
नास्त्रेदमस की भविष्यवाणी झूठी हो सकती है, पर नासा के सुपरकंप्यूटर झूठ नहीं बोलते। नासा और जापान की तोहो यूनिवर्सिटी की नई स्टडी बताती है यानी उसका अध्ययन यह चेतावनी दे रहा है कि आने वाले एक अरब साल में पृथ्वी की आॅक्सीजन पूरी तरह खत्म हो जाएगी। ये चिंता भले दूर की ही सही, पर आईपीसीसी यानी जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल की चेतावनी बिल्कुल हालिया शोध और अध्ययन का परिणाम है । देखा जाये तो हमारे पास धरती का तापमान 1.5 सेंटीग्रेड से नीचे रखने के लिए 2030 तक का ही समय है। यानी अब सिर्फ 6 साल ही हमारे पास बचे हैं। अब सवाल ये है कि क्या हम वो 6 साल भी गंवा देंगे? राजस्थान ने इस सवाल का जवाब सड़क पर दे दिया है।
18 जुलाई 2024 से ‘प्रकृति बचाओ’ आंदोलन के तहत हमारा धरना लगातार जारी है। 8 जिलों में बंद, 2 फरवरी 2025 को बीकानेर में डेढ़ लाख लोगों का जमावड़ा, हजारों की तादाद में मातृशक्ति की कलश यात्रा और 11 दिन के आमरण अनशन के बाद सरकार को लिखित में आदेश जारी करना पड़ा कि अब ओरण-गोचर में एक भी पेड़ नहीं कटेगा। सरकार ने इसी सत्र में कानून लाने का वादा भी किया था। ये जीत जनता की है, और एक तरह से विज्ञान की भी जीत है। पर विचारणीय यह है कि जमीनी हालात क्या हैं? सरकार का राज्य स्तरीय सर्कुलर जारी हुए महीनों बीत गए हैं, परन्तु कानून अभी तक नहीं आया है। उल्टा पिछले 15 दिनों में अकेले बीकानेर जिले में 4-5 घटनाएं हो चुकी हैं, जहां सोलर प्लांट कंपनियों ने 400-500 खेजड़ियां काट दीं हैं। हालात इस बात के सबूत हैं कि यह सिलसिला बराबर जारी है।
विडंबना देखिए जलवायु परिवर्तन से लड़ने के नाम पर ही जलवायु का कत्ल हो रहा है। सोलर
प्लांट लगाने के लिए थार के ओरण के ओरण उजाड़े जा रहे हैं, 300 साल पुरानी खेजड़ी काटी जा रही है। यह विनाश नहीं तो और क्या है। एक ओर तो सरकार पर्यावरण रक्षा की बात करती है,वहीं दूसरी ओर ग्रीन एनर्जी के नाम पर हजारों-लाखों खेजड़ी काटकर क्या पर्यावरण रक्षा का संदेश दे रही है। यह सरकार की कथनी और करनी का जीता जागता सबूत है। विज्ञान के अनुसार सूरज हर 11 करोड़ साल में एक फीसदी गर्म हो रहा है। इससे बचने का एक ही प्राकृतिक तरीका है-धरती पर पेड़ और घास के मैदान बचाना, जो कार्बन सोखते हैं। जबकि हकीकत यह है कि हम पेड़ काटकर हम अपनी ढाल ही तोड़ रहे हैं। बीते बरस इस बात के जीते जागते सबूत हैं कि देश में लाखों की तादाद में विकास योजनाओं के नामपर पेड़ों की कुर्बानी दी गयी है और यह
सिलसिला लाख जन विरोध के बावजूद बेरोकटोक जारी है।
तो आखिर में रास्ता क्या है? विकास रुकेगा नहीं, तो हमें तरीका बदलना होगा। गौरतलब है जर्मनी’ एग्रीवोल्टेक्स’ मॉडल पर काम कर रहा है यानी सोलर पैनल 4 मीटर ऊंचे लगाओ, नीचे खेजड़ी और सेवण घास जिंदा रहे। पैनल ठंडे रहेंगे तो 6 फीसदी ज्यादा बिजली भी बनेगी। रोजगार भी पैदा होंगे और हरियाली भी बची रहेगी।एमएनआरई का वाटरलैंड एटलस बताता है कि राजस्थान में 2 लाख हेक्टेयर असली बंजर जमीन आज भी खाली है। इसके अनुसार सोलर प्लांट वहां लगें, किसी कीमत पर ओरण पर नहीं।
कानून का क्या है? एनजीटी का 26 जुलाई 2021 का आदेश साफ है कि ओरण-गोचर पर गैर-वन गतिविधि प्रतिबंधित है। इसके उल्लंघन पर वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 और राजस्थान काश्तकारी अधिनियम की गंभीर धाराएं भी लग सकती हैं, पर प्रशासन मौन है और कार्रवाई नहीं कर रहा है। सरकार का लिखित सर्कुलर और कानून लाने का वादा फाइलों में धूल खा रहा है। इसलिए निगरानी कमेटी होना हर जिले में बेहद जरूरी है। 1730 में खेजड़ली में अमृता देवी बिश्नोई ने कहा था ‘सिर साटै रूंख रहे तो भी सस्तो जाण’। 2025 में हम सिर नहीं मांग रहे, सिर्फ साइंस और कानून का पालन मांग रहे हैं। आईपीसीसी की 12 साल वाली चेतावनी को झूठा साबित करना है तो पेड़ लगाने होंगे, काटने नहीं। इस बात का हमें ध्यान रखना होगा। नासा तो एक अरब साल बाद की बात कर रहा है। वो हमारे बस में नहीं। पर अगले 6 साल तो हमारे बस में हैं। फैसला हमें करना है कि हमें धूप से सिर्फ बिजली चाहिए या धूप से जिंदगी भी?
‘प्रकृति बचाओ’ आंदोलन’ इसी सवाल का जवाब है। अक्टूबर 2023 में बीकानेर मुकाम में हुए अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण सम्मेलन में 700 पर्यावरणविदों ने, नेपाल समेत 4 देशों के प्रतिनिधियों ने एक सुर में कहा था कि ‘औद्योगिक क्रांति के बाद विनाश हुआ है, अब कोई शॉर्टकट नहीं है।’ ये आंदोलन किसी पार्टी का नहीं, आने वाली पीढ़ी की सांसों का है। इसे जन-आंदोलन बनाइए। वरना नासा की भविष्यवाणी से पहले ही हमारा रेगिस्तान हमारा दम घोंट देगा। ध्यान रहे कानून बनाओ, सर्कुलर लागू कराओ, धरना तभी उठेगा।

