Sunday, March 22, 2026
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सामने आने लगे हैं शहरीकरण के साइड इफेक्ट

SAMVAD

 


Dr. Rajender Sharmaअब यह कहना लगभग बेमानी होगा कि देश की आत्मा गांवों में निवास करती है। जिस तरह से समूची दुनिया में शहरीकरण हो रहा है, शहरों की और पलायन हो रहा है उससे अब हालात यह होते जा रहे हैं कि गॉंव तेजी से उजड़ने लगे हैं। गांवों की तुलना में शहरी आबादी में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। मानव इतिहास में संभवत: यह पहला मौका होगा जब गांवों की तुलना में शहरों में निवास करने वालों की आबादी अधिक हो गई है। एक समय था जब हमारे देश के बारे में तो कहा ही यह जाता था कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है। आज दुनिया के देशों की कुल आबादी में से 56 फीसदी आबादी शहरों में रहने लगी है। शहरीकरण की कमोबेश यह स्थिति दुनिया के अधिकांश देशों में हो रही है। गांवों से शहरों की और पलायन से आज दुनिया का कोई देश अछूता नहीं है। इसमें कोई दो राय नहीं कि शहरीकरण का पैमाना विकास को माना जाता है। आज वैश्विक आबादी 8.1 अरब हो गई है। इसमें से आधी से भी ज्यादा यानी कि लगभग 56 प्रतिशत आबादी शहरों में निवास करने लगी है। इसमें हमें स्वीकारना ही होगा कि जब भी शहरों में कोई नई कालोनी विकसित होती है तो यह साफ हो जाता है कि किसी ना किसी गांव की कुबार्नी उसमें छिपी होती है कोई ना कोई गांव उजड़ गया होगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि शहरीकरण को विकास का पैमाना माना जाता है। शहरों में गांवों की तुलना में अधिक साधन, सुविधाएं, रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा दूसरे शब्दों में आधारभूत सुविधाएं अधिक होती है। पर इसके साथ ही यह सुविधाएं उस मायने में सभी को नसीब भी नहीं होतीं। रोजगार के लिए गांवों से शहरों में आने वाले बहुतायत में लोगों को कच्ची बस्तियों, चालों या एक से दो कमरे के मकानों में किराए पर रहने को बाध्य होना पड़ता है। शहरों में बुनियादी सुविधाएं तो बहुत होती हैं, पर सामाजिक और पर्यावरणीय क्षेत्र में खासा नकारात्मक प्रभाव देखा जा सकता है। देखा जाए तो लाख सुविधाओं के बावजूद बढ़ती जनसंख्या और अन्य कारणों से शहरों में रहना दुभर ही होता जा रहा है। कोरोना काल में शहरों से गांवों की और वापसी हम देख चुके हैं और उस समय लगने लगा था कि कोरोना जैसी त्रासदी से जो हालात बने हैं ऐसे भविष्य में हालात ना बन सके, इसके लिए गांवों में आधारभूत सुविधाएं और गांव कस्बों को बेहतर परिवहन सेवाओं से जोड़ने के ठोस प्रयास होंगे पर यह सब तो दूर हां शहरीकरण और अधिक तेजी से देखने को मिलने लगा है।

दरअसल शहरीकरण के समय अन्य पहलूओं की और ध्यान ही नहीं दिया जाता है। कोलोनाइजर्स का एक ही उद्देश्य रहता है और वह उद्देश्य अधिक से अधिक लाभ कमाना होने के कारण उपलब्ध भूमि का अत्यधिक दोहन का प्रयास किया जाता है और परिणाम यह होता है कि उस क्षेत्र में उपलब्ध संसाधन लगभग नष्ट ही कर दिए जाते हैं। प्राकृतिक जल स्रोत समाप्त कर दिए जाते हैं, तो पानी के संग्रहण के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं। आबादी के घनत्व के कारण वातावरण प्रभावित होता है और जिस तरह से पर्यावरण को लेकर के समास्याओं से दो चार होना पड़ रहा है और मौसम में बदलाव देखा जा रहा है, कंक्रीट के जंगलोें के कारण तापमान नित नया रेकार्ड बनाता जा रहा है, वहीं पेयजल की समस्या, प्रदूषित वायु, सड़कों पर निर्बाध आवागमन की समस्या, अत्यधिक आवागमन साधनों के कारण प्रतिदिन की जाम की समस्या, नित नई बीमारियों का प्रकोप, अपशिष्टों के निस्तारण की समस्या और अपशिष्टों के कारण नित नए आकार लेते पहाड़, और तो और बिजली की अत्यधिक मांग के कारण आए दिन विद्युत संकट, अस्पतालों में लगती भीड़ जो बीमारी के ईलाज के स्थान पर बीमारी का कारण बनती जा रही है। मॉल कल्चर के कारण छोटे दुकानदारों और वैण्डर्स के सामने रोजगार की समस्या के साथ ही मॉल्स से भी मोहभंग होने के कारण घोस्ट तबदील होते मॉल्स आदि ऐसी समस्याएं हैं, जिनके कारण आम आदमी की सामान्य जिंदगी बुरी तरह प्रभावित हो रही है।

शहरीकरण का एक दूसरा रूप हर जरूरत का बाजारीकरण के रूप में देखा जा सकता है। चारों तरफ दुकानें ही दुकानें दिखाई देती हैं, चाहे वह शिक्षा के क्षेत्र में हो, स्वास्थ्य के क्षेत्र में हो या फिर खान-पान का क्षेत्र हो। यदि नियोजित तरीके से शहरीकरण होता है, शहरों का विस्तार होता है, आबादी के घनत्व को ध्यान में रखा जाता है, जहां नई कॉलोनी विकसित की जाती है, वहां आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं और प्राकृतिक स्रोतों ताल तलैयाओं को संरक्षित किया जाता है तो समस्या का कुछ हद तक समाधान देखा जा सकता है। पर ऐसा हो नहीं रहा है। प्रबुद्ध नागरिक इसको लेकर चिंतित रहते हैं और अनियोजित शहरी विकास को नियोजित विकास का रूप दिलाने के लिए न्यायालयों तक का दरवाजा खटखटाने लगे हैं। हालांकि आज ग्रामीण पर्यटन जैसे नए कंसेप्ट आने लगे हैं। लोग एकाध दिन गांवों में गुजारना चाहते हैं। ग्रामीण संस्कृति और रहन सहन से रूबरू होना चाहते हैं। इस दिशा में भी केवल व्यावसायिक दृष्टिकोण से आगे बढ़े जाने से परिणाम अपेक्षित प्राप्त होंगे, इस पर प्रश्न चिन्ह लगा हुआ है।

शहरीकरण के साइड इफेक्ट हमारे सामने आने लगे हैं। ऐसे में हमें गंभीर विचार करना होगा और इस तरह के प्रयास करने होंगे, जिससे प्रकृति और विकास में समन्वय बना रह सके। विकास प्रकृति को विकृत करने का माध्यम ना बन सके। नगर नियोजकों को इस और ध्यान देना ही होगा नहीं तो प्राकृतिक संसाधन जिस तरह से हम खोते जा रहे हैं, उनके दुष्परिणाम भी हमारे सामने आने लगे हैं तो भविष्य में हालात और अधिक गंभीर ही होंगे।


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