Wednesday, April 15, 2026
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अभिव्यक्ति पर अंकुश की कोशिश

 

Samvad 45


Rohit Koshikज्ञानवापी मस्जिद मुद्दे पर शिवलिंग को लेकर विवादित पोस्ट करने वाले दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रतन लाल की गिरफ्तारी सवालों के घेरे में हैं। हालांकि अब उन्हें रिहा कर दिया गया है। रतन लाल के खिलाफ दिल्ली के वकील विनीत जिंदल ने शिकायत दर्ज कराई थी। ऐसे मामलों में सरकार यही कहती है शिकायत के आधार पर कार्रवाई हो रही है लेकिन इसके निहितार्थ आसानी से समझे जा सकते हैं। सरकार छिपे और खुले तौर पर बहुत कुछ करती है। निश्चित रूप से किसी भी विरोध की भाषा शालीन होनी चाहिए लेकिन ऐसे समय में जबकि बड़े-बड़े अपराधी आराम से बाहर घूम रहे हैं, प्रोफेसर रतन लाल की गिरफ्तारी हमें गंभीरता से बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती है। इस प्रगतिशील दौर में भी बेबाक टिप्पणियां करने वाले लेखकों और विद्धानों पर हमला बोला जा रहा है।

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इस तरह के मामलों ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि इस युग में भी सत्ता का मूल चरित्र बदला नहीं है। समय आने पर वह बिल्कुल राजशाही की तरह व्यवहार करती है। समाज को दिशा देने की बजाय वह समाज को हांकने का काम करने लगती है और यदि जरूरत पड़े तो विरोधी विचारधाराओं वाली समाज की इकाइयों पर विभिन्न तौर-तरीकों से हंटर चलाने से भी परहेज नहीं करती।

जब सत्ता का नशा सिर चढ़कर बोलता है तो सत्ता में बैठे राजनेता घोषित उद्देश्यों को एक तरफ उठाकर रख देते हैं और अघोषित उद्देश्यों को पूर्ण करने में लग जाते हैं। अघोषित उद्देश्यों को पूर्ण करने के चक्कर में उन्हें यह भी ध्यान नहीं रहता कि सत्ता का रास्ता समाज से होकर ही गुजरता है। बिना समाज के सत्ता की कल्पना भी नहीं की जा सकती। समाज मात्र एक विचारधारा का नाम नहीं है। अनेक विचारधाराओं के समन्वय से समाज का निर्माण होता है। विभिन्न विचारधाराओं के समन्वय का नाम ही लोकतंत्र है। लोकतंत्र में विरोधी विचारधाराओ को भी सम्मान दिया जाता है। विरोधी विचारधाराओं को सम्मान देने से ही लोकतंत्र मजबूत होता है।

सत्ताएं शुरू से ही कुछ लेखकों ,पत्रकारों और कलाकारों को प्रोत्साहन एवं प्रश्रय देती रही हैं। सत्ता से सुविधाप्राप्त लेखक एवं पत्रकार सत्ता का गुणगान भी करते रहे हैं। दोनों ही पक्ष नैतिकता को ताक पर रखकर एक-दूसरे से फायदा उठाते हैं। इस माहौल में सत्ता को यह भ्रम हो जाता है कि सभी लेखक एवं कलाकार उसी की तरह सोचेंगे और उसकी विचारधारा को जन-जन तक पहुंचाएंगे। जब लेखक सत्ता की विचारधारा का विरोध करते हुए अपने निजी तर्क जनता के सामने रखते हैं तो सत्ता बौखला जाती है अपने स्तर से नीचे जाकर लेखकों एवं कलाकारों को सबक सिखाने के विभिन्न हथकंडे अपनाने लगती है।

ऐसे में सत्ता द्वारा लेखकों एवं कलाकारों पर सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ने और जनता की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आरोप लगाना ही सबसे आसान होता है। जब तक लेखक सत्ता की विचारधारा के अनुरूप लिखता रहता है तब तक न तो सांप्रदायिक माहौल बिगड़ने का खतरा रहता है और न ही जनता की भावनाओं को ठेस पहुंचने का डर। अब समय आ गया है कि हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विभिन्न टिप्पणियों से भावनाओ के आहत होने की संभावना की पुन: समीक्षा करें। लोकतंत्र में अगर सत्ता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं देती है तो यह तानाशाही है।

इसलिए सत्ता को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करनी चाहिए। सवाल यह है कि भावनाओं के आहत होने की संभावना को आंकने का पैमाना क्या है? क्या सत्ता या फिर किसी व्यक्ति के कह देने या आरोप लगा देने भर से यह माना जा सकता है कि समाज की भावनाएं आहत हुुर्इं हैं? क्या ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर गहन चिंतन की जरूरत नहीं है? ऐसे मुद्दों पर यदि सरकार समाज से धैर्य की उम्मीद रखती है तो क्या समाज को इतना भी अधिकार नहीं है कि वह सरकार से भी धैर्य और गंभीरता की उम्मीद रखे?

ऐसे संवेदनशील आरोपों पर लेखक या फिर अन्य व्यक्ति को गिरफ्तार करने या मुकदमा चलाने से पहले किसी न्यायाधीश के माध्यम से जांच कराई जानी चाहिए। इस जांच में निष्पक्षता के साथ यह परखा जाना चाहिए कि टिप्पणी करने वाले व्यक्ति का प्रयोजन क्या है?

वह जानबूझकर माहौल खराब करने के लिए यह टिप्पणी कर रहा है या फिर किसी मुद्दे पर निष्पक्षता के साथ अपनी राय रख रहा है? इस जांच में टिप्पणी करने वाले व्यक्ति का पिछला इतिहास भी देखा जाना चाहिए। व्यक्ति के व्यक्तित्व और पिछले इतिहास से काफी बातें स्पष्ट हो जाती हैं। इन सब बातों की जांच करने के बाद ही गिरफ्तारी/मुकदमा करने या न करने का निर्णय लिया जाना चाहिए।

दरअसल सत्ता में बैठे लोग विरोधी आवाज को दबाना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं। वे यह नहीं समझते हैं कि विरोधी आवाज को जितनी तीव्रता के साथ दबाने की कोशिश की जाएगी, वह उतनी ही तीव्रता के साथ सत्ता को आईना दिखाने का हथियार बन जाएगी। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि सत्ता संवाद की भाषा नहीं जानती है। वह केवल आदेश की भाषा जानती है। संवादहीनता की स्थिति ही सत्ता के लिए खतरे की घंटी बन जाती है। सत्ता की अपनी कुछ जिम्मेदारियां होती हैं।

हालांकि ऐसा नहीं कहा जा सकता कि सत्ताएं लेखकों एवं कलाकारों का सम्मान नहीं करती हैं लेकिन उनके सम्मान की भावनाएं विचारधारा के अनुरूप बदलती रहती हैं। इस तरह सत्ताएं अपना विरोधाभासी चरित्र ही उजागर करती हैं। सरकार का यह विरोधाभासी आचरण स्पष्ट रूप से यह संकेत करता है कि सत्ता का चरित्र अपनी सुविधानुसार बदलता रहता है। सत्ता के चरित्र में बार-बार होने वाला यह परिवर्तन ही समाज के विकास में अवरोध उत्पन्न करता है।

दरअसल इस दौर में सरकारें नैतिक रूप से कमजोर हो गई हैं। यही कारण है कि उनमें विरोधी आवाज को सुनने की क्षमता नहीं है। सरकारों को यह समझना चाहिए कि विरोधी आवाज को सुनने से सत्ता कमजोर नहीं होती है बल्कि मजबूज होती है। इसलिए सत्ता में अपना विरोध सुनने एवं सहने की क्षमता होनी चाहिए।

संवाद के बिना लोकतंत्र मात्र भोगतंत्र बन जाता है, जिसमें सत्ता भोगने की प्रवृति ही प्रबल होती है। सरकारों को लगातार ऐसी कोशिश करती रहनी चाहिए, जिससे विरोधी विचारधारा वाले नागरिकों, पत्रकारों, लेखकों और कलाकारों में भी विश्वास स्थापित हो सके। विरोधी विचारधाराओं वाले लोगों से संवाद की गुंजाइश हर हाल में कायम रहनी चाहिए। सत्ता पूरे देश की और पूरे देश के लिए होती है। अभिव्यक्ति पर अंकुश लगाने की कोशिश सत्ता को संदिग्ध ही बनाती हैं। इसलिए हर हाल में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा होनी चाहिए।


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