
सदाचार शब्द संस्कृत के सत और आचार शब्दों से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है सज्जन का आचरण अथवा शुभ आचरण। इस सदाचार को धारण करने वाला व्यक्ति सदाचारी कहलाता है। सदाचार मनुष्य का आभूषण है। सदाचार को धारण करना मानवता को प्राप्त करना है। सच्चरित्रता के लिए यह आवश्यक है कि भय की प्रवृत्ति पर नियंत्रण प्राप्त किया जाए तभी हमारे ह्रदय में ऊंचे आदर्श और स्वस्थ प्रेरणाएं पनप सकती हैं। जीवन में अच्छे चारित्रिक गुणों के विकास हेतु यह आवश्यक है कि स्वयं को बुरे वातावरण से दूर रखा जाए।
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अपने चरित्र निर्माण हेतु सदैव भले और बुद्धिमान लोगों का संगत करना चाहिए। बुरे लोगों का साथ छोड़कर अच्छे विचार मन में अनुग्रहित करना चाहिए। आदर्श चरित्र के लिए मन, वचन, और कर्म की एकरूपता का होना भी आवश्यक है। चरित्रवान व्यक्ति की कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं होता हैं। वे परोपदेशक नहीं होते हैं। सदाचार के आधार पर ही धर्म की स्थिति संभव है। जो आचरण मनुष्य को ऊंचा उठाया उसे चरित्रवान बनाए वह धर्म है वही सदाचार है। महाभारत में कहा गया है धर्म की उत्पत्ति आचार्य से ही होती है। शील, सत्य, भाषण, अहिंसा, क्षमा, करुणा और परोपकार जिनके सदाचार कहा जाता हैं, वही धर्म के प्रमुख गुण हैं। अत: सदाचार को धारण करना ही धर्म को धारण करना है। सदाचार मनुष्य के संपूर्ण गुणों का सार है। जो उसके जीवन को सार्थकता प्रदान करता है। सत्य भाषण, उदारता, विशिष्टता, विनम्रता, सुशीलता, सहानुभूति आदि गुण जिस व्यक्ति में होते हैं, वह सदाचारी कहलाता है। उस व्यक्ति की समाज में प्रतिष्ठा होती है। उसे समाज ने आदर और सम्मान मिलता है।
-सूर्यदीप कुशवाहा


