- बिना आंखों के 400 मीटर दौड़ व लांग जंप मे देश का प्रतिनिधित्व करने का सपना देख रहा दिव्यांग खिलाड़ी
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: क्या बिना आंखो के किसी खेल को खेलना संभव है इस सवाल का जवाब है वह खिलाड़ी जो बचपन से देख नहीं सकता, लेकिन बुलंद हौसले के धनी इस खिलाड़ी का जज्बा काबिले तारीफ है। यह खिलाड़ी अपने घर से स्टेडियम तक बिना किसी की मदद के नहीं पहुंच सकता लेकिन देश का प्रतिनिधित्व करने का सपना बंद आखों से जरूर देखता है जो इसके हौसले को और बढ़ाता है।
पिता सब्जी बेचकर किसी तरह घर का खर्च चलाते है लेकिन मुफलिसी को कभी अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। गढ़ रोड के सिसौली गांव का रहने वाला एथलीट गौरव बचपन से ही आंखो से देख नहीं सकता, लेकिन उसका सपना देश के लिए खेलने का है। इसी भावना को दिल में लेकर गौरव रोज कैलाश प्रकाश स्टेडियम में प्रैक्टिस करने आता है। गौरव को स्टेडियम तक आने के लिए किसी न किसी सहारे की जरूरत होती है और अक्सर उसका भाई साथ आता है।
स्टेडियम में आने के बाद साथी खिलाड़ी उसका पूरा सपोर्ट करते है और उसे यह महसूस नहीं होने देते कि वह किसी न किसी रूप में कहीं से कमजोर है। गौरव ने बताया कि उसे बचपन से ही दौड़ने का शौक रहा है, लेकिन आंखो से दिखाई नहीं देने पर वह अपने को मजबूर समझता था। मगर उसके भाई ने हौसला बढ़ाया और उसे एक दिन कैलाश प्रकाश स्टेडियम में लेकर पहुंचा।
यहां भाई ने क्रीड़ा अधिकारी से मिलवाया लेकिन वह किस तरह से अपने को साबित करेगा यह सवाल उठा। गौरव ने कहा कि उसे एक मौका दिया जाए तो वह साबित कर देगा कि वह भी किसी दूसरे खिलाड़ी से कम नहीं है। क्रीड़ा अधिकारी ने उसकी बात मान ली और उसे एथलेटिक्स कोच के पास भेज दिया। इसके बाद गौरव ने टैÑक पर दौड़ते हुए अपने खेल को साबित किया और स्टेडियम में हुई प्रतियोगिता में उसने गोल्ड मेडल जीता।
गौरव ने बताया वह 400 मीटर रेस के साथ लॉग जंप भी खेलता है। अब उसका सपना इसी खेल में देश का प्रतिनिधित्व करने का है। स्टेडियम में प्रैक्टिस करते समय उसके कोच लॉग जंप के लिए विशेष तरीके से अभ्यास कराते है। क्योंकि वह देख नहीं सकता तो वह अपने कदम गिनकर एक जगह पहुंच जाता है।
यहां से उसे सीधा दौड़ने के लिए कहा जाता है जिसके बाद वह अपने कदम गिनकर दौड़ता है। इस दौरान उसके कोच भी उसके कदम गिनते है और जैसे ही गिनती पूरी होती है कोच ताली बजाते है जिसके बाद वह उछल जाता है और अपनी जंप को पूरा करता है।
पिता बेचते हैं सब्जी
गौरव के पिता गांव में सब्जी बेचते है, किसी तरह घर का गुजारा चलता है लेकिन इस खिलाड़ी के बुलंद हौसलो के सामने मुफलिसी भी नतमस्तक होती नजर आती है। कई बार गांव से स्टेडियम तक आने के लिए बाइक में पैट्रोल नहीं होता तो कई बार भाई के साथ किसी सवारी के लिए किराया नहीं होता। इस दौरान पिता या किसी जानकार से मदद मांगता है जो उसे मिल जाती है। हाल ही मे एक भाई की रेलवे में नौकरी लगी है तो कुछ हद तक वह भी पिता की मदद करता है।
कोच ने की मदद की अपील
स्टेडियम के एथलेटिक्स कोच गौरव का कहना है कि यह खिलाड़ी कुछ अलग है। ऐसा नहीं कि यह देख नहीं सकता तो इसलिए ऐसा माना जाए, बल्कि इस खिलाड़ी में प्रतिभा कूट-कूट कर भरी है। ऐसे में यदि इस खिलाड़ी को कोई स्पांसर कर दे तो यह अपने सपने पूरे कर सकता है।

