Saturday, June 13, 2026
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रामजी राम जैसा कोई दूजा सांसद न हुआ

Nazariya 22


krishna pratap singhआज के हालात में तो खैर, जब लोकसभा चुनाव में प्रत्याशियों द्वारा किए जाने वाले खर्च की विधिक सीमा 95 लाख रुपयों तक जा पहुंची है और उनका वास्तविक खर्च इससे भी कहीं ज्यादा होता है, इसकी कल्पना भी मुमकिन नहीं कि कोई निर्धन प्रत्याशी खाली हाथ और भूखे पेट चुनाव लड़ेगा और जीत जाएगा। लेकिन 1967 के लोकसभा चुनाव में तत्कालीन फैजाबाद जिले की अकबरपुर सुरक्षित लोकसभा सीट पर कुछ ऐसा ही हुआ था। कैसे, आपको बताते हैं। 1962 के चुनाव में इस सीट पर कांगे्रस के प्रत्याशी पन्नालाल जीते थे और साधन व सामर्थ्य के लिहाज से अजेय मानने जाते थे। लेकिन 1967 का चुनाव आया तो समाजवादी चिन्तक डॉ. राममनोहर लोहिया का गैरकांगे्रसवाद जोर पकड़ चुका था। उनकी जन्मभूमि वाले इस लोकसभा क्षेत्र में तो उसका कुछ ज्यादा ही उभार था। उससे प्रेरित विपक्षी पार्टियों ने पन्नालाल के खिलाफ सर्वस्वीकार्य उम्मीदवार की तलाश शुरू की तो वह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के टांडा निवासी बीए तक पढ़े दलित कार्यकर्ता रामजीराम पर खत्म हुई। लेकिन रामजी राम की उम्मीदवारी में दो बड़ी दिक्कतें थीं। पहली यह कि लोकसभा और विधानसभा के चुनाव साथ-साथ हो रहे थे और विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में भाकपा प्रत्याशियों से प्रतिद्वंद्विता कर रही अन्य गैरकांगे्रसी पार्टियां लोकसभा के लिए उसी के प्रत्याशी का समर्थन या प्रचार करने को तैयार नहीं थीं। दूसरी यह कि रामजी राम के हाथ एकदम खाली थे। पहली समस्या का तोड़ तो रामजी राम को भाकपा के बजाय रिपब्लिकन पार्टी का प्रत्याशी बनवाकर निकाल लिया गया, लेकिन दूसरी समस्या कहीं ज्यादा विकट होकर सामने आई। तब जैसे-तैसे चंदा करके रामजी राम के लिए नामांकनपत्र खरीदा गया और मित्रों व शुभचिंतकों से उन्हें इतने रुपये दिए कि वे उसे भरकर जमा करने जिला मुख्यालय स्थित निर्वाचन कार्यालय पहुंचने का बस का किराया अदा कर सकें।

लेकिन उनके ‘पापी पेट’ को भी इसी समय आड़े आना था। निर्वाचन कार्यालय के बाहर औपचारिकताएं पूरी होने के बाद उनसे कहा गया कि परचा भरने चलें तो वे बोले, कैसे चलूं? भूख के मारे मुझसे खड़ा नहीं हुआ जा रहा। क्या करूं, घर में खाने को कुछ था ही नहीं, सा सुबह-सुबह कुछ खाये बिना ही निकल पड़ा। रात को भी कुछ नहीं खाया था। इस पर वहां उपस्थित कुछ वकीलों ने उन्हें चाय-नाश्ता करवाया और जब वे खड़े होने लायक हुए तो उनके साथ जाकर नामांकन करवाया। बाद में चंदे वगैरह से उनके समर्थन में थोड़े-बहुत परचे व पैम्फलेट वगैरह छपे, लेकिन जिसे चुनाव प्रचार कहते हैं, वह लगभग न के बराबर हुआ। विधानसभा चुनाव के गैरकांगे्रसी प्रत्याशियों ने मतदाताओं को अपने साथ उनका चुनावचिह्न भी बता दिया और इसी को बहुत मान लिया गया। जैसा कि बहुत स्वाभाविक था, मतदान के बाद, और तो और, खुद रामजी राम को भी उम्मीद नहीं थी कि वे जीतेंगे। लेकिन मतगणना में उन्होंने कांगे्रस के अजेय माने जा रहे पन्नालाल को 3426 वोटों से हरा दिया। उन्हें 99198 वोट मिले और पन्नालाल को 95672।

फिर भी उनकी मुश्किलें खत्म नहीं हुर्इं। वे जीत तो गए लेकिन आर्थिक तंगी के कारण सांसद के तौर पर उनका नई दिल्ली जाना भी मुश्किल हो उठा। न उनके बदन पर ढंग के कपड़े थे और न जेब में किराया। एक साथी के अनुग्रह से इस सबका इंतजाम हुआ और वे नई दिल्ली गए तो उनकी साधारण कद-काठी और वेशभूषा के चलते सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें अवांछित समझकर लोकसभा में घुसने से ही रोक दिया! तब उन्हें अपनी जीत का प्रमाणपत्र दिखाना और बताना पड़ा कि वे कोई अजनबी अवांछित व्यक्ति नहीं बल्कि सांसद हैं और चुनकर आए हैैं! इम्पीरियल नामक होटल में उनके ठहरने की व्यवस्था की गई तो उन्होंने कहा कि यहां तो मैं अपने खर्चे पर चाय तक नहीं पी सकता! बाद में रिपब्लिकन पार्टी के एक अन्य सांसद जो 15, जनपथ में रहते थे, उन्हें इस शर्त पर अपने साथ ले गए कि जब वेतन मिलेगा तो वे भी खर्चे में अपना हिस्सा दे देंगे! प्रसंगवश, अकबरपुर (सुरक्षित) लोकसभा सीट का नाम अब अम्बेडकरनगर हो गया है, लेकिन वहां बडे-बुजुर्ग अभी भी राम जी राम की चर्चा करते हुए कहते हैं कि आज के करोडपति-अरबपति सांसदों से उनके जैसा होने की उम्मीद नहीं की जा सकती।

मौलाना आजाद तो बिना वोट मांगे ही जीते!
अब 1952 के लोकसभा चुनाव का एक वाकया। मौलाना अबुल कलाम आजाद उत्तर प्रदेश की रामपुर सीट से प्रत्याशी थे। उनके खिलाफ हिंदू महासभा के बिशनचंद सेठ चुनाव लड़ रहे थे। बिशनचंद का चुनाव प्रचार तो धुआंधार चल रहा था, लेकिन देश भर में कांगे्रस के प्रचार की जिम्मेदारी सिर पर होने के कारण मौलाना अपने मतदाताओं के बीच जाने का समय ही नहीं पा रहे थे। बहुत हाथ-पांव मारने और कन्नी काटने के बाद भी वे सार्वजनिक रूप से चुनाव प्रचार का वक्त खत्म होने से पहले रामपुर नहीं जा सके। जब पहुंचे तो घर-घर जाकर प्रचार करने का समय ही बचा था। पर सीमित समय में वे इस तरह कितने घरों में जा पाते? फिर भी कांगे्रस कार्यकर्ताओं की मेहनत रंग लाई। मतगणना हुई तो मौलाना 59.57 प्रतिशत वोट पाकर खासी शान से जीते। उन्हें 1,08,180 वोट मिले जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी हिंदू महासभा के बिशनचंद को महज 73,427 वोट। बाद में मौलाना को जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल में देश का पहला शिक्षा मंत्री बनाया गया।


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