- कोतवाली के शाहनत्थन ने दबोचा था शातिर हिस्ट्रीशीटर लुटेरा
- चलती बस में बडेÞ कारोबारी को कॉफी में नशा देकर अंजाम दी थी लूट की वारदात
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: मुंबई के माटूंगा थाने की पुलिस 40 लाख की लूट के आरोपी को ट्रांजिट रिमांड पर लेकर सोमवार को वापस लौट गयी। लूट का आरोपी यूनुस उर्फ अटैची पुत्र शफीकुद्दीन को कोतवाली थाना क्षेत्र के शाहनत्थन से दबोचा गया था। यूनुस कोतवाली थाने का पुराना हिस्ट्रीशीटर भी है। हालांकि इसका साथी यूसुफ निवासी समरगार्डन लिसाडीगेट दबिश से पहले फरार हो गया था।
गत 14 जून को अंजाम दी थी वारदात
मुंबई पुलिस के अधिकारी ने बताया कि गत 14 जून को पूना से मुंबई के बीच चलने वाली टूरिस्ट बस पिंक फिंगर में मुंबई के कारोबारी साठे सफर कर रहे थे। उसी बस में वारदात को अंजाम देने वाला मेरठ के कोतवाली इलाके का यूनुस अटैची व उसका साथी भी सफर कर रहा था। आरोप है कि इन्होंने अन्य साथियों के साथ मिलकर कारोबारी साठे को काफी में नशीला पदार्थ दे दिया। वह करीब 80 घंटे तक बेहोश रहे।
बेहोश होने पर ये बदमाश साठे से नकदी, मोबाइल, सोेने की चेन, अंगूठी समेत करीब 40 लाख के सामान की लूट कर फरार हो गए। मुंबई पुलिस की टीम ने सीसीटीवी से वारदात को अंजाम देने वाले बदमाशों को ट्रेस किया। तमाम रेलवे स्टेशनों पर ये बदमाश सीसीटीवी में कैद होते चले गए। टेÑस करते करते मुंबई पुलिस चार दिन पहले मेरठ आयी थी। कोतवाली में आमद दर्ज कराने के बाद धरपकड़ शुरू की थी।
चार दिन रुकी मुंबई पुलिस
मुंबई के माटूंगा थाना की पुलिस एसआई श्रीमाली के नेतृत्व में बीते चार दिन से मेरठ में डेरा डाले थी। मुंबई पुलिस कोतवाली थाना में लिखा पढ़ी के बाद कल सोमवार को गिरफ्तार किए गए हिस्ट्रीशीटर यूनुस को सोमवार को कोर्ट में पेश किया, जहां से ट्रांजिट रिमांड पर उसको लेकर मुंबई पुलिस मेरठ से निकल गयी।
मेरठ पुलिस के भरोसे नहीं, हत्या के मुकदमे के लिए मिलना होगा डीजीपी से
मेरठ: परीक्षितगढ़ थाना क्षेत्र के गांव अमरसिंहपुर में गत 16 जून को प्रियांशु का गोली लगा शव जंगल में पड़ा पाया गया था। बेटे की हत्या का मुकदमा दर्ज कराने का अभागे पिता संजीव वर्मा ने न जाने कितनी बार थाना, एसएसपी, एसपी देहात और दूसरे बडेÞ अफसरों की चौखट को चूना, लेकिन मुकदमा तब तक दर्ज नहीं हुआ। जब तक सूबे के डीजीपी की चौखट पर जाकर माथा नहीं रगड़ा। डीजीपी से फरियाद के बाद भी बेटा खो चुके पिता की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही थीं। डीजीपी के सख्त आदेशों के आगे एसओ परीक्षितगढ़ दीवार बनकर खडेÞ हो गए थे, लेकिन कहते हैं कि भगवान के यहां देर है, अंधेर नहीं।
एसओ परीक्षितगढ़ के रवैये की शिकायत पर लखनऊ और कड़ी फटकार लगी, तब कहीं जाकर प्रियांशु की हत्या का मुकदमा 38 दिन बाद जाकर दर्ज हो सका। इस पूरे मामले में बड़ी मदद एडवोकेट वीरेंद्र वर्मा काजीपुर की रही। वो यदि साथ ना होते तो शायद बेटा खोने वाले संजीव वर्मा कानूनी लड़ाई हार जाते। बेटे की हत्या के बाद से संजीव वर्मा आरोपियों के खिलाफ मुकदमे के लिए लगातार पुलिस अफसरों की परिक्रमा कर रहे थे, लेकिन अभागे पिता की मदद को पुलिस आगे आने को तैयार नहीं थी। संजीव वर्मा सबसे ज्यादा खिन्न एसओ परीक्षितगढ़ व सीओ के रवैये से नजर आए। उन्होंने आरोप लगाया कि उनके बेटे की हत्या की गयी थी,
लेकिन एसओ व सीओ दोनों ही हत्या की इस वारदात को आत्महत्या में दर्ज कराने पर तुले हुए थे। उनके द्वारा हत्या का आरोप लगाते हुए दी गई तहरीर रद्दी की टोकरी में फेंक दी गयी और लगातार आत्महत्या की तहरीर मांगते रहे। पुलिस के रवैये से खिन्न होकर ही उन्होंने डीजीपी प्रशांत कुमार के दरबार में हाजिरी दी और डीजीपी के दरबार से इंसाफ भी मिला। उन्होंने बताया कि डीजीपी ने उनकी पूरी बात सुनी। जो पोस्टमार्टम रिपोर्ट व सीसीटीवी की फुटेज भी डीजीपी को दिखाई। उसके बाद डीजीपी ने संजीव वर्मा को सीधे आईजी नचिकेता झा से मिलने को कहा।
संजीव वर्मा ने बताया कि डीजीपी आफिस से एसओ को कड़ी फटकार भी लगायी गयी थी, लेकिन जब वह मेरठ पहुंचे तो एसओ इतनी आसानी से हत्या का मुकदमा दर्ज करने को राजी नहीं थे। कभी एसएसपी के नाम पर तो कभी दूसरे अफसर के नाम पर उन्हें लगातार टरकाते रहे। सोमवार की शाम को कहीं जाकर नामजद आरोपियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया जा सका।

