
एक बहुत बड़े तपस्वी संत थे। एक दिन, एक व्यक्ति उनके पास आया और बोला, महात्मा जी, कृपया करके मुझे अपना शिष्य बना लें। महात्मा जी ने उसका निवेदन स्वीकार कर लिया और उसे अपना शिष्य बना लिया। महात्मा जी ने शिष्य को एक गाय देकर कहा, इसकी सेवा करो और खूब दूध का सेवन करो। फिर महात्मा जी ने उसे गायत्री मंत्र सिखाकर कहा, वत्स, इस मंत्र का जाप किया करो। व्यक्ति ने महात्मा जी के कहे अनुसार प्रतिदिन वही सब करने लगा। एक दिन वह महात्मा जी के पास गया और बोला, गुरुदेव, आपकी कृपा से बहुत आनंद है। महात्मा जी ने पूछा, क्या आनंद है? वह व्यक्ति बोला, गाय चराता हूं, दूध पीता हूं और गायत्री मंत्र का जाप करता हूं। यह सुनकर महात्मा जी बोले, ठीक है। कुछ दिन बाद संयोग से उसकी गाय गुम हो गई, दूध मिलना भी बंद हो गया और गायत्री मंत्र में भी मन नहीं लगता। वह पुन: महात्मा जी के पास आया और अपनी व्यथा सुनाई। यह सुनकर महात्मा जी मुस्करा कर बोले, यह भी ठीक है। कुछ दिन बाद गाय मिल गई। बस फिर क्या था, वही आनंद वापिस आ गया। पेट भर दूध और मंत्र जाप। महात्मा जी के पास आकर उसने फिर सुखमयी स्थिति का वर्णन किया। महात्मा जी बोले, यह भी ठीक है। शिष्य ने आश्चर्य चकित होकर पूछा, गुरुदेव, यह क्या बात हुई? जब गाय थी तब भी कहा, यह भी ठीक है। जब गाय गुम हो गई, तब भी कहा, यह भी ठीक है और जब गाय पुन: मिल गई तब भी वही वाक्य कि यह भी ठीक है। महात्मा जी ने कहा, वत्स! जीवन बिताने का यही सर्वोत्तम ढंग है। जैसी परिस्थिति हो, उसे ठीक समझो और उसके अनुकूल अपने आपको ढाल लो, इसी में जीवन की सार्थकता है। -प्रस्तुति : राजेंद्र कुमार शर्मा


