Wednesday, May 6, 2026
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हाशिये के आदमी की दु:ख-तकलीफों का आख्यान

RAVIWANI


SUDHANSHU GUPT19वीं सदी के अमेरिकी कवि व्हिटमैन ने अपनी एक कविता ‘सांग ऑफ माई सेल्फ’ में लिखा है: सारे दुख मेरे लिए वस्त्र परिवर्तन के समान हैं, मैं घायल व्यक्ति से यह नहीं पूछता कि वह कैसा अनुभव करता है,बल्कि मैं स्वयं घायल बन जाता हूं। वास्तव में उनकी ये पंक्तियां हर लेखक के लिए जरूरी हैं। हर लेखक को दूसरे के दुखों को समझने के लिए ‘दूसरा’ बन जाना पड़ता है। तभी वह उनके दुखों को समझ सकता है और अपने किस्सों-कहानियों में दर्ज कर सकता है। इसे ‘परकाया’ प्रवेश भी कह सकते हैं। वरिष्ठ लेखक नफीस आफरीदी के लेखन का मूल भी यही है। नफीस आफरीदी हाशिये पर रह रहे आम आदमी की दुख तकलीफों को बाकायदा समझते हैं और उन्हें पूरे परिवेश के साथ अपने लेखन में उतारते हैं। आफरीदी साहब लम्बे समय तक हिन्द पॉकेट बुक्स में मुख्य सम्पादक के रूप में कार्य करते रहे हैं। उनके अनेक उपन्यास, कहानी संग्रह, बाल उपन्यास और कुछ नाटक प्रकाशित हो चुके हैं।

उनके लेखन के विषय में बाबा नागार्जुन ने एक जगह लिखा कि वह कथा रसिकों के चहेते शब्द शिल्पी हैं, क्योंकि उनकी कहानियां वर्तमान जीवन और जगत के किस्से ही हैं, जो यहां-वहां बिखरे पड़े हैं। उनकी कहानियों में किस्सागोई का होना पहली शर्त है। और दूसरी शर्त वातावरण के अनुकूल दृश्यों की जीवंतता है, जो इनकी कहानियों की सबसे बड़ी ऊर्जा है। नफीस आफरीदी का हाल ही में प्रकाशित कहानी संग्रह ‘किस्सा दर किस्सा’ (कल्पतरू प्रकाशन) पढ़ते हुए यह साफ तौर पर दिखाई पड़ता है कि किस्सा कहना उन्हें प्रिय है।

लेकिन बाबा नागार्जुन की बात से थोड़ा इतर यह कहना बहुत जरूरी है कि उनके किस्से कथा रसिकों के लिए शायद न हों। हम ऐसे समय में जी रहे हैं, जहाँ लेखक पाठकों के रस के लिए कथ्य और किस्सों से समझौता कर लेते हैं, कर रहे हैं। ऐसे लेखक कथ्य में रस प्रवाहित करने के लिए प्रेम, दैहिक विमर्श, नग्नता तक परोसने में कोई संकोच नहीं करते। उनका सिर्फ एक ही मकसद होता है कि कहानी रोचक, मनोरंजनपूर्ण और पठनीय बने।

नफीस आफरीदी इस मामले में कहानी के कथ्य से कोई समझौता नहीं करते। वह कहानी में तार्किकता और जीवन दर्शन को साथ लेकर चलते हैं। उनकी कहानियां रूमानियत में डूबी कहानियां नहीं हैं, बल्कि वे अपनी कहानियों में दर्द, तकलीफ और दारुण व्यथा को दर्ज करते हैं। उनके बिम्ब, मुहावरेदार भाषा और अन्तर्निहित व्यंग्य इन कहानियों को खूबसूरत शक्ल देती है। ये जीवन से निकली जीवन की कहानियाँ हैं।

यहाँ उधार का कुछ भी नहीं है। भाषा, अनुभव और बिम्ब सब कुछ मौलिक है। इस संग्रह को पढ़कर एक बात और लगी कि उनकी कहानियां ‘इंडिया’ की कहानियां नहीं हैं बल्कि ‘हिन्दुस्तान’ की हैं। इनमें गरीबी का क्रूरतम रूप है, आपसी बनते-बिगड़ते रिश्ते हैं, बदलते मूल्यों से पीढ़ियों के बीच आने वाला तनाव है और कोठे की दुनिया है। उनकी कहानी का पहला वाक्य ही, पाठक को कहानी के भीतर ले जाने वाला प्रमाणिक दरवाजा बन जाता है।

‘अर्द्धविराम’ कहानी का पहला वाक्य है-घोड़ी के हिनहिनाने के साथ ही बेचैन होकर उठ बैठी वह। आप कहानी में प्रवेश करने पर पाते हैं। पति-पत्नी और एक बेटा। बेटा पहली पत्नी से है। अब वही उसकी मां है। बेटा अपनी असली मां का इंतजार करता रहता है। कैसे बेटे और मां के बीच की दूरी खत्म हो जाती है, यही कहानी का मूल है। उनकी कहानियों में बेटी के विवाह की चिंता भी है और जमीन बचाने की चिंता भी (किस्सा दर किस्सा)।

प्रेमचंद की कहानी कफन से इतर नफीस आफरीदी की कहानी ‘टाट का कफन’ एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है, जिसे सब पागल कहते हैं। कहानी में एक जगह आफरीदी साहब लिखते हैं- अत: सुविधा के लिए उसको झंडा पागल कहने लगे थे। वह अपना झंडा हिलाता और नारा लगाते हुए कहता-यह बोरी यानी टाट है, जिसपर गरीब सोता है, जिसे पहनकर अपनी इज्जत ढांकता है और जिसे अपना कफन बनाता है।

लोग मुझे पागल कहते हैं, पर मैं पते की बात कहता हूं। कोई मुझे समझता नहीं। एक दिन मैं समझाते-समझाते पागल हो जाऊंगा कि इस दोगली व्यवस्था से कभी समझौता मत करो! अपने बूते पर जियो, मर्द की तरह जियो! अंत में किसी वाहन से कुचली हुई उसकी लाश सड़क पर फैली पड़ी थी। क्या किसी भी व्यवस्था से विरोध करने का यही अंजाम होता है? क्या यह भी एक तरह की मॉब लिंचिंग नहीं है?

कमोबेश इसी मिजाज की कहानी है ‘वायदा खिलाफ’। कहानी का नायक कॉलेज प्रवेश में चल रही धांधली का विरोध करता है। भ्रष्टाचार का विरोध करते-करते नायक ऐसी जगह पहुंच जाता है, जहां अपनी बस्ती को बचाने के लिए बुलडोजर दिखाई पड़ते हैं। इस कहानी को पढ़कर बरबस मौजूदा समय के बुलडोजर याद आ जाते हैं, जो यह बताते हैं कि आम आदमी की समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं।

‘शहसवार’ कहानी राजनीतिक पाखण्ड को चित्रित करती है। इस कहानी में आप देख सकते हैं कि राजनेता अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए किस हद तक जा सकते हैं। ‘हक की बात’ कहानी भी राजनीति पर चोट करती है, जहां नेता आम आदमी के हक की बात नहीं करता।

‘मदद’ कहानी एक अलग दुनिया की कहानी है। नायक को रात के अंधेरे में एक युवा स्त्री मिलती है। वह स्त्री नायक से मदद मांगती है। नायक स्त्री के घर देखता है कि उसकी अम्मी मौत के बिस्तरे पर पड़ी आखिरी सांसें गिन रही हैं। स्त्री अम्मी के अंतिम संस्कार के लिए नायक से कुछ रुपए मांगती है। अप्रत्यक्ष रूप से वह इन रुपयों के बदले अपना जिस्म तक देने को तैयार है। नायक कहता है, मदद कभी बिकाऊ नहीं होती और वह भी एक औरत के जिस्म के बदले…। यह कहानी उसपर चोट करती है जो मदद के बदले स्त्री का जिस्म चाहते हैं।

नफीस आफरीदी की कहानियों में अलग-अलग परिवेश, वर्ग और संस्कृति के लोग मिलते हैं। हिन्दू भी मुस्लमान भी। दोनों मजहबों की दुनिया कहीं से भी अलग दिखाई नहीं देती। इनके दुख, तकलीफें, गरीबी और आर्थिक अभावों से आपसी रिश्तों पर पड़ने वाली सिलवटें भी एक दूसरे से जुदा नहीं हैं। ये कहानियां धर्मनिरपेक्ष कहानियाँ हैं। ऐसा नहीं है कि दंगे और शहरों में लगने वाले कर्फ्यू उनकी चिंता में शामिल नहीं है।

बाकायदा हैं। तभी वह ‘बच्चे बड़े नहीं होते’ जैसी कहानी लिखते हैं। नफीस आफरीदी अपनी कहानियों में मानवीयता और मनुष्यता के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं। ‘कौन सा सच’ कहानी में मूल्यों के बीच और पीढ़ियों के बीच संघर्ष है। लेकिन आफरीदी साहब अंत में उस सच की तरफ इशारा करते हैं, जिसमें वह अपने बेटे के मूल्यों के अनुरूप खुद को ढालते नजर आते हैं।

नफीस आफरीदी की कहानियों में वह दुनिया भी दिखाई देती है, जिसे रेड लाइट की दुनिया कहा जाता है। ‘सोलहवें साल का गणित’ कहानी में यही दुनिया खुलती है। यहां तबले की थाप है, अंजुमन बाई की गायकी है, उस्ताद हैं, शागिर्द हैं, नखरे हैं और इस दुनिया में आती औरतों का पिछला जीवन है। कहानी में बेहद इंटीमेट परिवेश है। अंजुमन बाई है और उसकी कोख से पैदा हुई नश्शो है। वह सोलह साल की हो रही है।

अंजुमन बाई जानती है कि इस बाजार में सोलह का क्या अर्थ होता है। उसकी बेटी नश्शो सोलह साल की हो रही है। अंजुमन बाई घर में रखी नथ को नाली में फेंक देती है। नथ गई नाली में। अब कोई नहीं उतारेगा। नफीस आफरीदी इतनी खामोशी से कहानी को उसके मुकाम तक पहुंचाते हैं कि पाठक चकित रह जाता है। वह बेहद सलीके और शान्ति से, बिना शोर किए कहानी को अपनी गति से बढ़ने देते हैं।

नफीस आफरीदी की ये कहानियां पढ़कर आपके सामने कई दुनियाएं खुलती हैं-पूरी संजीदगी और जीवंतता के साथ। कहानियाँ शुरू होती हैं और लेखक बीच से हट जाता है। कहानी अपना रास्ता खुद तय करती है। यही वजह है कि संग्रह की सभी कहानियां अपने प्रवाह में चलती हैं। कहानियों में आरोपित कुछ नहीं है। दृश्यों को जीवित करने का हुनर आफरीदी साहब को मालूम है। ये कहानियाँ केवल किस्सागोई नहीं हैं। इनमें जीवन दर्शन है। परिवेश इन कहानियों में किरदार की तरह दिखाई पड़ता है। इस संग्रह को पढ़ना निस्संदेह कहानी की उपेक्षित दुनिया को जानना है।


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