
लिखते-लिखते अंगुलियां हिलने लगी हैं। बाल सफेद झक हो गए हैं। आंखों के नीचे सड़क से भी गहरे गड्ढ़े पड़ गए हैं। एक अच्छे खासे इंसान से किसी म्यूजियम में रखे जाने वाले आइटम बन चुके हैं। लेकिन आज तक कोई भी पुरस्कार हमको नहीं मिला है। पुरस्कार के मामले में चाहे पैर कब्र में लटक जाएं; फिर भी इच्छाएं कभी नहीं मरती! एक अदद पुरस्कार पाने की जिद, हम भी पूरी कर के ही रहेंगे। हम अपने अन्वेषक मित्र घुमन्तु प्रसाद की शरण में पहुंचे। कहा, ‘भैया, साहित्यिक देवालयों के पत्थर-पत्थर पूजने के बाद भी हमें आज तक कोई पुरस्कार नहीं मिला। क्या तुम कोई खोज कर ला सकते हो जो हमारी साहित्याग्नि को ठंडा कर सके?’ उसने दूरबीन उठाकर साहित्याकाश को दूरदृष्टि से देखा। फिर वादा किया एक पुरस्कार का जुगाड़ जरूर करेंगे।
यह सुनकर खुशी से हमारे शरीर की हड्डी-पसलियां किसी भूकंप क्षेत्र की बिल्डिंग की तरह से हिलने लगीं। दांतों के कटकटाने से, किसी शास्त्रीय राग के आखिरी दौर जैसी; तबले की जुगलबंदी की आवाज निकलने लगी। एक अदद पुरस्कार के आश्वासन मात्र से जिस्म का ये हाल है तो उस दिन क्या होगा ,जब यह मिलेगा! खुशी के आंसू तो हमने मन के बांध पर जैसे-तैसे रोक लिए। लेकिन आंखों से नींद खुद-ब-खुद किसी भगौड़े जैसे कहीं भाग गई।
घुमंतू प्रसाद कई-कई दिन तक दिखाई नहीं दिए। मोबाइल भी आउट आॅफ रेंज आ रहा था। हम यह सोचकर चुप रहे कि शायद वह साहित्य के घने बियाबान में, शेर-बघेरों की नजरों से बचाते हुए, किसी पुरस्कार का समाचार हमारे लिए लेकर आ रहे होंगे। कुछ दिन बाद वह किसी बेरोजगार की मानिंद सारी परीक्षाएं देकर भी खाली हाथ लौट आए। बोले, ‘आप चिंताओ मत। हम कोई न कोई जुगाड़ कर के रहेंगे।’
पुरस्कार की आस में कुछ दिन और निकल गए। रेगिस्तान में बारिश के इंतजार जैसे आंखें हर पल साहित्य के आकाश पर टिकी रहीं। फिर एक दिन घुमंतू बाबू बजट जैसी घोषणाओं का ब्रीफकेस ले कर आए। बोले, ‘भैया जी , एक योजना लेकर आए हैं। आजकल बिना योजना कोई काम भी तो नहीं होता!’
हमने उतालवे होकर इंतजार में बैठे थे। उन्होंने कहा कि एक भव्य समारोह में आपको ‘टीटीए अवार्ड’, दिया जाएगा। इसके तहत शाल, श्रीफल और इक्यावन हजार रुपये की नकद राशि प्रदान की जाएगी।’ यह सुनकर हमारी बांछें खुशी से इंडिया गेट जितनी फैल गर्इं। लेकिन अगले ही पल ये सारी खुशी किसी मजदूर की तरह; बिना सुरक्षा व्यवस्था के मानों बीस माले की बिल्डिंग से नीचे गिर कर चारों खाने चित्त हो गई।
ये क्या? टीटीए अवार्ड मतलब ‘तेरा तुझको अर्पण पुरस्कार’? माने हम ही रुपये दें और हमें मंच पर वही राशि अवार्ड के रूप में लौटा दी जाएगी! घुमन्तु बाबू ने पुरस्कार का अर्थशास्त्र समझाते हुए बताया, ‘बाहर किसे पता लगेगा! अपने पैसे वापस अपनी तिजोरी में आ जाएंगे और मीडिया इस पुरस्कार की खबरों से हिलोरे मारता उफनेगा। चारों दिशाओं से बधाइयों की बाढ़, आपके दु:ख के पहाड़ों को बहा ले जाएगी।’
हमारी मोटी बुद्धि में यह बात थोड़ी देर से घुसी। फिर क्या? एक भव्य समारोह हुआ। मंच से उद्घोषक ने चहकते हुए पुरस्कार की घोषणा की। तालियों की गूंज के बीच मीडिया के कैमरे, फ़्लैश चमका रहे थे। हम पुरस्कार पाकर नकली हंसी के साथ पुलकित होने का पोज दे रहे थे। दूसरे दिन साहित्य जगत में ‘टीटीए अवार्ड’, मिलने पर मन की सूखी धरा पर बधाइयां जमकर बरस रहीं थीं। कई बार पुरस्कार पाने के लिए दूरदृष्टि की जगह, पास वाली दृष्टि काम आती है। अंदर की बात किसे पता है?


