Monday, March 16, 2026
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वर्ष 1965 से आस्था का केंद्र बना है गोल मंदिर

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: शास्त्रीनगर स्थित गोल मंदिर अपने आकार और मनोकामना पूरी होने की वजह से प्रसिद्ध है। मंदिर का नाम मंदिर के आकार के कारण ही रखा गया है।

शहर के बाहर से भी लोग मंदिर में मां से मनोकामना मांगने के लिए आते हैं। मान्यता है कि मंदिर में सच्चे मन से मांगी गई मनोकामना माता रानी पूरी करती है। जिससे यहां पर दूरदराज से भी भक्तों का आना लगा रहता है।

प्रत्येक नवरात्रो के दिनों में हर वर्ष विशेष माता की चौकी सजाई जाती है, जहां काफी लोग चौकी में आते थे। लेकिन इस बार कोरोना संक्रमण काल के चलते मंदिर परिसर में कोई बड़ा आयोजन नहीं किया जा रहा है।

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मंदिर से हुआ मां की आरती का लाइव प्रसारण

शास्त्रीनगर स्थित गोल मंदिर में नवरात्र के अवसर पर भक्तों के लिए आरती का लाइव प्रसारण किया जा रहा है। जिसमें घर बैठे ही मां की अनुपम छठा देखी जा सकती है। मंदिर में नवरात्र के दिनों में आम तौर पर भीड़ लगी रहती है, लेकिन इस बार कोरोना काल के चलते काफी सुरक्षा बरती जा रही है। ऐसे में घर बैठे ही मां दुर्गा की आरती का लाइव प्रसारण सोशल मीडिया के जरिए देखा जा सकता है।

इस तरह हुई थी मंदिर की स्थापना

मंदिर का निर्माण वर्ष 1965 में रिटायर्ड एसपी पंडित छीतर सिंह द्वारा कराया गया था। कहा जाता है कि उनकी धर्मपत्नी माता रानी की भक्त थीं। जिन्हें मां ने सपने में दर्शन दिए। इसके बाद उन्होंने मंदिर का निर्माण कराया। गांधी नगर के रहने वाले छीतर सिंह ने मंदिर के लिए एक हजार वर्ग गज जमीन खरीदी और परिवार की सलाह मशवराह से ऐसा मंदिर बनवाने का निर्णय लिया जो आसपास के मंदिरों से कुछ अलग है। मंदिर का नाम उसके आकार को देखते हुए लिया गया है।

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मंदिर परिसर में स्थित है कल्पवृक्ष

मंदिर परिसर में एक कल्पवृक्ष भी है, जो काफी प्रसिद्ध है। शास्त्रों में कल्पवृक्ष के बारे में कहा गया है कि जो भी भक्त कल्पवृक्ष से मुरादें मांगता है वह पूरी होती है। इसी कारण जो भी श्रद्धालु मंदिर में मां के दर्शन करने आते हैं, वह कल्पवृक्ष से मनोकामना जरुर मांगते हैं।

पहले दिन हुआ मां शैलपुत्री का पूजन

शारदीय नवरात्र के पहले दिन माता रानी के प्रथम स्वरूप शैलपुत्री का पूजन किया गया। कोविड-19 के चलते सभी मंदिरों में सरकार द्वारा जारी की गई गाइडलाइंस को ध्यान में रखते हुए कड़े प्रबंध किए गए। घरों में भी लोगों ने सवेरे ही माता की चौकी की स्थापना करके पहले मां का शृंगार किया और उसके बाद कलश स्थापना की गई। साथ ही महिलाओं ने भी घर की सुख समृद्धि की कामना की और मां को खुश करने के लिए व्रत रखा।

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