- हालत ये है कि आजकल के युवा ओटीटी प्लेटफॉर्म को देखकर अनैतिक गतिविधियों में हो रहे लिप्त
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: आज के टेक्नोलॉजी फ्रेंडली दौर में हर कोई आगे रहना चाहता है। बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक देर रात तक मोबाइल स्क्रीन पर स्क्रोलिंग करते रहते हैं। जिस कारण उन्हें रात को देर से नींद आती है। दरअसल, कोरोना महामारी के समय भी बाहरी एक्टिविटी न होने की वजह से घर में ही टीवी, लैपटॉप और मोबाइल स्क्रीनों से ही सबका समय कटता था।
मगर इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि आज यह हर वर्ग की लत बनता जा रहा है। जिस वजह से लोगों में कई तरह के डिसआॅर्डर जैसे मूड स्विंग्स, चिड़चिड़ापन, एंगजायटी, गुस्सा, सहन करने की क्षमता का कम होना, कंसंट्रेशन में कमी देखे जा रहे हैं। हालत ये है कि आजकल के युवा ओटीटी प्लेटफॉर्म को देखकर अनैतिक गतिविधियों में लिप्त हो रहे हैं। जिसका सीधा असर उनके बौद्धिक विकास व उनकी मानसिकता पर पढ़ रहा है।
मानसिक रोग विशेषज्ञ डा. अभिनव पंवार बताते हैं कि आज के समय में बच्चों में लगातार फोन यूज करने की वजह से कई फिजिकल तथा मानसिक परेशानियां देखी जा सकती है। महीने में उनके उनके पास 80% प्रतिशत युवा ऐसे आते हैं। जिनकी समस्या का मुख्य कारण देर तक मोबाइल फोन पर निगाहें लगाए रखना है। वह बताते हैं कि इससे हाथों में दर्द की समस्या, ओबेसीटी, एंग्जायटी, गुस्सा आना प्रमुख है। डॉक्टर बताते हैं कि कोविड से पहले हर इंसान की दिनचर्या सामान्य थी। जिसमें वह कुछ समय अपने और अपनों के लिए निकालते थे।
मगर कोविड का असर लोगों के आचरण पर पड़ा है। उस समय आइसोलेटेड और फ्री टाइम में खुद को अकेलेपन में बोर होनें से बचाने की आड़ में फोन में ध्यान लगने लगा था। वही अब भी फॉलो किया जा रहा है। आज के लाइफस्टाइल में कोई भी बॉडी को आराम नहीं दे रहा है। आराम व रिलैक्स होने के समय में लोग स्क्रीन पर ज्यादा वक्त दे रहे हैं। आज लोगों के जीवन में रिलैक्स होने का पर्याय फोन देखना है। आज हर व्यक्ति हर समय सोशल मीडिया पर कुछ ना कुछ इनफॉरमेशन ढूंढता है, जैसे वाट्सएप, गूगल, इंस्टाग्राम आदि जिससे दिमाग हर वक्त किसी ना किसी काल्पनिक दुनिया में घूमता रहता हैं। साथ ही युवाओं में देर रात तक जागने की आदत और नुकसान पहुंचा रही है। कम नींद के कारण रोजमरा की कार्यशैली पर प्रभाव डाल रही है।

