Wednesday, April 22, 2026
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आखिर कब रुकेंगे नक्सली हमले?

Samvad


Arvind jaytilak 1नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ राज्य के दंतेवाड़ा जिले में जिला रिजर्व गार्ड के 11 जवानों की हत्या कर दी है। दंतेवाड़ा समेत सात जिलों में शामिल बस्तर अभी भी नक्सलियों का सबसे बड़ा पनाहगाह बना हुआ है। यह जानते हुए भी कि नक्सली मार्च और जून के बीच जवानों को अक्सर निशाना बनाते हैं बावजूद इसके उनकी सुरक्षा को लेकर सावधानी क्यों नहीं बरती गयी। यह पहली बार नहीं है जब इन महीनों में नक्सलियों ने जवानों को निशाना बनाया हो। यह बेहद चिंता का विषय है कि छत्तीसगढ़ राज्य के घने जंगलों में पिछले चार दशक से नक्सली अपनी जड़ जमाए हुए हैं और उन्हें अभी तक खत्म नहीं किया जा सका है। तमाशा यह कि एक ओर नक्सली सरकार से शांति वार्ता का प्रस्ताव देते रहते हैं वहीं दूसरी ओर जवानों की जान ले रहे हैं। सवाल लाजिमी है कि आखिर उन पर किस तरह भरोसा किया जाए?

आंकड़ों पर गौर करें तो विगत पांच वर्षों में नक्सली हिंसा की लगभग 6000 से अधिक घटनाएं हो चुकी है। इन घटनाओं में तकरीबन 1300 नागरिक और तकरीबन 600 से अधिक सुरक्षाकर्मी शहीद हो चुके हैं। हां, यह सही है कि जवानों की सतर्कता के कारण पिछले कुछ समय से नक्सलियों पर नकेल कसा है और उनकी आक्रामकता कुंद हुई है।

पिछले कई मुठभेड़ों के दौरान वे भारी संख्या में मारे भी गए हैं। लेकिन उनके कृत्यों से साफ हैं कि उनका हौसला अभी टूटा नहीं है। हालांकि गौर करें तो जवानों की सतर्कता के कारण छत्तीसगढ़ को छोड़ नक्सल प्रभावित 10 राज्यों में नक्सली घटनाओं में कमी आई है।

नक्सलियों के विरुद्ध कार्रवाई में तकरीबन दो दर्जन से अधिक शीर्ष नक्सली मारे जा चुके हैं। गृहमंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और पश्चिम बंगाल में इस साल नक्सली हिंसा की एक भी घटना नहीं हुई। इसी तरह बिहार में भी कम हिंसक घटनाएं दर्ज हुई हैं।

दरअसल नक्सली एक खास रणनीति के तहत सरकारी योजनाओं में बाधा डाल रहे हैं। वे नहीं चाहते हैं कि ग्रामीण जनता का रोजगारपरक सरकारी कार्यक्रमों पर भरोसा बढ़े। उन्हें डर है कि अगर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सरकारी योजनाएं फलीभूत हुई तो आदिवासी नौजवानों को रोजगार मिलेगा और वे नक्सली संगठनों का हिस्सा नहीं बनेंगे।

यही वजह है कि नक्सली समूह सरकारी योजनाओं में रोड़ा डाल बेरोजगार आदिवासी नवयुवकों को अपने पाले में लाने के लिए किस्म-किस्म के लालच परोस रहे हैं। अकसर सुना जाता है कि वे अपने संगठन से जुड़ने वाले युवकों और युवतियों को सरकारी नौकरी की तरह नाना प्रकार की सुविधाएं मुहैया कराने का एलान करते हैं।

नक्सली आतंक की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अब वे कंप्यूटर शिक्षा प्राप्त ऐसे नवयुवकों की तलाश कर रहे हैं, जो आतंकियों की तरह हाईटेक होकर उनके विध्वंसक कारनामों को अंजाम दे सके।

अच्छी बात यह है कि केंद्र सरकार नक्सलियों को मुख्य धारा में लाने का प्रयास कर रही है। उन्हें विश्वास में ले रही है। लेकिन नक्सली अपनी बंदूक का मुंह नीचे करने को तैयार नहीं हैं। खतरनाक बात यह कि नक्सलियों का संबंध आतंकियों से भी जुड़ने की खबरें उजागर होती रहती हैं।

याद होगा गत वर्ष पहले पूर्वोत्तर के आतंकियों से उनके रिश्ते-नाते उजागर हुए थे। गत वर्ष पहले आंध्र प्रदेश पुलिस बल और केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों ने एक संयुक्त कार्रवाई में आधा दर्जन ऐसे लोगों को गिरफ्तार किया था जो नक्सलियों को लाखों रुपए मदद दिए थे।

आज की तारीख में नक्सलियों के पास रुस-चीन निर्मित अत्याधुनिक घातक हथियार मसलन एके छप्पन, एके सैतालिस एवं थामसन बंदूकें उपलब्ध हैं। इसके अलावा उनके पास बहुतायत संख्या में एसएलआर जैसे घातक हथियार भी हैं। याद होगा कुछ साल पहले नक्सलियों ने बिहार राज्य के रोहतास जिले में बीएसएफ के शिविर पर राकेट लांचरों से हमला किया था।

ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर नक्सलियों को ऐसे खतरनाक देशी-विदेशी हथियारों की आपूर्ति कौन कर रहा है? कहीं ऐसा तो नहीं कि देश के तथाकथित अर्बन बुद्धिजीवी ही उनकी मदद कर रहे हैं? इससे इंकार नहीं किया जा सकता।

ऐसा इसलिए कि इन बुद्धिजीवियों द्वारा अकसर दलील दिया जाता है कि नक्सलियों के खिलाफ की जा रही कार्रवाई को रोककर ही नक्सल समस्या का अंत किया जा सकता है। पर वे यह नहीं बता पाते हैं कि जब सरकार द्वारा बातचीत के लिए आमंत्रित किया जाता है तो वे सकारात्मक रुख क्यों नहीं दिखाते?

विडंबना यह भी कि नक्सली समर्थक बुद्धिजीवी जमात नक्सलियों को मुख्य धारा में लाने के प्रयास के बजाए इस बात पर ज्यादा बहस चलाने की कोशिश करता है कि नक्सलियों के साथ सरकार अमानवीय व्यवहार कर रही है। यही नहीं वे नक्सली आतंक को व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई बताने से भी नहीं चूकते हैं।

दुखद यह है कि इन बौद्धिक जुगालीकारों को विद्रुप, असैद्धांतिक और तर्कहीन नक्सली पीड़ा तो समझ में आती है लेकिन नक्सलियों द्वारा बहाए जा रहे निर्दोष जवानों के खून और हजारों करोड़ की संपत्ति का नुकसान उनकी समझ में क्यों नहीं आता है।

जब भी अर्द्धसैनिक बलों द्वारा नक्सलियों को मुठभेड़ में मार गिराया जाता है तो इस जमात द्वारा अपनी छाती धुनना शुरू कर दिया जाता है। वे न सिर्फ मुठभेड़ को फर्जी ठहराने की कोशिश करते हैं बल्कि सुरक्षाबलों की शहादत का भी अपमान करते हैं।

यह कृत्य देश के विरुद्ध है। उचित होगा कि केंद्र व छत्तीसगढ़ राज्य की सरकार नक्सलियों का फन तो कुचले ही साथ ऐसे लोगों के विरुद्ध भी सख्त कार्रवाई करे जो नक्सली हिंसा का समर्थन करते हैं।


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