अच्छे से अच्छा खान-पान, अच्छे से अच्छा सहन-सहन और ऊंचे से ऊंचे भोग-विलास के लिए आखिर आदमी को कितना धन चाहिए होता है? यह सवाल इसलिए भी मन में उमड़ घुमड़ रहा है कि लोग बाग अधिक से अधिक धन दौलत अर्जित करने की होड़ में इस कदर दीवाने है कि आदमियत को पीछे छोड़ते जा रहे हैं। यह विचार मन में यूं आया कि आजकल छोटे-छोटे स्तर पर भी बड़े-बड़े स्तर के भ्रष्टाचार का सिलसिला निरंतर परवान चढ़ रहा है। अब इतना तो आप जान ही चुके होंगे कि मैं हाल फिलहाल कोई लाभ के पद पर नहीं हूं। होता तो मुझे अपने काम से इतनी फुर्सत कहां मिल पाती कि अपनी नजर तिरछी कर सकूं।
दरअसल इस समय देश में यही हो रहा है। बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार के जमाने में आम आदमी की चिंता का विषय यही है कि कैसे-कैसे लोग, किस-किस क्षेत्र में कैसे-कैसे गुल खिला रहे है ! अब हमारे यहां लोकतंत्र है, इसलिए केवल और केवल अपनी काबिलियत के आधार पर तो बहुत से बहुत, ‘बहुत कुछ’ पाया जा सकता है। लेकिन सब कुछ’ पाने के लिए अपने निजी काम धंधे छोड़कर जन कल्याण की दिशा में प्रवृत्त हो जाना, वह सब कुछ पाने का मार्ग प्रशस्त कर सकता है, जिसकी कि कल्पना करना भी मुश्किल हो। इसके लिए और कुछ नहीं केवल और केवल राजनीति की डगर पकड़ने की आवश्यकता है।
वैसे यदि चाहे तो इसमें थोड़ा बहुत या बहुत कुछ निवेश भी कर सकते हैं, जिसके चलते सोने में सुहागा हो जाएं। अन्यथा सक्रिय राजनीति के लिए निवेश कोई आवश्यक शर्त नहीं है। यहां यह लिखना जरूरी है कि आजकल की राजनीति में अपनी शुरूआत दरी बिछाने और हेलो माइक टेस्टिंग हेलो करते रहने से ही हो, अब यह कतई जरूरी नहीं रह गया है। आप मजे में किसी स्थापित राजनेता से जुड़ जाइए, उनकी हां में हां और ना मैं ना करते रहिए। गरज यह कि उनकी निगाहों में जैसे तैसे बने रहिए। फिर यकीन मानिए उनकी किस्मत पलटेगी तो आपकी अपनी किस्मत भी पलट कर ही रहेगी। कोई जरूरी नहीं है कि राजनीति में आपकी शुरूआत संघर्षों के साथ ही हो।
आप मजे में चलती गाड़ी में चढ़ने की कोशिश कीजिए। अर्थात जिस किसी राजनेता का भविष्य आपको स्वर्णिम प्रतीत होता है, या कि जो राजनेता बेहतर परफॉर्म कर रहा हो, केवल उससे जुड़ने की जरूरत है। फिर चमत्कार देखिए- उनकी किस्मत चमकी, तो समझ लीजिए कि अपनी किस्मत भी चमक कर ही रहेगी। अब वह दिन हवा हो गए जब कि राजनीति में अतिरिक्त आय के साधन के रूप में तमाम तरह के कोटा परमिट ही अर्थोपार्जन का मुख्य आधार हुआ करता था आजकल के दौर में जबकि भ्रष्टाचार लगभग शिष्टाचार के रूप में परिणत हो चुका है, आप मजे में कुछ करने या नहीं करने के आधार पर भी अपने हित साधन का मार्ग तलाश सकते हैं। दरअसल यह सब आपकी विचार तथा कल्पना शक्ति पर निर्भर करता है कि आप तिल्ली का तेल ही नहीं अपितु पत्थर का भी तेल निकाल सके।

