Wednesday, April 29, 2026
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जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक बदलाव की परीक्षा

Samvad 49

RAJESH MAHESHWARI 2साल 2019 में केंद्र शासित प्रदेश बनने और अनुच्छेद 370 के हटने के बाद जम्मू-कश्मीर एक दशक में अपने पहले विधानसभा चुनाव के लिए तैयार है। 90 सीटों के लिए तीन चरण के विधानसभा चुनाव के परिणाम 4 अक्टूबर को जारी होने की उम्मीद है। 2014 के बाद ये पहली बार होगा जब जम्मू-कश्मीर की जनता विधानसभा चुनाव में मतदान करेगी। 2022 में निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण के बाद जम्मू-कश्मीर में विधानसभा सीटों की संख्या बढ़कर 90 हो गई है। इसमें कश्मीर घाटी में और जम्मू में 43 सीटें शामिल हैं। जम्मू-कश्मीर में सितंबर माह तक चुनाव कराए ही जाने थे, क्योंकि सर्वोच्च अदालत का आदेश था। यह विधानसभा चुनाव जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त होने के बाद क्षेत्र में राजनीतिक बदलाव की पहली बड़ी परीक्षा होगी। चुनाव इस क्षेत्र में राजनीतिक भावना का एक प्रमुख संकेतक होंगे जो पिछले एक दशक में व्यापक बदलावों से गुजरा है।

जम्मू कश्मीर में जनादेश का यह समय 10 लंबे सालों के बाद आ रहा है, लेकिन कई महत्वपूर्ण परिवर्तन हो चुके हैं। संसद 5 अगस्त, 2019 को अनुच्छेद 370 और 35-ए को निरस्त कर चुकी है। अब यह भी देश के अन्य राज्यों और संघ शासित क्षेत्रों सरीखा सामान्य क्षेत्र है। पुराना राज्य दो भागों में विभाजित कर दिया गया था, लिहाजा राज्यत्व भी एक प्रमुख मुद्दा है। अब एक तरफ जम्मू-कश्मीर संघ शासित क्षेत्र है, तो दूसरी तरफ लद्दाख अलग होकर केंद्र शासित क्षेत्र है। अब सितंबर-अक्टूबर में जो विधानसभा चुनाव कराए जा रहे हैं, वे इन ऐतिहासिक बदलावों के संदर्भ में होंगे। आतंक से मिले गहरे घावों और असहनीय पीड़ा के बीच इस बात का संतोष और खुशी है कि जम्मू कश्मीर में लोकतंत्र फिर से लौट रहा है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया की शुरुआत हो रही है। प्रदेशवासी अपनी सरकार चुनने जा रहे हैं।

जनता अपनी विधानसभा का स्वरूप तय करेगी। और वहीं चुने हुए प्रत्याशी प्रदेश की दशा और दिशा तय करेंगे। ये चुनाव ऐसे परिदृश्य में हो रहे हैं, जब आतंकवाद अंतिम सांसे गिन रहा है। जो गिनती भर आतंकी सक्रिय लगते हैं, वे पाक परस्त घुसपैठिए हैं। उनके खिलाफ सेना और सुरक्षाबलों के आॅपरेशन जारी हैं। वैसे 2024 में ही जम्मू-कश्मीर में 36 आतंकी हमले किए जा चुके हैं। उनमें 35 आतंकी मारे गए और 19 जवान ‘शहीद’ हुए, जबकि कुछ नागरिक भी मारे गए।

बहरहाल आतंकी या उनके समर्थक अलगाववादी तत्व या तो जेल में बंद हैं अथवा बचे-खुचे चेहरे अपने घरों के भीतर चुपचाप बैठे हैं, लिहाजा यह दौर जनादेश के लिए बिलकुल सटीक है, लेकिन विधानसभा चुनाव के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर के ‘राज्यत्व’ बहाली पर भी सरकार को स्पष्ट संकेत देने चाहिए थे। राज्य के दो पूर्व मुख्यमंत्रियों उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती ने अनुच्छेद 370 और राज्यत्व की बहाली तक चुनाव न लड़ने के ऐलान किए हैं। इन पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। अनुच्छेद 370 और 35-ए को संसद ने निरस्त किया है और सर्वोच्च अदालत ने भी उसे ‘उचित फैसला’ करार दिया था। इसके बावजूद कांग्रेस यह दावा लगातार करती रही है कि अनुच्छेद 370 अब भी बरकरार है, उसे समाप्त नहीं किया गया। अच्छा यह होगा कि कांग्रेस ही किसी संवैधानिक मंच पर यह स्पष्ट करे कि किन आधारों पर पार्टी ऐसा दुष्प्रचार कर रही है।

वास्तव में यह जनादेश का समय इसलिए भी है कि वहां हालात बदल चुके हैं। जिन होटलों के कमरे खाली रहते थे, वे अब लगभग बुक रहते हैं। सभी सार्वजनिक और सामाजिक संस्थान खुल चुके हैं। अब श्रीनगर के ‘लाल चैक’ पर लोग, ‘तिरंगा’ लहराते हुए, चुनावों की घोषणा के जश्न मना रहे हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि धारा 370 को हटाने के बाद से जम्मू कश्मीर खासकर कश्मीर में बंद या बहिष्कार की कोई हुंकार नहीं है।

पत्थरबाजी लगभग बीता अध्याय हो गई है। हजारों करोड़ रुपए के निवेश आ रहे हैं। इस बदलाव के बावजूद आतंकवाद, बेरोजगारी, सुरक्षा, अनुच्छेद 370, राज्यत्व आदि प्रमुख चुनावी मुद्दे होंगे। जनादेश भाजपा, कांग्रेस, नेशनल कांफ्रेंस, पीडीपी आदि किन दलों के पक्ष में रहेगा, अभी नहीं कहा जा सकता। जम्मू कश्मीर में ‘इंडिया’ नामक विपक्षी गठबंधन का कश्मीर में कोई अस्तित्व नहीं है। लोकसभा में कांग्रेस और पीडीपी के हिस्से ‘शून्य’ आए थे। मीडिया रिपोर्ट की मानें तो अब्दुल्ला और भाजपा के बीच कांटेदार मुकाबला होना चाहिए। कुछ स्थानीय दलों और चेहरों ने भी चुनावी तौर पर चैंकाया है। तिहाड़ जेल में बंद, आतंकवाद समर्थक, इंजीनियर रशीद ने बारामूला संसदीय सीट पर उमर अब्दुल्ला को 2 लाख से अधिक वोट से पराजित कर दिया था। इसी तरह महबूबा भी लोकसभा चुनाव हार गईं। तभी से दोनों पूर्व मुख्यमंत्री सदमे की स्थिति में हैं। क्या ऐसे चौंकाने वाले जनादेश विधानसभा चुनाव के दौरान भी दिखेंगे?

वहीं चुनाव से जुड़े जोखिमों को भी ध्यान में रखना जरूरी है। पिछले दो तीन महीने से जम्मू कश्मीर में आतंकी दोबार सक्रिय हुए हैं। इस बार आंतकियों ने अपना ठिकाना जम्मू क्षेत्र को बना रखा है। पिछले तीन महीने में सुरक्षा बलों और सेना के कई कर्मी शहीद हो चुके हैं। जो चिंता का विषय है। चुनाव प्रक्रिया में व्यववधान डालने के लिए आंतकी संगठन किसी बड़ी कार्रवाई को अंजाम दे सकते हैं। वो कभी नहीं चाहेंगे कि जम्मू कश्मीर में शांति बहाल हो, लोग सुख शांति से समय व्यतीत करे। हमारे बहादुर जवान और खुफिया तंत्र जनादेश के इस पर्व को उल्लास से मनाने की स्थितियां बनाए रखेंगे, ऐसी देश को उम्मीद है।

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