामिल नागरिक समाज के लोगों और सामाजिक कार्यकतार्ओं ने यह बात भी स्पष्ट की कि किसी भी इलाके में अगर ध्वस्तीकरण होता है तो दिनदहाड़े सुबह के वक्त इस कार्रवाई के वक्त इसे अंजाम दिया जाता है, जबकि बनभूलपुरा इलाके में इस कार्रवाई का आगाज शाम 3-4 बजे किया गया था। चाहे न चाहे लेकिन बनभूलपुरा में ‘अवैध ढांचे’ के ध्वस्तीकरण ने न केवल जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली की कथित खामियों को उजागर किया है, बल्कि खुद राज्य सरकार को भी इस मामले में अपना पक्ष स्पष्ट करना है कि जहां तक अल्पसंख्यक अधिकारों का सवाल है, उनके अनुपालन में वह आज तक कितनी चुस्त रही है। इस मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का हालिया फैसला काफी कुछ कहता है, जिसमें उसकी तरफ से गैरकानूनी ध्वस्तीकरण की शिकार पीड़िता को मुआवजा देने का आदेश देते हुए कहा गया कि ‘किस तरह इन दिनों यह फैशन चल पड़ा है कि स्थानीय प्रशासन और स्थानीय निकाय किसी भी मकान को ध्वस्त करने की योजना बनाते हैं और न प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का पालन करते हैं और न इसके बारे में अखबार में ऐलान करते हैं।’

अभी बनभूलपुरा के ध्वस्तीकरण के प्रसंग के पहले मुंबई का मीरा भायंदर इलाका सुर्खियों में था, जहां 22 जनवरी की शाम को लोगों में हुई झड़प का बहाना बना मुसलमानों के मिल्कियत वाली दुकानों, प्रतिष्ठानों को ध्वस्त किया गया था। जिस उज्जैन के प्रसंग में हाईकोर्ट ने फैसला दिया, उसी ने उन्हीं दिनों सात माह से जेल में बंद एक मुस्लिम नौजवान को जमानत पर रिहा किया, जिसके ऊपर फर्जी आरोप लगाए गए थे कि उसने धार्मिक जुलूस पर थूका था, जब उस पर आरोप लगाने वाले अपने आरोप से मुकर गए। गौरतलब था कि महज इन फर्जी आरोपों के बाद ही उसी शाम को पुलिस प्रशासन ने परिवार के तीन मंजिला मकान को ‘अवैध निर्माण’ बताकर ध्वस्त किया, जो मकान 50 साल से बना था। मकान ध्वस्त करते वक्त बाकायदा पुलिस की तरफ से बाजा बजाया जा रहा था। क्या सर्वाेच्च न्यायालय इस बात को सुनिश्चित नहीं कर सकता कि राज्यसत्ता खुद जनता के इन अधिकारों का उल्लंघन करती न दिखे। बिना किसी प्रमाण के लोगों के आवासों, प्रतिष्ठानों, प्रार्थनास्थलों का विध्वंस करना चाहे तो उस पर लगाम लगाने का काम उसका है।


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