Saturday, December 4, 2021
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Homeसंवादसिनेवाणीलघु फिल्म ‘14 सितंबर’ की समीक्षा, अस्तित्व की लड़ाई लड़ती हिंदी 

लघु फिल्म ‘14 सितंबर’ की समीक्षा, अस्तित्व की लड़ाई लड़ती हिंदी 

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कृतिका मीडिया नेटवर्क की प्रस्तुति ‘14 सितंबर’ एक लघु फिल्म है, जिसके निर्माता केशव राय और ब्रजेश खंडेलवाल हैं। फिल्म के निदेशक श्री राजेश के राठी हैं और इस फिल्म की स्क्रिप्ट केशव राय और  राजेश के राठी ने लिखी है। पार्श्व संगीत श्री निशांत पांडे का है और इस फिल्म में मुख्य भूमिका निभाई है मुश्ताक खान, अशोक बनथिया,स्निग्धा अकोलकर और विजयेंद्र विजय ने। यह फिल्म ओटीटी प्लेटफॉर्म ‘हंगामा’ पर रिलीज हो चुकी है।
फिल्म के शुरुआती दृश्य में मिश्रा जी की बहू अपने बच्चे को अंग्रेजी में राइम याद करवा रही हैं। फिल्म में मिश्रा जी के किरदार में श्री अशोक बनथिया हैं जो एक हिंदी पत्रिका के संपादक हैं। सुबह कार्यालय जाने के क्रम में वे देखते हैं कि स्निग्धा अकोलकर जो हिंदी के किरदार में हैं, अपार्टमेंट के छत से कूदने वाली है। मिश्रा जी तुरंत छत पर पहुंचकर हिंदी को आत्महत्या करने से रोकते हैं, लेकिन गुस्से में वह कांच से अपनी कलाई काट लेती है।
मिश्रा जी जल्दी से हिंदी को अस्पताल में भर्ती कराते हैं। चूंकि, यह आत्महत्या का मामला था, इसलिए, पुलिस अस्पताल पहुंच जाती है। थानेदार की भूमिका में मुश्ताक खान हैं। मामले की तह तक पहुंचने के लिए थानेदार द्वारा मिश्रा जी से गहन पूछताछ की जाती है।
मिश्रा जी घर लौटने के बाद भी सुबह की घटना से बाहर नहीं निकल पाते हैं। हिंदी को बचाने के क्रम में मिश्रा जी हिंदी से कहते हैं, ‘अगर मुझे मालूम होता कि तुम हिंदी हो तो मैं तुम्हें कभी नहीं बचाता। तुम्हारी वजह से ही मेरी आर्थिक स्थिति खराब है’। जबाव में हिंदी कहती है, ‘मेरी वजह से नहीं, बल्कि अपनी हीन भावना की वजह से तुम्हारी ऐसी स्थिति है। तुम लोग ही मेरी बदहाल स्थिति के लिए जिम्मेदार हो। तुम्हारे घर तक में मेरी स्थिति बदतर है।’
‘14 सितंबर’ भाषा पर बनी हुई प्रेरक और अंतस को गहराई से आंदोलित करने वाली फिल्म है। हिंदी की भूमिका में स्निग्धा अकोलकर अपने किरदार के साथ न्याय करने में सफल रही हैं। मुश्ताक खान और अशोक बनथियाभी थानेदार और सूत्रधार की भूमिका में जंच रहे हैं। मिश्रा जी के बेटे के रूप में विजयेन्द्र विजय ने भी सशक्त भूमिका निभाई है।
आज लगभग सभी देशों की अपनी भाषा है, लेकिन भारत में हिंदी न ठीक से राजभाषा बन सकी है और न ही राष्ट्रभाषा, क्योंकि आज भी देश में अंग्रेजी पाली-पोसी जा रही है। हिंदी रोजगारपरक भाषा नहीं बन पाई है। बाजार की ताकत की वजह से इसकी थोड़ी पूछ-परख है, लेकिन वास्तविकता में यह उपेक्षित है। निर्माता और स्क्रिप्ट राइटर केशव राय जी ने अपनी इस फिल्म के माध्यम से मौजूदा विसंगतियों पर करारा  प्रहार किया है। उम्मीद है, लोग इस फिल्म को देखकर हिंदी को दिल से अपनाने के लिये प्रेरित होंगे।
                                                                             -सतीश सिंह, मुंबई से


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