Tuesday, May 5, 2026
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एक आंदोलन की तरह था जुबीन का जीवन

डॉ. संजय सिंह

जुबीन ने हिम्मत से कहा था कि ‘मेरा कोई जात नहीं, मेरा कोई धर्म नहीं, मेरा कोई भगवान नहीं, मैं मुक्त हूं, मैं ही कांचनजंघा हूं।’ यह कहने का साहस आज दुनिया में कितने कलाकारों या लोगों में है? स्वयं को सभी बंधन और पहचान से आजाद करना और मानवता की पहचान के साथ जोड़ना – ठीक टैगोर की भाषा में कहें तो-‘चित्त येथा भय शून्य, उच्च येथा सिर।’ कांचनजंघा की तरह हमेशा खड़ा रहने की जिद और प्रतिज्ञा, हिम्मत और विनम्रता के साथ।

जुबीन का जीवन सचमुच एक आंदोलन रहा-एक ऐसा आंदोलन जिसमें सुर है, ताल है, छंद है, जिसमें मिट्टी की गंध है, नदी की धार है, ख्वाब हैं और ख़्वाबों का बिखरना-संवरना भी है। जुबीन गर्ग की आवाज सिर्फ गीत नहीं, आंदोलन बन गई। उनका हर गीत केवल संगीत नहीं था, बल्कि सामाजिक जागरूकता और न्याय के लिए खड़ी आवाज थी। यह आवाज लोगों को जोड़ती, बेचैनी और शांति, दर्द और खुशी, सबको एक साथ महसूस कराती थी। लोगों को जगाने का साहस उनकी धुनों में हमेशा मौजूद रहा।

उनकी बांग्ला और असमिया रचनाएं लोगों के दिलों में गूंजती हैं। दुगार्पूजा से पहले उनका जाना न केवल असम, बल्कि बंगाल समेत समूचे उत्तर-पूर्व में शोक की लहर छोड़ गया। ‘लुइत कंठो’ अर्थात ‘ब्रह्मपुत्र की आवाज’ कहे जाने वाले जुबीन गर्ग ने असम और पूर्वोत्तर भारत के लोगों को उनकी सांस्कृतिक पहचान से जोड़ा। उनकी प्रेरणा ने नए कलाकारों को भी लोक-संस्कृति, भाषा और परंपराओं को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित किया।

18 नवम्बर 1992 को मेघालय के तुरा में मोहीनी मोहन बढ़ठाकुर के घर जन्मे जुबीन गर्ग के पिता मजिस्ट्रेट होने के साथ-साथ लेखक भी थे और माता एक गायिका। पिता का तबादला बार-बार होता था इसलिए परिवार लगातार अलग-अलग जगहों पर रहा और जुबीन झ्र जो ‘गोल्डी दा’ कहलाते थे – को अलग-अलग स्कूलों में पढ़ाई करनी पड़ी। इसी दौरान जुबिन ने अनेक भाषाएं सीखीं और बाद में वे भाषाओं और बोलियों की लडाई को खत्म करने का सपना देखने लगे। वे किसी एक भाषा के वर्चस्व या दमन को स्वीकार नहीं करते थे। जुबिन ने अपने नाम के पीछे बढ़ठाकुर हटाकर गर्ग रखा था जो उनका गोत्र था।

उनकी यह सोच उनके गीतों में भी झलकी। उन्होंने 40 से अधिक भाषाओं में गाया-असमिया, बंगाली, हिन्दी, अंग्रेजी, मलयालयम से लेकर विष्णुप्रिया मणिपुरी, बोडो, डिमासा, टिया जैसी जनजातीय भाषाओं तक में उनके गीत हैं। छोटे-छोटे समुदायों की भाषाओं में गाए उनके गीत बेहद लोकप्रिय हुए। जुबीन का मानना था-‘हमारी भाषा को ‘बोली’ कहकर उसका अपमान न करें, क्योंकि उनमें हमारी हजारों साल की सीख, संस्कृति और विरासत सन्निहित है।’

उन्होंने असम में हिन्दी-असमिया भाषा विवाद को समाप्त करने का प्रयास किया। ‘बिहू पर्व’ पर उन्होंने हिन्दी गीत गाया, ताकि लोग समझें कि भाषा विवाद दरअसल वास्तविक समस्या नहीं है, उसकी राजनीति ही असली समस्या है। बंगाल में भी वे उतने ही लोकप्रिय हुए और वहां उन्हें कई राष्ट्रीय पुरस्कारों के साथ-साथ गहरा स्नेह मिला। असम में वे जुबिन दा और बंगाल में ‘गोल्डी दा’ -दोनों नामों से सबके प्रिय बने। पिछले 33 वर्षों से जुबीन असम की जनता, विशेषकर युवाओं के दर्द, निराशा, गुस्से और विद्रोह को अपनी गायकी से आवाज देते रहे और सबके जीवन में शोषण और वंचना के प्रतिरोध का हथियार बने।

जब ‘एनआरसी’ (नेशनल रजिस्टर आफ सिटिजन्स) का विरोध-प्रदर्शन शुरू हुआ तब जुबीन पीछे नहीं हटे। सरकार आक्रामक थी, दमन चरम पर था, लाखों लोग कैंपों में शरणार्थी की तरह रहने को मजबूर थे। यह दृश्य जुबीन से देखा नहीं गया। वे केवल गीत गाने तक सीमित नहीं रहे, बल्कि खुद सड़कों पर उतर आए। उनका विरोध दिखावे या नाम चमकाने के लिए नहीं था, बल्कि पीड़ितों की वास्तविकता से उपजा था। वे लोगों के बीच जाते, उन्हें प्रेरित करते और आंदोलनों को शांतिपूर्वक चलाने की अपील करते। जब युवा अशांत होते, तो वे अपने गीतों से उन्हें शांति का संदेश देते।

उन दिनों असम के लाखों लोग अपने सालों पुराने पुश्तैनी घर, जमीन और रोजगार से वंचित हो गए थे। असहायता और गुस्से के बीच जुबिन उनके लिए सहारा बने। उन्होंने पीड़ितों की आवाज दिल्ली और दुनियाभर में पहुंचाई। कोलकाता में भी इसका बड़ा असर हुआ और असम की जनता के लिए गहरी सहानुभूति पैदा हुई। असम की बाढ़ और कोरोना जैसी आपदाओं में उन्होंने राहत कार्यों में योगदान दिया और लोगों को मदद के लिए प्रेरित किया। अपने घर को ही कोरोना राहत में सबके लिए खोल दिया।

इस तरह जुबीन केवल गायक नहीं रहे, बल्कि एक आंदोलन बन गए – सुरों से संघर्ष तक का आंदोलन। ‘गोल्डी दा’ ने अपने घर के सामने एक चीड का पेड़ लगाया था। वे अक्सर उस पेड़ से लिपटकर बातें किया करते थे और कहते थे – ‘यह पेड़ जब तक जिंदा है, मैं भी उतने दिन जिंदा रहूंगा।’ इस साल आए तूफान में वह पेड उखड़ गया। अपने वचनों को इतना पक्का निभा देंगे ‘गोल्डी दा’ – यह तो उनके साथियों ने सोचा भी नहीं था।

वर्ष 1991 में ‘बी बरुआ कॉलेज’ में ग्रेजुएशन की परीक्षा के दौरान जुबीन ने अपनी उत्तर पुस्तिका बिल्कुल खाली छोड़ दी। कॉलेज के अध्यक्ष ने उन्हें अपने कमरे में बुलाकर कारण पूछा। ‘गोल्डी दा’ का सीधा जवाब था – ‘मैं गाता हूं, यह सब मेरे लिए नहीं है।’ अध्यक्ष जी गुस्से में पूछ बैठे – ‘गाना गाने से क्या पेट भरेगा?’ लेकिन अगले ही साल उनका एल्बम ‘अनामिका’ जबरदस्त लोकप्रिय हुआ और जुबीन एक सितारे की तरह उभर आए। यही नहीं, कॉलेज की स्वर्ण जयंती पर वही जुबीन, जिसने एक बार वॉकआउट किया था, मुख्य अतिथि के रुप में उपस्थित थे। उस दिन कॉलेज का मान और शोभा दोनों कई गुना बढ़़ गई।

जुबीन ने हिम्मत से कहा था कि ‘मेरा कोई जात नहीं, मेरा कोई धर्म नहीं, मेरा कोई भगवान नहीं, मैं मुक्त हूं, मैं ही कांचनजंघा हूं।’ यह कहने का साहस आज दुनिया में कितने कलाकारों या लोगों में है? स्वयं को सभी बंधन और पहचान से आजाद करना और मानवता की पहचान के साथ जोड़ना – ठीक टैगोर की भाषा में कहें तो – ‘चित्त येथा भय शून्य, उच्च येथा सिर।’ कांचनजंघा की तरह हमेशा खड़ा रहने की जिद और प्रतिज्ञा, हिम्मत और विनम्रता के साथ।

उनकी अंतिम यात्रा में लाखों लोग शामिल हुए – यही सबूत है कि उनका प्रभाव और सम्मान कितना गहरा था। यह माहौल ठीक उसी तरह था, जैसे 9 नवम्बर 2011 को भूपेन हजारिका के अंतिम दर्शन के समय था। असम के लोगों को भरोसा था – भूपेन दा तो नहीं रहे, परंतु जुबिन दा तो हैं। ऐसा भरोसा और लोगों के साथ जुबीन के मजबूत रिश्तों और गहराई की अनुभूति कराता है। जुबीन के अंतिम समय के साक्षी, यंत्रशिल्पी साथी शेखर गोस्वामी को उन्होंने ही तैरना सिखाया था और कहा था – ‘तैरने से डरना नहीं, समुद्र किसी को नहीं डुबोता।’

प्रकृति की इस विशालता पर इतना भरोसा और साथियों को हौसला बढ़ाते देखना, जुबीन की हर परफॉर्मेंस में झलकता था। जुबीन बहुत ही सहज थे। असमी सरलता हमेशा उनके व्यवहार में अभिव्यक्त होती है। उनके गानों में भी यही सरलता एक मिठास बनकर दिलों को छू जाती थी। नदियों, पहाड़, खेत, खलिहान, मिट्टी-रिश्ते, सब कुछ उनके गानों से गुजरते हुए अपनेपन से लोगों को अपने गांव, अपनी जमीन और आसपास से जोड़ देता था। वह लोगों को एक नई पहचान देते थे – खुद से।

जुबीन को लोग समाजवादी कहते थे, लेकिन वे चेग्वेवारा को मानते थे। वे भूपेन दा और बंगाल-असम के अनेक मनीषियों से प्रभावित थे। आंदोलन में वे गांधी से सीख लेते थे और अहिंसा के रास्ते पर चलने का प्रयास करते थे। लोगों को अब भी लग रहा है कि ‘जुबिन दा’ दो रंगों के जूते, मनमोहक विचित्र टोपी और मुस्कान के साथ स्टेज पर हाजिर होकर अपने चाहने वालों से कह देंगे-‘मैं वापस आ गया हूं।’

मोहिनी मोहन बढ़ठाकुर शायद दुनिया के अकेले पिता होंगे जिन्होंने अपने बेटे की जीवनी लिखने की घोषणा की। उनकी पत्नी गरिमा ने कहा कि जुबीन को खूब प्यार किया है, आप लोगों ने। उन्हें आखिरी समय शांतिपूर्वक देखिए। अंतिम बिदाई में उन्होंने जुबीन के लिए पान और सुपारी से विदा किया। यह पल भावुक करने वाला था। जनता की भावना इतनी व्यापक थी जैसे शोक की अचानक बाढ़ आ गई। कई घंटे हो गये असम को जुबिन दा विहीन हुए, पर जुबिन दा को भरोसा था झ्र ‘शो मास्ट गो आॅन,’ कोई और आएंगे, फिर से साहस जगाने और प्यार बरसाने के लिए।

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