
अशोक गौतम |
चुनाव के दिन हैं साहब! इन दिनों जो अपने यहां अपने को माशा भर भी नेता समझता है, वह अपने अपने दृष्टिपत्र लिखने लिखवाने में मशगूल हो जाता है। जो बड़ी राजनीतिक कंपनियां हैं, वे अपनी समितियों से दृष्टिपत्र बनवाती हैं तो मेरे जैसे दृष्टिहीन अपने में ही पार्टी होने के चलते खुद ही अपने दृष्टिपत्र बनाने में जुट जाते हैं।
महाबदतमीजी के पवित्र समय में हमाम में नंगे नहाने का किसका मन नहीं करता भाई साहब! आपका भी करता होगा। पर आम आदमी होने के चलते संस्कार बीच में आते होंगे। पर मैंने संस्कारों विचारों का त्याग परित्याग कर दिया है। आगे बढ़ने के लिए यह त्याग परित्याग पहली शर्त होती है। कौन नहीं चाहता कि इस धरती पर आकर अपना ही नहीं, अपनी न देखी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित तो करे ही, सरकारी खर्चे पर अपने पितरों का भी कल्याण करे।
अब बाजार के साथ साथ राजनीति ने भी तरक्की कर ली है। इसलिए पहले जहां चुनाव के दिनों में जनता से वादे किए जाते थे, अब गारंटी दी जाती है। अब लगने लगा है कि कोरे वादों से काम चलने वाला नहीं। जबसे बाजार में कंपनियां अपनी सुई से लेकर तलवार तक की गारंटियां देने लगी हैं तो उनकी देखा देखी में राजनीतिक बाजार में भी गारंटी प्रथा शुरू हो गई है। ऐसे में कुछ राजनीतिक सिद्धहस्त तो स्टांप पेपर तक पर गारंटी दे रहे हैं।
अजब समाज की गजब रीत! कल तक जो धृतराष्ट्र थे, आज वे कुर्सीराष्ट्र हो दृष्टिपत्र बना रहे हैं अपने साथ एक आंख से कानों की समिति लिए। राजनीति में धृतराष्ट्र से खतरनाक कुर्सीराष्ट्र होते हैं। वे अपने साथ किसी विदुर को नहीं, विदूषक को चुनते हैं। अब उनके आसपास विदुर नहीं, विदूषक होते हैं। अब जैसे कैसे अबके जीतना तो मुझे भी है भाई साहब! मैं भी धृतराष्ट्र सा कुर्सीराष्ट्र होना चाहता हूं। इसके लिए मुझे जो नहीं भी करना चाहिए, वह सब कर रहा हूं। जो भी करना पड़ेगा, मैं हसंते हुए सब करूंगा। कोई मुझ पर हसंता हो तो हंसता रहे।
राजनीति में कुर्सी पाने के लिए जो करो सो माफ! वैसे मैं किसी कुर्सी पर बैठने लायक नहीं। नहीं हूं तो क्या हुआ!! लायक यहां कुर्सियों पर बैठे ही कब हैं? जो गलती से बैठे तो उन्हें दूसरे दिन नालायक घोषित कर कुर्सी के घाट उतार दिया गया। यहां तो कुर्सियों पर सभी जुगाड़ से ही बैठे हैं। कल तक जो इनके उनके जलसे के लिए निर्धारित आंकड़ों से अधिक भीड़ जमा करते रहे वे अपने अपने आंकड़ों के हिसाब से पद पाते रहे। ऊंचे पद भीड़ जुटाने का पुरस्कार होते हैं।
चुनाव के इस सीजन में अबके इनकी उनकी तरह मैंने भी तय किया है कि मैं चुनाव के सीजन में जनता को वारंटियां दूं , गारंटियां दूं। अत: मैं धृतराष्ट्र-कम-कुर्सीराष्ट्र अपने पूरे होशोहवाश में अपनी प्रिय प्रजा को गारंटी देता हूं कि मैं जीत जाने पर हर मीटर को हर महीना पचास लीटर फ्री बिजली आठ पहर चौबीस घंटे उपलब्ध करवाऊंगा।
मैं धृतराष्ट्र-कम-कुर्सीराष्ट्र अपने पूरे होशोहवाश में अपनी प्रजा को गारंटी देता हूं कि मैं प्रजाप्रिय सरकार बनने पर अपनी प्रिय प्रजा को सरकारी तो सरकारी, प्राइवेट बसों में भी हर शहरी तो शहरी, किसान भाइयों के पशुओं को भी मुफ्त यात्रा उपलब्ध करवाऊंगा।
मैं धृतराष्ट्र-कम-कुर्सीराष्ट्र अपने पूरे होशोहवास में अपनी प्रिय प्रजा को गारंटी देता हूं कि मैं प्रजाप्रिय सरकार बनने पर अपनी प्रिय प्रजा के नलों में पेट्रोल की फ्री सप्लाई करवाऊंगा।
मैं धृतराष्ट्र-कम-कुर्सीराष्ट्र अपने पूरे होशोहवास में अपनी प्रिय प्रजा को गारंटी देता हूं कि मैं प्रजाप्रिय सरकार बनने पर अपनी प्रिय प्रजा के द्वार द्वार नहीं, चारपाई चारपाई फ्री क्लिनिक खुलवाऊंगा।
मैं धृतराष्ट्र-कम-कुर्सीराष्ट्र अपने पूरे होशोहवास में अपनी प्रिय प्रजा को गारंटी देता हूं कि मैं प्रजाप्रिय सरकार बनने पर अपनी प्रिय प्रजा को हरिद्वार में फ्री में स्नान करवाऊंगा।
मैं धृतराष्ट्र-कम-कुर्सीराष्ट्र अपने पूरे होशोहवास में अपनी प्रिय प्रजा को गारंटी देता हूं कि मैं प्रजाप्रिय सरकार बनने पर पानी की जगह आठ पहर चौबीसों घंटे उन्हें पीने पिलाने का फ्री में पुख्ता इंतजाम करवाऊंगा।
मैं धृतराष्ट्र-कम-कुर्सीराष्ट्र अपने पूरे होशोहवास में अपनी प्रिय प्रजा को गारंटी देता हूं कि मैं प्रजाप्रिय सरकार बनने पर….
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