भारत-चीन की सरहद (एलएसी) पर तकरीबन 13 महीनों तक निरंतर जारी रहे, जबरदस्त सैन्य तनाव के तत्पश्चात दोनों राष्ट्रों के सैन्य कमांडरों के मध्य 10 फरवरी को एक समझौता संपन्न हुआ कि दक्षिण लद्दाख में विद्यमान पैंगोंग झील के उत्तर और दक्षिणी तटों से दोनों देशों की सेनाएं पीछे हट जाएगीं। भारतीय रक्षा मंत्रालय ने अपने बयान में कहा कि पैंगोंग क्षेत्र से दोनों देशों की सेनाएं ने पीछ हट चुकी हैं। उल्लेखनीय है दक्षिण लद्दाख क्षेत्र में अनेक ऊचें-ऊंचे पहाड़ों की चोटियों पर भारतीय सैनिकों द्वारा रणनीतिक तौर पर अपने सैन्य ठिकाने स्थापित कर लिए गए हैं। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने संसद के पटल पर यह भी फरमाया कि चीन द्वारा लद्दाख के 38000 वर्ग किलोमीटर भारतीय क्षेत्र पर आधिपत्य स्थापित किया हुआ है। जबकि प्रधानमंत्री महोदय ने कहा था कि चीन ने भारत की एक भी सैन्य चौकी पर कब्जा नहीं किया है। उल्लेखनीय है कि भारत और चीन के मध्य वर्ष 1962 का भीषण युद्ध लद्दाख में स्थित आक्साईचीन के इसी 38000 वर्ग किलोमीटर इलाके के विवाद को लेकर ही अंजाम दिया गया था। विगत वर्ष जनवरी के महीने से भारत-चीन सरहद पर पर सैन्य तनाव से जबरदस्त गतिरोध कायम बना रहा। भारत चीन के मध्य विद्यमान सरहद को आमतौर पर लाइन आफ एक्च्यूअल कंट्रोल (एलएसी) कहा जाता है।
एलएसी वस्तुत: दोनों देशों के मध्य पचास के दशक से ही गंभीर तौर पर विवादित बनी रही है। अत: एलएसी को दोनों राष्ट्रों द्वारा अधिकारिक तौर पर कदापि तसलीम नहीं किया गया। विगत वर्ष जून में दक्षिण लद्दाख में स्थित गलवान घाटी में भारत और चीन के सैन्य टुकड़ियों के मध्य एक भयानक हिंसक झड़प अंजाम दी गई।
इस खूनी सैन्य झड़प में भारत के 20 और चीन के तकरीबन 40 सैनिकों को अपनी जानें गंवानी पड़ी। लद्दाख की गलवान घाटी पैंगोंग झील के साथ ही एलएसी पर स्थित उत्तरी लद्दाख के देपसांग, गोगरा और हॉट स्प्रिंग क्षेत्र में भी चीनी लालसेना द्वारा अपने सैन्य ठिकाने स्थापित कर लिए गए हैं।
भारत को बहुत अधिक कूटनीतिक कौशल और सैन्य मजबूती के साथ इन सभी इलाकों को चीनी लाल सैनिकों के आधिपत्य से मुक्त कराने की कोशिशें तेज कर देनी चाहिए। क्योंकि देपसांग क्षेत्र से दौलत बेग ओल्डी और कारोकोरम दर्रे को आसानी से लाल सेना अपना निशाना बना सकती है, जोकि भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रणनीतिक क्षेत्र हैं। सियाचीन के दुर्गम रणनीतिक क्षेत्र में पाकिस्तान का निर्णायक सैन्य मुकाबला करने में उत्तरी लद्दाख के देपसांग क्षेत्र का अहम किरदार रहा है। कुछ वक्त पहले चीन ने तिब्ब्त-भूटान सरहद पर के द्रोवा गांव में बड़ा सैन्य ठिकाना निर्मित किया है और सिक्कम में नाथूला के निकट एक वायुसेना अड्डा बना लिया है।
भारत और चीन के मध्य तकरीबन चार हजार किलोमीटर लंबी सरहद विद्यमान रही है। विस्तारवादी फितरत के राष्ट्र चीन द्वारा 1950 के दशक से ही भारतीय जमीन पर शनै: शनै: अतिक्रमण करके आधिपत्य स्थापित करने की रणनीति अख्त्यार की गई। अंतत: आक्साईचीन पर आधिपत्य स्थापित कर लिया गया था।
2017 में भूटान के डोका ला इलाके में अपने सैन्य ठिकाने निर्मित करने प्रारम्भ किए गए तो भारत द्वारा बाकायदा कड़ा सैन्य विरोध प्रकट किया गया। उल्लेखनीय है कि भूटान की सैन्य हिफाजत करने की जम्मेदारी भारत पर रही है, अत: भारत द्वारा डोका ला में अपनी सेना तैनात कर दी गई, आखिरकार दो महीनों की निरंतर सैन्य तकरार के बाद डोका ला विवाद का निदान तो कर लिया गया।
साऊथ चाइना सागर में स्थित अनेक द्वीपों पर शनै: शनै: कब्जा जमाने की रणनीति को चीन अंजाम देता रहा है। वियतनाम फिलिपीन, जापान, कंबोदिया, लाओस, थाईलैंड आदि देशों के कड़े प्रतिरोध और इंटरनेशनल कोर्ट आफ जस्टिस द्वारा चीन के विरुद्ध दिए गए निर्णय के बावजूद चीन दूसरे देशों की जमीन पर कब्जा जमाने की अपनी रणनीति से कदम पीछ नहीं हटा रहा है।
यक्ष प्रश्न है कि चीन की विस्तारवादी फितरत को मद्देनजर रखते हुए भारत को चीन पर अब कितना अधिक भरोसा करना चाहिए। लद्दाख से लेकर अरुणाचलम तक संपूर्ण एलएसी पर भारत और चीन के मध्य अभी भी सैन्य तनाव निरंतर बना हुआ है। पैंगोंग झील से दोनो तटों से दोनों देशों की सेनाओं के पीछे हटने की एक बहुत अच्छी शुरुआत हुई, किंतु कूटनीति और सैन्य वार्ताओं की कामयाबी की वास्तविक परीक्षा तो देपसांग और अरुणाचलम क्षेत्र में की जानी है, जिस पर 50 के दशक से चीन अपना दावा पेश करता रहा है।
भारत और चीन बड़े व्यापारिक साझीदार हैं और अनेक अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर साझीदार के तौर पर सक्रिय रहे है। ब्रिक्स, शंघाई सहयोग संगठन, एशिया इंफ्रास्ट्रकचर इंवैस्टमैंट बैंक, ब्रिक्स डवलैपमैंट बैंक आदि आदि। आजकल चीन का कड़ा और रणनीतिक मुकाबला वस्तुत: अमेरिका के साथ है, जोकि आर्थिक और सैन्य शक्ति के तौर पर चीन का सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी है।
डोनॉल्ड के पराजित हो जाने और जो बाइडेन अमेरिका के राष्ट्रपति पद पर आसीन हो जाने के तत्पश्चात भी चीन और अमेरिका के मध्य जारी तनाव के शैथिल्य हो जाने के बहुत ही कम आसार है। भारत कूटनीतिक तौर पर सभी विश्व शक्तियों के साथ मधुर संबंध बनाए रखने का सदैव हिमायती रहा है।
दक्षिण एशिया में चीन की सैन्य दादागिरी से निपटने के लिए भारत को क्वाड में रणनीतिक तौर पर सक्रिय होना पड़ा है जिससे कि चीन और रुस दोनों ही देश सशंकित हो उठे हैं और क्वाड की सक्रियता को अपने खिलाफ अमेरिका की साजिश करार देने लगे हैं। भारत की रूस के साथ प्रगाढ़ और अटूट दोस्ती सदैव कायम बनी रही है और इतिहास में गहन संकट के दौर में प्रत्येक कसौटी पर खरी उतरी है।
क्वाड रणनीति के विषय में भारत ने रूस को भरोसा दिया है। भारत चीन के साथ भी मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित करना चाहता, किंतु चीन की विस्तारवादी कुटिल कूटनीति और रणनीति का भारत कड़ा मुकाबला करेगा। जैसा कि लद्दाख से लेकर अरुणाचलम तक अपनी पचास हजार सेना को सरहद पर तैनात करके भारत द्वारा चीन को स्पष्ट संकेत दे दिया है।
वस्तुत: भारत कदापि चीन पर भरोसा नहीं कर सकता, क्योंकि जेहादी पाकिस्तान को अपना अंधी हिमायत प्रदान करके चीन द्वारा सदैव भारत के प्रति शत्रु राष्ट्र सिद्ध होने का किरदार का निभाया है। भारत को वस्तुत: भविष्य में भी पाकिस्तान और चीन संयुक्त सैन्य शक्ति का मुकाबला करना है। अत: अपनी सैन्य तैयारियों की तेज रफ्तार को बाकायदा कायम बनाए रखना होगा।