- मां ही है जो खुद दु:खों का पहाड़ उठाकर औलाद को रखती है खुश
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: मेरी दुनिया मां तेरे आंचल में शीतल छाया दे दु:ख के जंगल में। सच सिर्फ मां ही है जो खुद दु:ख का पहाड़ सिर पर रखकर अपनी औलाद को खुश रखने का ताउम्र प्रयत्न करती है। ऐसी मां भी है जिनके पति दुनिया छोड़कर पत्नी को मझधार में अकेले छोड़कर चले गए और वह महिलाएं दुनिया की चुनौतियों का सामना करते हुए अपने परिवार को चला रही है।
माता-पिता का साया उठने के बाद निभाया मां का फर्ज
कहते है मां के अलावा कोई नहीं होता है, लेकिन बड़ी बहन भी मां का स्वरुप होती है। मां बाप का साया यदि बच्चों के सर से उठ जाए तो बच्चों के लिए जिदंगी जीना कठिन हो जाता है। कैंट निवासी रेखा सिंह के सिर से 12 साल की उम्र में मां-बाप का साया उठ गया था जिसके बाद उन्होंने अपने तीनों भाई बहन की मां की तरह सेवा की और उनकी जिम्मेदारी संभाली। इतना ही नहीं अपने भाई बहनों को पैरों पर खड़ा करने में भी रेखा ने कोई कसर नहीं छोड़ी।
माता-पिता के जाने के बाद रेखा ने हिम्मत नहीं हारी और खुद विवाह करने के बाद अपने भाई-बहन को भी देखती रही और अपने बच्चों का भी लालन पोषण किया। उनके इस कार्य में पति ने भी पूरा सहयोग किया। 2020 में रेखा ने अपनी छोटी बहन का विवाह किया और रेखा व उनके पति ने मिलकर उनका कन्यादान भी किया। रेखा कहती है कि अपनों का सहयोग करना सबसे बड़ा कार्य होता है।
बच्चों को बेहतर शिक्षा देने का कर रही कार्य
मां एक ऐसा शब्द है जिसमें प्रेम अलग ही छलकता है। वहीं बच्चों के सर पर माता-पिता यानि की दोनों का साया होना बेहद जरूरी होता है। मगर दोनों में से एक न रहे तो मुश्किल का सामना दोनों में से एक को ही करना होता है। सपना गोयल के पति की मृत्यु हुए 12 साल हो गए है।
उनके पति अकेले थे जिनकी मृत्यु के बाद सपना तो अकेली हो ही गई थी साथ ही उनके पति के माता-पिता और उनके दो बच्चों की जिम्मेदारी भी उनपर आ गई थी। मां अपने बच्चों के लिए कुछ भी कर सकती है इसलिए सपना ने हिम्मत न हारते हुए जहां अपने बच्चों को कामयाब बनाने का प्रयास किया वहीं अपने परिवार का भी पूरी तरह से ध्यान रखा। सपना का बेटा मेडिकल की पढ़ाई कर रहा है और बेटी भी अब ग्रेजुएशनमें आ चुकी है।
पति की मृत्यु के बाद बच्चों को बनाया कामयाब
कसेरूखेड़ा निवासी सत्यवती के पति की मृत्यु 2003 में हो गई थी। जिसके बाद उनके कंथों पर दो बच्चों का बोझ आ चुका था, लेकिन सत्यवती ने हार ने मानते हुए खुद को पैरों पर खड़ा कर अपनी बेटी कोमल और बेटे विपिन को अच्छी से अच्छी शिक्षा प्रदान करने का प्रयास किया। सत्यवती की पुत्री कोमल ने बताया कि जब उनके पिता की मृत्यु हुई थी तब वह छह साल की थी और उनका भाई दो साल का था।
मेरी मां ने मुझे बैंगलोर पढ़ाई करने के लिए भेजा और फिर मेरी नौकरी लग गई, लेकिन तीन साल पहले मेरी मां अचानक से बीमार हो गई और मुझे उनकी देखरेख करने के लिए नौकरी छोड़नी पड़ी अब भाई की भी नौकरी लग गई है। हम आज जिस मुकाम पर है यह सब हमने अपनी मां की वजह से पाया है।

