
बैंक किसी भी देश की अर्थव्यवस्था की वे आधारशिला होते हैं, जिस पर देश की अर्थव्यवस्था का ढांचा खड़ा होता है। यह बात कहने में भी कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि सुदृढ़ बैंकिंग तंत्र स्वस्थ अर्थव्यस्था का प्रबल माध्यम है। बीते एक दशक से अधिक समय से भारत का बैंकिंग तंत्र धीरे-धीरे पंगु होता जा रहा है, जिसकी सुदृढ़ता के लिए केंद्र सरकार द्वारा भरकस प्रयास भी जारी हैं। जिसके तहत सरकार द्वारा सार्वजनिक बैंकों को घाटे से उबारने हेतु समय-समय पर पूंजीकरण द्वारा सीधे तौर पर बैंकों को रकम हस्तांतरित की जाती रही है।
बीते वित्तीय वर्ष 2021-2022 के फरवरी माह में 15000 करोड़ रुपये सार्वजनिक बैंकों में हस्तांतरित करने का प्रावधान किया गया। हालांकि इससे पहले भी बीते सालों में सरकार द्वारा सार्वजनिक बैंकों की हालत में सुधार हेतु रकम हस्तांतरित की जा चुकी है। आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार केंद्र सरकार द्वारा वर्ष 2014 से 2021 के बीच पब्लिक सेक्टर की बैंकों में 3.43 लाख करोड़ रुपये डाले जा चुके हैं|
जिसमें वित्तीय वर्ष 2015-2016 के दौरान 20 हजार करोड़ रुपए, वित्त वर्ष 2017-2018 में 90 हजार करोड़ रुपए। इसी प्रकार वित्त वर्ष 2018-2019 में 1 लाख करोड़ रुपए तथा वित्तीय वर्ष 2019-2020 में 70 हजार करोड़ रुपए तथा वित्त वर्ष 2020-21 में 20 हजार करोड़ रुपए केंद्र सरकार द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में हस्तांतरित किए जा चुके हैं। किंतु इसके बाद भी सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकों की स्थिति में कोई बहुत अच्छा परिवर्तन नहीं दिख रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है|
की बैंकों द्वारा गैर निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) की सुस्त वसूली व बड़े लोन की रिकवरी न कर पाना और भारी मात्रा में बैड लोन या एनपीए का राइट आॅफ किया जाना अर्थात बट्टे खातेमें डालना। इसका मतलब (राइट आॅफ) यह हुआ कि बैंकों ने मान लिया कि इन ऋणों से वसूली अब नहीं हो पाएगी।
भारतीय रिजर्व बैंक की एक रपट के अनुसार बीते दस वर्षों में सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकों द्वारा लगभग 10.72 लाख करोड़ रुपए का बैड लोन या एनपीए को राइट आॅफ किए गया। आरबीआई के मुताबिक बैंकों द्वारा वित्त वर्ष 2019-20 में 2,34,170 करोड़ रुपए, वहीं वित्तीय वर्ष 2018-19 में 2,36,265 करोड़ रुपए, इसी प्रकार वित्तीय वर्ष 2017-18 के दौरान 1,61,328 करोड़ रुपए तथा वित्त वर्ष 2017-16 में 1,08,373 करोड़ रुपए की गैर निष्पादित परिसंपत्तियां (एनपीए) राइट आॅफ की गई।
यदि बैंकों के संदर्भ में बात की जाए तो वित्तवर्ष 2020 के दौरान देश के अग्रणी बैंक स्टेट बैंक आॅफ इंडिया द्वारा कुल 89,686 करोड़ रुपए, यूनियन बैंक आॅफ इंडिया द्वारा 16,983 करोड़ रुपए, पंजाब नेशनल बैंक द्वारा 15,877 करोड़ तथा बैंक आॅफ बड़ौदा द्वारा 14,782 करोड़ रुपए राइट आॅफ किए गए। एक तरफ सरकार द्वारा बैंकों के घाटे की भरपाई के लिए पूंजी को हस्तांतरित किया जा रहा है, दूसरी तरफ बैंकों द्वारा गैर निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) की लचर वसूली या गैरनिष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) का राइट आॅफ किया जा रहा है। यह तो वही बात हो गई कि हम बाल्टी में पानी भर रहे हैं| किंतु बाल्टी में छेद होने बजह से वह पानी व्यर्थ जा रहा है।
बीते एक दशक से बैंकों का बढ़ता बेलगाम एनपीए देश के बैंकिंग तंत्र रूपी नाव में छेद का कार्य कर रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़े के मुताबिक 31 मार्च, 2021 तक बैंकों की 8.34 लाख करोड़ रुपए की संपत्ति एनपीए थी। दिसंबर 2021 में आई आरबीआई की वित्तीय स्थिरता रपट बताती है कि सार्वजानिक बैंकों की सकल गैरनिष्पादित परिसंपत्तियों (जीएनपीए) का अनुपात सितंबर 2021 में 6.9 फीसद था जो सितंबर 2022 तक बढ़कर 8.1 फीसद तक हो जाएगा। वहीं तनावपूर्ण परिस्थिति में यह 9.5 फीसद तक भी जा सकता है।
बैंकों के बढ़ते बेलगाम एनपीए की सबसे मुख्य वजह कॉरपोरेट सेक्टर को ऋण के नियमों की अनदेखी कर बड़े उद्योगपतियों को बेतहाशा ऋण का वितरण करना है। इसकी बानगी हाल के वर्षों में सामने आए हीरा कारोबारी नीरव मोदी, मेहुल चौकसी व उनके सहयोगियों द्वारा पीएनबी बैंक घोटाला, शराब कारोबारी विजय माल्या, जतिन मेहता, ललित मोदी का मनी लॉन्ड्रिंग घोटाला और हाल में सामने आया सूरत बेस्ड कम्पनी एबीजी शिपयार्ड कंपनी का घोटाला, जो अब तक की बैंकिंग इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला बताया जा रहा है|
इन सबसे अंदाजा लगाया जा सकता है कि कैसे बैंक के उच्च अधिकारियों व उद्योगपतियों द्वारा घोटालों की जुगल बंदी से देश की आम जनता का पैसा नियमों की अनदेखी कर उद्योगपतियों को बांटा जा रहा है।
बैंकों के एनपीए बढ़ने का एक मुख्य कारण यह भी है कि बैंक अपने लक्ष्य को पूरा करने व सरकारी योजनाओं के तहत ऋण वितरण कैंप लगाकर ऋण के नियमों की अनदेखी कर ऋण का वितरण करती हैं। यही नहीं बैंक ऋण सेटेलमेंट स्कीम भी चलती हैं और फिर ऋण की रकम को भारी छूट के साथ सेटेलमेंट करती हैं। इसकी बानगी कुछ इस प्रकार देखी जा सकती है कि इलेक्ट्रोस्टील स्टील, एमटेक आटो, ज्योति स्ट्रक्चर,आलोक इंडस्ट्रीज, मोनेट इस्पात एंड एनर्जी लिमिटेड, भूषण स्टील कुछ ऐसे उदाहरण हैं|
जिनके लोन सेटलमेंट से बैंकों को 78 हजार करोड़ रुपए से अधिक का नुकसान हुआ है। आलोक इंडस्ट्रीज के ऊपर 29500 करोड़ रुपए से अधिक की बकाया राशि थी। बैंक द्वारा इस ऋण खाते में सिर्फ 5000 करोड़ रुपए में समझौता कर ऋण का निपटारा किया गया। इस समझौते में हेयरकट अर्थात राइटआॅफ की राशि कुल बकाया कर्ज की 83 फीसदी थी।
इसी तरह बैंकों द्वारा एमटेक आॅटो की 12327 करोड़ रुपए से अधिक की बकाया राशि के कर्ज को 75 फीसदी तक की रकम का राइट आॅफ करके ऋण खाते को बंद कर दिया गया। वहीं मोनेट इस्पात एंड एनर्जी लिमिटेड की 10 हजार करोड़ रुपए से अधिक की बकाया राशि को भी 72 फीसदी के राइट आॅफ के साथ समझौता कर खाते को बंद कर दिया गया।
ऋण समझौतों में कम राशि वसूल करके अधिक राशि राइट आॅफ कर इसे गैर निष्पादित परिसम्पत्तियों की वसूली में बहुत बड़ी सफलता के रूप में प्रदर्शित किया जाता है। बैंक के पास बकायेदारों की बंधक संपत्तियों का वसूली योग्य मूल्य कुल बकाया राशि से बहुत अधिक होने के बाद भी बैंक ऋण समझौतों में राइट आॅफ के बाद चूककर्ता ऋणी से बहुत कम राशि की वसूली करके उन्हें ऋण मुक्त कर रहे हैं।
यदि ऋण वसूली की यही प्रवृति रही तो सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के अस्त्तिव को बचाना सम्भव नहीं होगा। इन स्थितियों में ये बैंक सरकार के लिए सफेद हाथी हो जाएंगे, जिनका बोझ किसी भी सरकार के लिए ढोना आसान नहीं होगा।


