- मेरठ और दिल्ली सहित वेस्ट यूपी की शादियों में लोक नृत्य ‘तनौरा’ मचा रहा धूम
- बदलता ट्रेंड: धनाड्य मुस्लिम परिवारों मे विकसित हो रहा कल्चर
- महंगी फीस पर मिस्र से हायर किए जा रहे कलाकार
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: एक दौर हुआ करता था जब मुस्लिम परिवारों में शादी ब्याह के दौरान नाच गानों से परहेज किया जाता था। बढ़े बूढ़े नाच गाने की महफिल से दूरी बनाकर चलते थे। इस दौरान संगीत बजाने तक की मनाही हुआ करती थी। समय बीता तो परम्पराएं बदलती चली गर्इं।
रुढ़िवादी सोच की जगह आधुनिकता ने ले ली। परिणाम यह हुआ कि आज ज्यादातर मुस्लिम परिवारों में शादी ब्याह के दौरान गीत संगीत जरुरत बन गया। कहीं कहीं तो यह स्टेटस सिम्बल तक भी बन गया। धनाड्य मुस्लिम परिवार तो बड़ी बड़ी आॅर्केस्ट्रा पार्टी हायर करने लगे। हद तो यह कि कई बड़े मुस्लिम परिवार लाखों रुपए खर्च कर मुम्बई से म्यूजिक पार्टियां हायर करने लगे।
गीत संगीत के इस दौर में अब थोड़ा बदलावा दिखने लगा है। शादियों में वेस्टर्न म्यूजिक की जगह अब धीरे धीरे विभिन्न संस्कृतियों के लोक नृत्य ले रहे हैं। इसी कढ़ी में इस समय मेरठ व दिल्ली सहित वेस्ट यूपी के बड़े शहरों में जितने बड़े मुस्लिम परिवार अथवा घराने हैं उनका रुझान सूफिज्म संगीत की तरफ बढ़ रहा है। मेरठ में हाल ही में हुई एक शादी में आयोजकों ने काहिरा (मिस्र) से कलाकार हायर किए।

इन्होंने सूफिज्म की तर्ज पर लोक नृत्य ‘तनौरा’ पर लोेगों को अपना दीवाना बना लिया। दरअसल तनौर एक अरबी शब्द है जिसका तात्पर्य स्कर्ट से है। यह मिस्र का एक पारम्परिक लोकनृत्य है। इसमें नृत्य करने वाला कलाकार अरबी गीतों की धुनों पर थिरकते हैं। यह नृत्य सूफी डांस से काफी हद तक मिलता जुलता है। इस नृत्य में कलाकार अपने कपड़ों पर लाइटें लगाकर नृत्य करते हैं।
इस दौरान डांसर पोशाक की शक्ल में बड़ी स्कर्ट पहनते हैं। इस पोशाक के कई हिस्से होते हैं और डांस के दौरान कलाकार पोशाक के इन सभी हिस्सों को बाकायदा प्रदर्शित करते हैं। अकेले स्कर्ट का वजन 15 से 20 किलो तक होता है। इस शादी में अपनी परफॉर्मेंस पेश करने वाले मिस्र के कलाकार रिफत अल शईर ने बातचीत के दौरान बताया कि यह कल्चर भारत में विशेषकर उत्तर भारत में विकसित हो रहा है और वो इसका भविष्य भी उज्जवल मानते हैं।
पेशे से फिजियोथैरिपिस्ट हैं रिफत
मेरठ में एक मैरिज फंक्शन में आयोजकों के बुलावे पर अपना हुनर दिखाने आए रिफत अल शईर ने बताया कि चूंकि यह कल्चर यहां डेवेलप हो रहा है इसलिए उन जैसे कलाकार तीन चार महीने के लिए भारत आते हैं और पैसे कमाकर वापस लौट जाते हैं। रिफत अल शईर वैसे खुद पेशे से फिजियोथैरिपिस्ट हैं जो मिस्र में इस पद्धिति से लोगों का इलाज भी करते हैं।

