
हिंदी की पत्रकारिता और उसके साहित्य का सम्बन्ध इतना अन्योन्याश्रित रहा है कि पिछले दिनों एक प्रतिष्ठित सम्पादक को सार्वजनिक रूप से यह स्वीकारने में संकोच नहीं हुआ कि इस पत्रकारिता के पास तोप से लड़ने का हौसला साहित्य की मार्फत ही आया। तब, जब गोरी सत्ता के एक के बाद एक क्रूरता की सारी हदें पार करती जाने के दौर में मशहूर उर्दू साहित्यकार अकबर इलाहाबादी ने लिखा-‘खींचो न कमानों को न तलवार निकालो, गर तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो।’ यों, अखबारों की शक्ति में ऐसा विश्वास जताने वाले अकबर इलाहाबादी अकेली शख्सियत नहीं हैं। नेपोलियन बोनापार्ट ने भी कहा ही है कि चार विरोधी अखबारों की मारक क्षमता के आगे हजारों बंदूकों की ताकत बेकार हो जाती है। इसी तरह मैथ्यू आर्नल्ड की मानें तो पत्रकारिता जल्दी में लिखा गया साहित्य ही है, क्योंकि जैसे भावों का भरोसा साहित्य हुआ करता है, तथ्यों का भरोसा पत्रकारिता हुआ करती है।