Saturday, March 14, 2026
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ये यूपी है जनाब…

 

SAMVAD


Screenshot 2024 06 05 113129 1मंगलवार को आए जनादेश के बाद बहुमत से दूर हो गई भाजपा और बसपा को गठबंधन की साइकिल पर सवार होने का फैसला नहीं ले साथी सहयोगियों की बैसाखियों के सहारे बहुमत हासिल कर गई। भाजपा के कार्यकताओं को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पार्टी मुख्यालय पर संबोधित कर रहे हैं। बहुत कोशिश में हैं मोदी कि उदास चेहरे के भाव छिपाएं जाएं। इसी कड़ी में वो एनडीए की जीत को भावुक पल भी बता रहे हैं। साथ ही ये भी बोले कि उड़ीसा में हम पहली बार सरकार बनाने जा रहे हैं। तेलंगाना में हमने शानदार जीत हासिल की है। इस मौके पर मोदी नीतीश बाबू और चंद्रबाबू नायडू को भी याद फरमा रहे हैं लेकिन जो जख्म यूपी ने दिए हैं उन्हें वो कैसे जगजाहिर करें। निसंदेह गुजरात, छत्तीसगढ़, मप्र, हिमाचल, दिल्ली और उड़ीसा में क्लीन स्वीप किया है भाजपा ने। उड़ीसा में 24 साल बाद नवीन पटनायक के वर्चस्व का सूरज अस्त हो गया है, वहां भी भाजपानीत सरकार बनेगी। आंध्र प्रदेश में भी अच्छा प्रदर्शन पार्टी ने किया है, ये फीलगुड वाली स्थिति है लेकिन जो करारे झटके यूपी की पब्लिक ने भाजपा को दिए हैं, वो देश की सियायत में आने वाले समय में बहुत बड़ा रोल अदा करने जा रहे हैं। कहा जाता है कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता वाया यूपी होकर जाता है, उस पर भी उस यूपी में, जहां आपकी पूर्ण बहुमत वाली योगी सरकार सत्तासीन हैं। सवाल तो बड़े हैं कि आखिर पब्लिक इतनी परेशान कैसे हुई कि कमल मुरझा गया। रामायण के राम अरुण गोविल तो मेरठ में बमुश्किल जीत गए लेकिन फैजाबाद में भाजपा की हार कुछ जुदा कहानी कहती है। जिस साल राम मंदिर का उद्धघाटन, फिर प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम तो फिर क्या वजह रही कि अयोध्या धाम में भाजपा की हिदुत्व की बयार कैसे मद्धम पड़ गई। ये सीट 1998 के बाद सपा ने अपने नाम की है। दूसरी बात ये कि योगी की डबल इंजन सरकार, सुशासन और बुल्डोजर के डर से थरथराते माफिया, ये सरकारी कवायद को वोटों में तब्दील नहीं कर पाई। यूपी की सरकार, भाजपा हाईकमान को आईना दिखाने जैसे हैं लोकसभा चुनाव के ये परिणाम।

ये यूपी ही है, जिसके बलबूते हिंदुत्व के मुद्दे को परवान चढ़ाया भाजपा ने। 2014 में पब्लिक ने दिल खोलकर वोट दिए पार्टी को और कुल 80 सीटों में 71 और 2019 यानि पिछले लोकसभा चुनाव में 62 सीटें हासिल की भाजपा ने यानि दिल भर के दुलार लुटाया भाजपा पर सूबे की पब्लिक ने। इस बार फिर एग्जिट पोल ने वही कहानी दोहराई अपने अनुमानों में लेकिन मंगलवार को ईवीएम के पिटारे से जो रिजल्ट आने शुरू हुए उसने पोल की भी पोल खोल दी तथा भाजपा द्वारा खारिज किए जा रहे दो लड़कों की जोड़ी, अखिलेश और राहुल को यूपी की सियासत में वो जगह दे दी, जिसके लिए दोनों ही पिछले दस साल से तरस रहे थे। देर आयद दुरुस्त आयद की तर्ज पर सपा-कांग्रेस साथ आए। खूब कोशिशों के बावजूद मायावती अपनी पार्टी बसपा गठबंधन की साइकिल पर सवार होने का फैसला नहीं ले सकीं और उन्होंने एकला चलो की तर्ज पर चलने श्रेयस्कर समझा। माया के खाते में सिफर आया है। पिछली बार उनकी पार्टी सपा के साथ लड़ी थी तथा 10 सीटें जीती थी। गठबंधन को झटके भी कम नहीं लगे। रालोद प्रमुख जयंत चौधरी एनडीए के खेमे में चले गए। राहुल गांधी यूपी से चुनाव लड़ने को अनमने से दिखे लेकिन मां सोनिया गांधी से मिले हौसले से उन्होंने अमेठी की बजाए रायबरेली का रण चुना और वायनाड के साथ यहां से जीत हासिल करके अपने सियासी करियर को नई दिशा दे दी है। पिछली बार राहुल गांधी की मात देने वालीं स्मृति ईरानी अमेठी से गांधी परिवार के विश्वस्त केएल शर्मा से हार गईं। चंदौली में केंद्रीय मंत्री महेंद्र नाथ पांडेय हार गए हैं तो यही हश्र एक और केंद्रीय मंत्री निरंजन ज्योति का हुआ है। लखीमपुरखीरी में केंद्रीय मंत्री अजय कुमार टेनी की हार के मायने समझने वाले समझ गए हैं। धरनारत किसानों पर गाड़ी चढ़ा कर आठ जिंदगियों की सांसें थाम देने के आरोपी टेनी के बेटे हैं और उसके बावजूद उन्हें टिकट देने में भाजपा परहेज नहीं करती। मेनका गांधी ने सुल्तानपुर से शिकस्त खाई है तो 2013 के दंगों के जख्म झेल चुके मुजफ्फरनगर में संजीव बालियान को हरेंद्र मलिक ने हरा कर वेस्ट यूपी में सपा को संजीवनी देने का काम किया है। कैराना में इकरा हसन हों मुरादाबाद में सपा की रुचिवीरा या फिर आजमगढ़ में धर्मेंद्र यादव की जीत दिखाती है कि अखिलेश का पीडीए यानि पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक कार्ड क्लिक किया है। मुस्लिम वोटर का रुझान वाया कांग्रेस सपा की ओर शिफ्ट हुआ है और एक बड़ा फैक्टर जिसने भाजपा को बड़ा नुकसान पहुंचाया है, वो युवा वोटर्स। अग्निवीर से लेकर स्टार्टअप के हवा हवाई वादे और थोक के भाव होते पेपर लीक के मामलों ने देश के भविष्य युवा वोटर्स को हताशा की ओर धकेला है, इससे कोई इंकार नहीं कर सकता।

सपा और कांग्रेस दोनों को यूपी में अपनी सियासत को और धार देने का मौका दिया है इन परिणामों ने। वो कांग्रेस जो पिछली बार महज एक सीट रायबरेली जीती थी। इस बार राहुल की भारत जोड़ो यात्रा और सपा के साथ अपनी हैसियत के लिहाज से 17 सीटों पर ही चुनाव लड़ने की सहमति की समझदारी और आरक्षण तथा जाति गणना के मुद्दे को दमदार अंदाज में हवा देने में सफल रही है और अंजाम ये कि सपा का साथ कांग्रेस को मिला तो इमरान मसूद को सहारनपुर की सीट मिल जाती है। उसी तरह सपा भी पिछली बार की पांच सीटों से अपना कारवां उस तरफ ले जाने में सफल रही है, जहां वह भाजपा और कांग्रेस के बाद देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई है। खैर अभी इंडिया गठबंधन के लिए बहुत सी परीक्षाएं शेष हैं, उन पर चर्चा फिर कभी।

(लेखक दैनिक जनवाणी में समूह संपादक हैं)


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