
डॉ. पुष्पलता |
पानी कहीं से भी बहे, पत्थर की फितरत है उसे रोकना। नदी नाले या चाहे शरीर से ही क्यों न बहे, साफ हो या गंदा। एक रिटायर्ड जज सुबह उठकर टंकी खोल देते हैं। पानी वेस्ट हो रहा है। कहो तो कहते हैं, नाली साफ हो जाएगी। शरीर में भी नाली बनी है, उसे साफ रखने के लिए भी ज्यादा पानी पी-पी कर वेस्ट करना जरूरी, अन्यथा किडनी में पत्थर बन जाते हैं। किफायती लोगों को फिर इसका अंजाम भुगतना पड़ता है।
गाल ब्लेडर का आॅपरेशन करा चुकी एक परिचित पानी के प्रति इतनी उदार हो गर्इं कि मशीन में नल खुला छोड़ अपनी बहन के यहां चली गर्इं। सोसायटी के सब फ्लैट्स में पानी आ गया। कॉरिडोर में भर गया। लोग भागे फिरते रहे, आ कहां से रहा है? जिनके यहां से आ रहा था, वह तो ताला लगाकर गई थी। सोसायटी के टैंक खाली होते रहे भरे जाते रहे। जब घर पहुंची तो पूछने पर उसने पूरे कॉंफिडेंस से बोल दिया हमारा तो नहीं चल रहा था। यद्यपि गार्ड ने कहा, मैडम छह महीने में जितना यूज होता, उतना वेस्ट हो गया। मगर किसी को बताऊंगा नहीं, वरना सब लोग आपके घर पर आ जाएंगे। उसे भी बहुत अफसोस हुआ। लाइफ के छोटे पत्थर छोटी समस्या की तरह रास्ते से आसानी से हट जाते हैं। पानी की बचत करने वाले लोगों की शरीर की नाली में बड़े पत्थर अटक जाते हैं, जिनको सालों लेजर तकनीक से या फिर एक झटके में आॅपरेशन करवाकर निकलवाना पड़ता है। कब्ज के मरीजों में थोड़ी गंदगी किडनी में पास होकर पत्थर बना देती है। कुछ का लिवर ही नाराज होकर उल्टी-सीधी हरकतें करने लगता है। उससे भी किडनी में पत्थर हो जाते हैं। कुछ की तो जिंदगी की तरह किडनी में पत्थर बनने की टेंडेंसी होती है।
किडनी में पत्थर की समस्या इतनी बड़ी नहीं है, जितने इसके साइड इफेक्ट हैं। सबसे बड़ा साइड इफेक्ट ये कि पत्थर बनता तो किडनी में है, हर बीमारी की तरह दिमाग पर उस गाने की धोल बजाता है छाप तिलक सब छीनी मौसे नैना मिलाइके और दिमाग न चाहते हुए भी हर वक्त उसे सोचने लगता है। मुसीबत तब ज्यादा बढ़ जाती है, जब आॅस्टपोरेसिस कोलेस्ट्राल और सुगर के मरीज की किडनी में पत्थर बन जाता है। छोटा हो तो कोई बात नहीं है, निकल जाता है। कोई व्यक्ति कितना भी हेल्थ कॉन्शियस हो, ऐसी समस्याएं बैठे-बैठाए जकड़ लेती हैं। डॉक्टर कहता है, पानी ज्यादा पियो, सिट्रस चीजें ज्यादा खाओ, चना, भिंडी, अनार, पालक, गोभी, बीन, बैंगन, टमाटर, ककड़ी, खीरा, शिमला मिर्च मखाने, ड्राइफ्रूट्स केल्शियम, प्रोटीन,चावल मत खाओ।
गेहू की रोटी, आलू सुगर बनाती है। मीठे फल सुगर वाले ने बंद कर दिए हैं। आॅस्टपोरेसिस वाले ने केल्शियम बता रखा है। कब्ज का मरीज है सलाद में और वैसे भी कुछ खाने के लिए बचा नहीं है। अब मल्टीग्रेन आटा भी नहीं खा सकता। चना मना है। ईश्वर ने जिनके पास खाने को है, उन्हें खाने लायक नहीं छोड़ा है, जिनके पास नहीं हैं, उन्हें खाने लायक बनाया है, ताकि इधर का माल उधर जाता रहे, संतुलन बना रहे। इधर वाले देखकर खुश रहें न खा पाने की पीड़ा से ग्रसित रहें। उधर वाले खाते रहें, मगर न होने की पीड़ा से ग्रसित रहें। बंदर का पंजा कहानी की तरह जिंदगी में एक चीज के साथ एक समस्या फ्री मिलेगी जरूर मिलेगी। आॅक्टोपस की तरह शरीर को बीमारियों ने कम इस समस्या ने ज्यादा जकड़ लिया है। मुसीबत के इस पंजे से जान छुड़ाई जाए तो दूसरे पंजे शरीर में गड़ा रही होती है। आदमी के पास चार आॅप्शन हैं। सारी चीजें छोड़कर मर जाए या सारी चीजें खाकर मर जाए। इलाज करवाकर मर जाए या बिना इलाज मर जाए। मरना निश्चित है। बच गए तो आपकी किस्मत। मृत्यु अवश्यसंभावी है। आज नहीं तो कल आएगी। बताओ तो सलाहकारों की फौज पॉजिटिविटी के भाले से दिल दिमाग शरीर को गोदने लगती है। किसी से जिक्र करो तो हजारों इलाज हवा में लहरा कर भूत-चुड़ैलों की तरह डराने लगते हैं। डॉक्टर के यहां जाओ तो अस्पताल वाले कसाई उन्हें उनके परिजनों / रिश्तेदारों तक को धीरे-धीरे हलाल कर-कर के लहू निचोड़ने का इशारा डॉक्टर को कर देते हैं।
प्रॉब्लम में डॉक्टर के पास जाओ तो हर अंग का अलग डॉक्टर है। किसके पास जाना है, समझ नहीं आता है। अल्ट्रासाउंड कराने जाओ तो मरीज अगर ये सोचकर जो भी हो पाता चल जाएगा सारे पेट का अल्ट्रासाउंड कर दो कह दे तो वह लिवर से किडनी, किडनी से पेड़ू तक माउस खिसकाने के अलग-अलग रुपये मांगता है। बीमारी स्त्री को हो जाए तो पति खाली जेब होने से अंट संट बकता है। नहीं बकता तो सदमे में गुम हो जाता है। बीमार शर्म से अलग मरने लगता है। डॉक्टर फीस के बाद अल्ट्रासाउंड वाला पेट के हर अंग के ऊपर माउस रखने के तीन हजार वसूल कर खोज करके इस पत्थर का उपहार देता है, जो नाली में फंसे तो डिलीवरी से ज्यादा दर्द का अहसास करवाकर पुरुषों को डिलीवरी के दर्द से परिचित कराता है। स्त्रियां तो परिचित होती ही हैं। यू ट्यूब पर देखो तो कमेंटकर्ताताअें की किडनी में फंसे बड़े- बड़े, छोटे -छोटे पत्थर देखकर हंसी, चिंता,और सैकड़ों इलाज के ग्राइंडर में मरीज सड़क पर खड़े पत्थर पीसने वाले रोलर यंत्र में खुद पत्थर सा घूमने लगता है। औरों के उससे भी बड़े बड़े हैं ये सोचकर उसे राहत मिलती है। किसका कितना बड़ा था, उसकी जानकारी ली जाती है। अभी तक ये सब शरीर में पत्थर है, उसकी जानकारी मिलने तक की प्रक्रिया है। इलाज बाकी है दोस्तो। दुआ करो, वह बकरा कसाइयों के हाथों से हलाल होने के बाद जिंदा बच पाए।
फिलहाल सबसे बड़ी समस्या ये है क्या खाया जाए क्या न खाया जाए। खाएगा तो मरेगा न खाएगा तो मरेगा। पत्थर रूपी बेताल इस विक्रम के कंधे पर चढ़कर कह रहा है बता क्या करेगा? जवाब दे? गलत जवाब देने पर तेरे पत्थर को और बड़ा कर दिया जाएगा। तुझे सोते जगते, पत्थर ही पत्थर नजर आएगा। आगे क्या होगा आप ही सोच लीजिए।आप क्यों सोचेंगे, जिनके किडनी या गाल ब्लेडर में पत्थर है, वे सोचेंगे। आप तो पॉजिटिव रहिये के इंजेक्शन ठोकेंगे। ऊपर चले भी गए तो अपूरणीय क्षति, नमन, आरआईपी, विनम्र श्रद्धांजलि का बुके तो सबके पास तैयार है ही। आदमी खत्म बात खत्म। बीमार स्त्री हो तो पुरुष भन्नाता है, यद्यपि इस छोटे पत्थर के बड़े होने का जिम्मेदार भी वही है। जब समस्या शुरू होती है वह पास आए मक्खी मच्छरों की तरह पत्थर को उड़ाता रहता है। इस धीमी रफ्तार के कारण फिर उसे उसकी सजा ब्याज सहित चुकानी पड़ती है। पुरुष को हो जाए तो उसके पास उससे निपटने का समय नहीं होता। वह उसे टालकर बढ़ाता रहता है। वहां मामला और खतरनाक हो जाता है। लापरवाही में कई बार किडनी हाथ खड़े कर देती है। इसलिए पानी पीते रहो, बहाते रहो यही एकमात्र उपचार है। सप्लीमेंटस फिर भी चुपके से पड़ोसी/मित्र की तरह प्यार से आपकी एक समस्या हल करते हुए ईर्ष्या का पत्थर रूपी गिफ्ट थमा सकते हैं। डॉक्टर जिन चीजों को किडनी स्वस्थ रखने के लिए ये मत खाओ, वो मत खाओ कहता है, उन्हें पहले से ही न खाने के बावजूद पत्थर तो समस्या का पत्थर है आ सकता है। हर समाधान समस्या का जन्मदाता भी पत्थर बना सकता है।


