
इतनी क्रूर हत्या और इतना प्रताड़ना किसी सभ्य शासक या फिर संवेदनशील मनुष्य कर ही नहीं सकता है। संदर्भ महान लोकतंत्रवादी और तानाशाह विरोधी नायक एलेक्सी नवलेनी की हत्या का है। रूस का सार्वजनिक वक्तव्य है कि नवेलनी की मृत्यु हुई है, नवेलनी की स्वाभाविक मृत्यु हुई है, उसे किसी भी प्रकार का चोट या फिर नुकसान नहीं पहुंचाया गया था, अचानक उसका स्वास्थ खराब हुआ और मिनटों में उसके प्राण निकल गए, बचाव का अवसर तक नहीं मिला। लेकिन दुनिया जानती है कि यह सब सिर्फ और सिर्फ झूठ है, विश्व समुदाय के अंदर उपजी हुई प्रतिक्रिया, विरोध को शांत करना या फिर उस पर पानी डालना है। ब्लादमिर पुतिन का रूस अपनी सफाई में चाहे जितने भी तर्क दें, अपने आप को हरिशचन्द्र घोषित कर दें तो भी परिस्थितियां उसके गुनाह और करतूत को बेनकाब करने के लिए काफी हैं। अपनी हत्या के बाद भी पुतिन के लिए नवेलनी संकट के कारण बने रहेंगे, विरोध के कारण बने रहेंगे, छवि भंजन के कारण बने रहेंगे, ब्लादमिर पुतिन को एक क्रूर, खतरनाक और मनुष्यता विरोधी छवि सुधरने वाली नहीं है, उनकी गिनती स्टालिन, माओत्से तुंग जैसे तानाशाहों में होती रहेगी और इतिहास हमेशा उन्हें कठघरे में खडा करते रहेगा। यूक्रेन युद्ध की धृणा और पाप का बोझ पुतिन पहले से ही लेकर चल रहे हैं। लोकतंत्र विरोधी पुतिन से वीटो का अधिकार वापस लेना चाहिए। नवलेनी की हत्या के अनेक प्रयास विफल हुए थे। एक विदेशी यात्रा के दौरान पुतिन के जासूसों ने उन्हें जहर दे दिया था। जहर से नवेलनी का स्वास्थ बहुत खतरनाक हो गया था, जिंदगी बचने की उम्मीद लगभग समाप्त हो गयी थी। लेकिन जर्मनी के डॉक्टरों ने उन्हें बचाया और जहर के प्रभाव से मुक्त कराया था। इस जहर कांड में भी पुतिन ने झूठ बोला था और कहा था कि उसके जासूसों ने जहर नहीं दिया है और हमनें हत्या की कोशिश नहीं की है। लेकिन पूरा विश्व समुदाय यह मानता था कि यह करतूत पुतिन और पुतिन सरकार के जासूसों की है। पुतिन की लोकतंत्र विरोधी कार्रवाई को मानवता विरोधी घोषित किया था। लेकिन दुनिया के नियामकों में यह बात अनसुनी कर दी गई। अनसुनी इसलिए हुई कि रूस के पास वीटो का अधिकार है। वीटोधारी देशों के लिए गुडागर्दी, लोकतंत्र की हत्या और अभिव्यक्ति को गुलाम बना कर रखना दंडनीय अपराध नहीं होता है।
नवेलनी की वीरता देखिये, लोकतंत्र पर उनका अडिग समर्पण देखिये। उनके सामने साक्षात मौत थी, उनके लिए पुतिन ने मौत और कैद का पिंजड़ा बना कर रखा था। नवेलनी की जान जाएगी, उन्हें लंबे और खतरनाक कैद में रखा जाएगा, यह आशंका थी। दुनिया के लोकतंत्र वादियों ने नवेलनी को समझाया था और मना भी किया था, रूस नहीं लौटने की बात कही थी। लेकिन नवलेनी ने कोई बात नहीं मानी। उसने सीधे तौर पर कह दिया था कि मैं जानता हूं कि मेरे सामने साक्षात मौत खडी है, पुतिन मुझे जिंदा नहीं छोड़ेंगे, मुझे मार ही डालेंगे फिर भी मैं रूस लौटूंगा और पुतिन की तानाशाही व मनुष्यता विरोधी करतूतों से रूसियों को आजादी दिलाऊंगा।
नवेलनी को रूस की धरती पर कदम रखते ही कैद कर लिया गया, उन पर देशद्रोह का मुकदमा चलाया गया और उन्हें आजीवन करावास में डाल दिया गया। कारावास में भी नवेलनी की प्रतिज्ञा नहीं बदली तो फिर उस पर प्रताड़ना के नये-नये हथकंडे अपनाये गए। उन्हें रूस की सबसे खतरनाक जेल जहां पर जिंदगी तिल-तिल कर मरती है, डाल दिया गया। वह जेल भारत में अंग्रेज काल की काले पानी की सजा और जेल सरीखा है। वह जेल जहां पर स्थित है, वहां पर रूस में सबसे अधिक ठंड पड़ती है, कैदियों को खूले ठंड में खड़ा कर मरने के लिए विवश किया जाता है। पुतिन अपने विरोधियों को उसी जेल में सड़ा कर रखते हैं, प्रताड़ित करते हैं। पुतिन के लिए नवेलनी कितना बडा खतरा थे? क्यों डरते थे उनसे पुतिन? नवेलनी सीधे तौर पर पुतिन को तानाशाह मानते थे और उसे लोकतंत्र विरोधी मानते थे, उन्हें गैर मनुुष्य यानी की जानवर की श्रेणी में रखते थे। पुतिन के खिलाफ उन्होंने चुनाव में उतरने का साहस किया था। उन्हें चुनाव लडने से प्रतिबंधित कर दिया गया था फिर भी वे विपक्षी पार्टियों और उम्मीदवारों के समर्थन में चुनाव प्रचार करते थे और पुतिन की मनुष्यता विरोधी कार्रवाइयों और नीतियों की आलोचना करते थे। इस कारण पुतिन उन्हें अपना सबसे खतरनाक दुश्मन मानता था और उसे अपने रास्ते का रोड़ा मानता था। इसी कारण से पुतिन नवेलनी को खतरनाक और डरावनी मौत देने का मनुष्यता विरोधी काम किया है, करतूत दिखायी है।
पुतिन कितना लोकतंत्रवादी है, यह भी देख लीजिये। लोकतंत्र के खोल में घुसा हुआ हिंसक और वहशी तानाशाह है। इसके लिए विरोध कोई अर्थ नहीं रखता है। विरोधियों को सीधे मौत का घाट उतार देता है। हजारों लोकतंत्र समर्थकों को खतरनाक और जानलेवा ठंड की जेलों में कैद कर रखा है। युवकों को पकड़-पकड़ कर यूक्रेन युद्ध में ढकेल रहा है। लोकतंत्र को वह एक तरह से गुलाम बना कर रखा हुआ है। चुनावों में घांधली उसका जन्मसिद्ध अधिकार बन गया है। स्वच्छ चुनावों के लिए अंतर्राष्टीय पर्यवेक्षक उसे स्वीकार नही हैं। अंतर्राष्टीय पर्यवेक्षकों से उनकी समस्या क्या है? अंतर्राष्टीय पर्यवेक्षकों को वह चुनावो में क्यों नहीं आमंत्रित करते हैं? इसका कारण यह है कि अंतर्राष्ट्रीय पर्यवेक्षकों की उपस्थिति में उनकी चुनावी धांधली पकडी जा सकती है, बेनकाब हो सकती है। सिर्फ चुनावी धांधली की ही बात नहीं है बल्कि संविधान में भी मनचाहा हेराफेरी करते हैं। संविधान की हेरा-फेरी कर भी कभी राष्टÑपति तो कभी प्रधानमंत्री बन जाते हैं और सारी शक्तियां कभी प्रधानमंत्री तो कभी राष्टÑपति में निहित कर देते हैं।
ऐसे तानाशाह के लिए स्वतंत्र और निडर मीडिया का भी कोई अर्थ नहीं होता है। पुतिन के देश में मीडिया स्वतंत्र नहीं है, मीडिया गुलाम है, मीडिया पुतिन की नीतियों पर आलोचना नहीं कर सकता है, आलोचना पर दंड अनिवार्य है। नवेलनी की हत्या पर भी रूस का मीडिया खामोश है, सिर्फ सूचनात्मक खबर दी, उसकी प्रताड़ना और हत्या की खबर दबा दी गई, इस पर चुप्पी साधने में ही भलाई समझी गई। सबसे बडी बात यह है कि पुतिन की तानाशाही और खतरनाक हिंसा की डर के बावजूद भी नवेलनी समर्थकों का विरोध खड़ा हुआ और सड़कों पर लोग उतरे। नवेलनी के हजारों समर्थकों को जेलों में डाल कर विरोध पर पानी डाला गया।
लोकतंत्र विरोधी तानाशाहों के पास वीटो का अधिकार होना ही नहीं चाहिए। लोकतंत्र विरोधी वीटो के अधिकारों का दुरुपयोग अपनी तानाशाही को सुरक्षित रखने के लिए करते हैं और मानवता विरोधी जन्म सिद्ध अधिकार रखते हैं। इसका बर्बर उदाहरण चीन और रूस है। लवेलनी की क्रूर हत्या पर यूएनओ में प्रतिक्रिया होनी चाहिए थी, लेकिन यूएनओ खामोश है। पुतिन जैसे तानाशहों से वीटो का अधिकार वापस लेने की बात करने का सहास भी अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रास जैसे वीटोधारी देशों के पास नहीं है। नवेलीन का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा, एक न एक दिन पुतिन की तानाशाही ध्वस्त जरूर होगी।


