Tuesday, April 21, 2026
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बस दिनभर अपनों को तलाशती रहीं सूनी आंखें

  • मदर्स डे पर वृद्ध आश्रम पर अपनों का इंतजार करती रहीं बदनसीब मां

मां की एक दुआ जिंदगी बना देगी।
खुद रोएगी, मगर तुम्हें हंसा देगी।।
कभी भूल के भी न मां को रूलाना।
एक छोटी सी गलती पूरा अर्श हिला देगी।।

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: आज भले ही बच्चा कितना ही मोबाइल से सीख ले, लेकिन मां द्वारा सुनाई गई कहानी का अपना ही महत्व है। कहते हैं न….पालने से लेकर कब्र तक तक…मां की लोरी और कहानियां बच्चे के साथ रहती है। यह बिल्कुल सही है। आज भी वे कहानियां, जो बचपन में मां सुनाया करती थीं, भुलाएं नहीं भूलतीं। मां की आवाज में ही उनके तस्वीर आंखों के सामने आ जाती है। फिर यही कहानियां अगर टीवी पर देखी होतीं तब शायद इतनी मन से न जुड़ी होतीं।

वेदों में मां को भगवान से भी ऊंचा दर्जा दिया गया है। रविवार को शहर के हर घर में मदर्स डे मनाया गया। केक काटे गये, मां को उपहार देकर प्यार जाहिर किया गया तो कहीं मां के लिए सरप्राइज प्लान करके उनको विशेष महसूस करवाया गया। वहीं शाम होते-होते शहर के तमाम होटलों, स्ट्रीट फूड स्टाल्स आदि मदर्स डे सेलिब्रेशन से गुलजार रहे, तो वहीं पर शहर का एक कोना ऐसा भी था

जहां बहुत सी माताएं दरवाजे पर खड़ी होकर सूनी आंखों से अपनों का रास्ता देख रही थीं। हर आहट पर होठों पर मुस्कान और मन में आस लिये बाहर की तरफ टकटकी लगातीं कि कोई अपना आया होगा, पर हर बार मायूसी और हताशा ही हाथ लगती। जनवाणी टीम रविवार को मदर्स डे के उपलक्ष्य मे रजबन स्थित वृद्ध आश्रम पहुंची और वहां इन मांओं की पीड़ा और अपनों के द्वारा दिये गये कष्ट को सुनकर कलेजा मुंह को आ गया।

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अपनों के दिये जख्म से छलकी पीड़ा

‘मदर्स डे पर किसी की याद तब आएगी जब किसी ने प्यार किया हो, आज तक सबने दुत्कारा ही है, न मान दिया, न सम्मान दिया।’ यह शब्द थे 70 वर्षीय विमला देवी के। विमला बताती हैं कि उनकी शादी हुई थी, लेकिन वह ज्यादा दिन तक चल नहीं सकी। वह ससुराल छोड़कर मायके आ गईं। उनके पति ने दूसरी शादी कर ली। परिवार में माता-पिता और तीन भाई व एक बहन थी। मां और भाइयों की मृत्यु के बाद उनकी बहन ही देखरेख किया करती थी। 10 साल पहले बहन के स्वर्गवास के बाद, उसके बच्चों ने रखने को मनाकर दिया और घर से चले जाने को कहा।

यह कहते-कहते बहन को याद करते हुए उनकी आंखें छलकने लगीं। उन्होंने कहा कि अब आश्रम में हम ही एक-दूसरे का सहारा हैं, जीवन को अब ऐसे ही जीने की आदत पड़ गयी है। इसी आश्रम में 70 वर्षीय उषा बताती हैं कि वह छह साल पहले वृद्ध आश्रम में आयी थीं। उनकी भी शादी हुई थी, लेकिन वह वैवाहिक जीवन लंबे समय तक नहीं चल सका। घर वापस आयी तो भाभी ने घर से निकाल दिया। परिवार में एक बहन के सिवा और कोई नहीं है। बहन अपनी गृहस्थी के साथ दिल्ली में रहती है और समय-समय पर मिलने आती रहती है।

‘तकदीर का फसाना जाकर किसे सुनाएं, दिल में जल रही हैं अरमान की चिताएं।’ 102 वर्षीय पार्वती, पिछले 20 सालों से इस वृद्ध आश्रम में जी रही हैं। इन 20 सालों में पार्वती न तो वृद्ध आश्रम से बाहर गई न ही कोई अपना, पड़ोसी, दोस्त, रिश्तेदार उनसे मिलने या पता पूछने आया। ऐसा बताया गया कि उनके पति ने किसी और के साथ शादी कर ली थी। तब पार्वती इस आश्रम में ऐसी आयीं कि कभी वापस ही नहीं जा पार्इं।

‘कहने को दुनिया में बहुत रिश्ते होते हैं, परन्तु साथ निभाने वाला कोई नहीं।’ पिछले 15 साल से कमला इस वृद्ध आश्रम में रह रही हैं। उनका भाई त्योहार पर और रक्षाबंधन पर उनसे मिलने आ जाता है, लेकिन उनको अपने साथ रखने से पल्ला झाड़ता है। आज मदर्स डे पर यह बहनें, मां और पत्नियां अपनों को तलाश कर रही थीं, लेकिन उनकी सूनी और नम आंखों को कोई पोंछने वाला नहीं था।

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