Tuesday, May 19, 2026
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आरक्षण वरदान या अभिशाप?

Samvad


01 7लंबे समय से देश में यह बहस चला आ रही थी कि एससी, एसटी और ओबीसी के अतिरिक्त अन्य वर्ग में ऐसे लोगों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की जरूरत है जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं और जिन्हें अवसर नहीं मिल पा रहे हैं। मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने 2006 में एसआर सिन्हो कमेटी गठित की थी, जिसने 2010 में अपनी रिपोर्ट देते हुए आर्थिक आधार पर आरक्षण के पक्ष में मजबूत तर्क देते हुए इसकी सिफारिश की लेकिन इस पर अमल होने में एक दशक से अधिक का समय लग गया। यूपी सरकार 2014 तक रही, पर कोई फैसला नहीं ले सकी। मोदी सरकार ने जनवरी 2019 में आम चुनाव से कुछ महीने पहले 103वां संविधान संशोधन करते हुए इसे लागू करने का फैसला किया ताकि कमजोर लोगों को दाखिले और सरकारी नौकरियों में दस प्रतिशत आरक्षण दिया जा सके। सुप्रीम कोर्ट में इसके विरूद्ध कई याचिकाएं दाखिल कर दी गईं। पांच सदस्यीय खंडपीठ ने सात नवंबर को बहुमत से इसे सही ठहराकर मसले का निपटारा कर दिया। माना जा रहा है कि इसके दूरगामी प्रभाव होने जा रहे हैं।

हमेशा की तरह इस पर राजनीतिक बयानबाजी भी शुरू हो गई है, हालांकि भाजपा और कांग्रेस सहित कई दलों ने इस फैसले की सराहना की है। कुछ ही इस पर नुक्ताचीनी करते नजर आ रहे हैं। इसे लागू करने और गरीब-कमजोर वर्ग के सवर्णों को इसका लाभ देने में अब कोई बाधा नहीं है परंतु आर्थिक आधार पर आरक्षण के विरोध के पीछे राजनीतिक सवालों के साथ ही सांविधानिक मसले भी रहे हैं।

इसका विरोध इस आधार पर होता रहा है कि ऐसा करना संविधान के मूल ढांचे के विरूद्ध है परंतु अब सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि यह संविधान के विरूद्ध नहीं है। हालांकि इस फैसले का एक अहम पहलू यह भी है कि जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस रवीन्द्र भट्ट ने आर्थिक आधार पर आरक्षण के विरुद्ध मत दिया है जबकि जस्टिस बेला त्रिवेदी ने कहा है कि आजादी के 75 साल पूरे हो चुके हैं ऐसे में व्यापक समाज हित में आरक्षण की व्यवस्था पर विचार किए जाने की जरूरत है। यह सही है कि भारत ऐसा देश है जिसने सामाजिक रूप से वंचित, शोषित और पिछड़ गए लोगों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए आरक्षण की व्यवस्था की थी। बड़े वर्ग के जीवन में इससे परिवर्तन भी देखने को मिला है।

उनका आर्थिक सामाजिक विकास हुआ है। ऐसा माना जा रहा है कि सवर्ण गरीबों को अब इस नई व्यवस्था से लाभ मिलेगा। कमियां खामियां जातिगत आधार पर दिए जा रहे आरक्षण में भी रही हैं और आर्थिक आधार पर की गई व्यवस्था का भी दुरुपयोग होने की आशंका बनी रहेगी। विशेषज्ञों का मत है कि इस पर सख्त निगरानी की जरूरत है।
अगर एसआर सिन्हो कमेटी की रिपोर्ट पर निगाह दौड़ाएं तो उसके अनुसार एसटी समुदाय के 48.4 प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा से नीचे हैं।

यह देश की आबादी का 4.25 करोड़ है। 38 प्रतिशत एससी समुदाय के लोग गरीबी की रेखा से नीचे हैं, जो 7.74 करोड़ हैं। ओबीसी की 33.1 प्रतिशत आबादी गरीब है। यह संख्या में 13.86 करोड़ है। वहीं सामान्य वर्ग में गरीबी 18.2 प्रतिशत है। यह संख्या 5.85 करोड़ है। जस्टिस उदय उमेश ललित और जस्टिस रवीन्द्र भट्ट ने आर्थिक आधार पर आरक्षण का तो समर्थन किया परंतु उनका कहना था कि शेष समुदायों को इसमें शामिल न करना सही नहीं है। यानी उपरोक्त समुदायों में जो गरीब हैं, उन्हें भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने निर्णय में बाकायदा यह लिखा है कि सत्तर साल में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने खुलकर बांटने वाले और भेदभाव आधारित सिद्धांत को मंजूरी दी है।

हमारा संविधान किसी को बांटने की भाषा नहीं बोलता है। इन दोनों जस्टिस ने कहा कि वह आर्थिक आधार पर आरक्षण पर सहमत हैं, जिससे गरीबी खत्म करने में मदद मिल सके लेकिन यह संविधान के उसूलों से भटका हुआ नहीं होना चाहिए। न ही संविधान के बुनियादी ढांचे का उल्लंघन या उसे नष्ट करने वाला। ईडब्ल्यूएस के रूप में भिन्न वर्ग लाया गया है। उनका कहना था कि इसे एससी, एसटी, ओबीसी से अलग रखने के प्रावधान की गहन जांच जरूरी है।

सरकार की ओर से ऐसा कोई भी दस्तावेज या साक्ष्य नहीं रखा गया जो बताए कि एससी, एसटी, ओबीसी को आर्थिक आधार पर दिए जा रहे आरक्षण से अलग रखना इसलिए उचित है क्योंकि मौजूदा आरक्षण नीति से इनकी स्थिति सुधरी है। 82 प्रतिशत आबादी इस वर्ग की है लेकिन सरकार ने नहीं बताया कि उन्हें आर्थिक आरक्षण का पात्र होने पर भी बाहर रखने से क्या फायदा होगा। गरीबी की पहचान जाति या समुदाय से नहीं हो सकती। सामाजिक शैक्षिक रूप से पिछड़ों को इस आरक्षण से बाहर रखना उनके साथ भेदभाव है। वह भी तब जब देश में अधिकतर गरीबी इन्हीं वर्गों से है।

जस्टिस ललित और जस्टिस भट्ट ने जो सवाल खड़े किए हैं, उनका जवाब जस्टिस दिनेश माहेश्वरी ने दिया है। उनका कथन है ति बेशक एससी, एसटी, ओबीसी वर्गों के भीतर भी गरीब वर्ग है लेकिन संसद की यह सोच रही है कि इन वर्गों को चूकि आरक्षण मिल रहा है इसलिए उन्हें ईएसडब्ल्यू व्यवस्था में अलग से और आरक्षण देने की जरूरत नहीं होगी। पूर्व में जारी कोटा पर भी कोई असर नहीं हो रहा है।

इस वजह से संविधान के मूल ढांचे के उल्लंघन के तर्क को नकारा जाना चाहिए। जस्टिस बेला त्रिवेदी ने कहा कि आरक्षण की समय सीमा होनी चाहिए। संविधान निमार्ताओं ने जैसा सोचा, 1985 में संविधान पीठ में जैसा प्रस्ताव दिया गया और संविधान के पचास साल पबरे होने पर जो लक्ष्य हासिल करने की बात कही गई, आजादी के 75 साल बाद भी वे हासिल नहीं हुए। दूसरी ओर अनुच्छेद 334 में संसद और विधानसभाओं में एससी एसटी आरक्षण के लिए समय सीमा दी गई है। यह संविधान बनाने के 80 साल बाद खत्म हो सकता था। एंग्लो-इंडियन प्रतिनिधित्व को 2020 में खत्म किया गया है।

अगर ऐसी ही समय सीमा अनुच्छेद 15 और 16 में आरक्षण और प्रतिनिधित्व के लिए दी जाए तो हम एक जातिविहीन और वर्ग विहीन आदर्श समाज की ओर बढ़ सकते हैं। जस्टिस जेबी पारदीवाला ने बहुत अहम बात कही है। उन्होंने कहा कि 141 करोड़ आबादी वाले देश में आर्थिक पिछड़ापन केवल एससी एसटी और ओबीसी तक ही सीमित नहीं है। देश की बहुत कम आबादी गरीबी रेखा से ऊपर हो तो उच्च शिक्षा और रोजगार के अवसर से किसी को वंचित करना उचित नहीं है। आरक्षण साधन है, साध्य नहीं। सात दशक पहले इसकी शुरुआत हुई थी और ये आज भी जारी है। बड़ी संख्या में पिछड़े वर्ग ने एक स्वीकार्य शैक्षिक व रोजगार का स्तर हासिल किया है। इन्हें पिछड़े वर्ग से निकाला जाना चाहिए ताकि जिन वर्गों को वास्तव में मदद चाहिए उन पर ध्यान केंद्रित हो सके।


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