कभी-कभी कोई किसी बात पर बिना गहन चिंतन मनन किए अपनी सोच दूसरों के सामने उड़ेल देता है। लगे हाथ व्यक्त की गई सोच के पक्ष में तमाम तरह के तर्क और कुतर्क भी गढ़ लेता है। यही नहीं अपितु अपने तर्क और कुतर्क पर स्वयं भी पक्का विश्वास रखकर चलता है। और हां, कभी-कभी तो अपनी सोच के क्रियान्वयन को प्रतिष्ठा का प्रश्न भी बना लेता है। ऐसा और कहीं नहीं, लेकिन इन दिनों राजनीति में बहुतायत से हो रहा है। अब देखिए न, इधर एक ने कुछ कहा … और कहा भी ऐसा कि किसी के गले नहीं उतरे। लेकिन बवाल मचते ही जब नानी दादी याद आने की स्थिति बन जाएं पलक झपकते ही नए-नए तर्क कुतर्क हवा में उछाल दिए जाते है।
जिसके चलते बात पर से बात निकल कर मूल बात से कोसों दूर हो जाती है। और फिर नए विवाद का जन्म हो जाता है। कुछ लोग इधर के पक्ष के हो जाते हैं तो कुछ लोग उधर के पक्ष के हो जाते हैं। जमकर टीका टिप्पणी और बयान बाजी का दौर अनवरत रूप से चला करता है। जिसके चलते जनमानस में संबंधित मुद्दों को लेकर उनकी अपनी एक नई सोच का सृजन होता है। जिसे परस्पर बातचीत में या किसी अन्य तरह से जाहिर किया जाता है। और बस फिर बात पर से बात निकल कर जाने कहां से कहां पहुंच जाया करती है। मजे की बात यह है कि एक जगह से दूसरी जगह जब बात जाती है तो उसमें अतिरिक्त बातों का भी समावेश हो जाता है।
एकतरफा विचार काफी हद तक पीछे छूट जाता है और बात पर से बात निकल कर नए विवाद को जन्म दे देती है। जिसके चलते प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को ‘गरम मसाला’ मिल जाता है। जो चटपटा खाने को आतुर नहीं, नहीं सनसनीखेज खबरों के तलबगार वर्ग के लिए फुर्सत के दौर में मनोरंजन का माध्यम बन जाता है। अब वह समय नहीं रहा जब रहस्य और रोमांच से भरपूर थ्रिलर उपन्यास खरीदकर या भाड़े पर लाकर पढ़े जाते थे। आजकल के दौर में तो सोशल मीडिया में एक से बढ़कर एक सनसनी पूर्ण सामग्रियों की भरमार रहा करती है। जिसके चलते एक प्रकार से दिल और दिमाग झुलायमान अवस्था को प्राप्त होता है।
दरअसल आजकल के दौर में लपर-लपर करती जुबान को पकड़ना और उसे साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत करना बेहद आसान हो गया है। अब आदमी छोटा हो या बड़ा, किसी पद पर हो या न हो, दुनिया भर में चाहे किधर भी हो, यह मानकर चला जाना चाहिए कि वह कैमरे की नजर में है। इधर मुंह खोला तो समझ लो कि उधर धराएं। लेकिन यह जो राजनीतिक बिरादरी वाले लोग है, धूल में फूल खिलाने में बड़े माहिर हुआ करते है। किसी और की जुबान न फिसले, यानी कि कोई पकड़ने वाला मुद्दा हाथ न लगे तो ये स्वयं अपनी जुबान फिसल जाने देते है। वैसे जहां तक राजनीति की बात है, तो राजनीति का क्या कहना! यहां तो बदनामी में भी नाम होने की संभावना, आदमी को राजनीति में हर हाल में जिंदा रखती है।

