Friday, May 22, 2026
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पति पत्नी में अहं कैसा?

Sanskar 3

मीनाक्षी सुकुमारन

समझौता तो जिंदगी की नियति है और प्यार में यदि थोड़ा-बहुत समझौता करने से रिश्तों में प्यार व मधुरता आती है तो क्या बुराई है। यदि स्नेह व आदर को सर्वोपरि रखें तो जिंदगी सुखमय रहेगी वरना अहं में दीमक उसे खोखला कर देंगे। इस तरह प्यार और सूझ-बूझ के साथ हम चाहें तो घर को अपने सपनों से सुन्दर महल बना सकते हैं या फिर नासमझी और अहं के चलते खंडहर मात्र बना सकते हैं।

विवाह जिसे एक पवित्र बंधन, एक अटूट रिश्ता या फिर सात जन्मों का रिश्ता भी कहा जाता है, असल में क्या है, यह कोई भी जान नहीं पाया है लेकिन यह तो तय है कि सामाजिक व रीति रिवाज के विधान के अनुसार यह बंधन उतना ही जरूरी है जैसे किसी भी मनुष्य के लिए सांस लेना। हर मां-बाप का भी यही सपना होता है कि उन की बेटी ब्याह कर अपने घर जाए और उस के पैदा होते ही यह बात मन में रहती है कि लडकी तो पराया धन है, एक दिन उसे विदा हो कर अपने घर जाना है और यही सोच कर उस का पालन-पोषण भी उसी अनुसार किया जाता है ताकि पराये घर जा कर उन की लाडली सुखी रहे किसी तरह की कोई परेशानी न हो। बचपन से यही सुनते-सुनते जब लडकी जवान होती है तो मानसिक तौर से यह दबाव उस पर हावी होने लगता है कि अब तो उसे अपने मां-बाप का घर छोड़ कर जाना ही होगा और कहीं-न-कहीं एक अनजाना-सा डर मन में घर कर लेता है कि पराया घर कैसा होगा, वहां के लोग कैसे होंगे, जिनके लिए हम सारे रिश्ते-नाते पीछे छोड़ जाएंगे। वो जीवन-साथी कैसा होगा? ऐसे न जाने कितने अनमने सवाल, अनदेखा भय मन में पनपने लगता है।

लेकिन वक्त की सुई किस के रोके रुकी है और आखिर वह घड़ी आ ही जाती है जब लडकी विवाह बंधन में बंध कर अपने पराये घर यानी ससुराल विदा होती है। तब वह अपने मन में अनेकों सवाल व अनेक शंकाएं लेकर दूसरे घर गृह-प्रवेश करती है। उस समय स्थिति कुछ ऐसी होती है मानो किसी पेड़ को जड़ से उखाड़ कर दूसरी जगह रोप दिया गया हो। कुछ ऐसी ही मन:स्थिति उस लडकी की भी होती है तो बचपन से जवां होने तक का एक लंबा समय अपने मां-बाप के लाड-प्यार व भाई-बहनों के दुलार में बिताती है और अचानक एक दिन एक ही झटके में पराई हो जाती है और नए माहौल, नए परिवेश में कदम रखती है।

यहां से उस का दूसरा सफर शुरू होता है जहां वह किसी की पत्नी है, किसी की बहू, किसी की भाभी, देवरानी, जेठानी और न जाने कितने ही रिश्ते जुड़ जाते हैं। एक ही बंधन से कई नए रिश्तों से जुड़ जाती हैं। नई आशाएं, नई अपेक्षाएं और ऐसे में जब एक लडकी अपनी भावनाओं को अपने वश में कर इस आने वाले घर को पराया न समझ अपना बनाने की मन में ठान लेती है तो कोई भी रिश्ता बोझ नहीं लगता। कोई भी आशा या अपेक्षा रास्ते की रूकावट महसूस नहीं होती और स्नेह सूत्र के जरिए वह पूरे परिवार के रंग-ढंग में रचती बसती चली जाती है क्योंकि यही तो उसकी दुनियां, उस का संसार है।
लेकिन क्या यह वाकई उतना आसान है जितना कहने-सुनने में? शायद नहीं क्योंकि यदि ऐसा होता तो शायद तलाक जैसी चीज हमारे समाज में होती ही नहीं और विवाह जिसे पवित्र बंधन और जन्मों का रिश्ता कहा जाता है, उसे किस्मत का खेल नहीं कहा जाता जिस का पासा यदि सही बैठा तो आप सुखी हैं अन्यथा आप की जिन्दगी बद से भी बदतर है।

यदि खुदा-न-खास्ता ऐसा होता है तो क्या सारा दोष किस्मत पर थोप देना उचित है? शायद नहीं क्योंकि जिस तरह पांचों उंगलियां बराबर नहीं होती उसी तरह सब का स्वभाव भी अलग-अलग होता है। कुछ लड़कियां स्वाभाविक रूप से ही सौम्य व सहज होती हैं और कुछ अहं के चलते हर चीज अपने मुताबिक ही चाहती हैं। वहीं दूसरी ओर कई परिवार भी अपनी बहू को पूरा समर्थन, पूरा सहयोग देते हैं, पूरा प्यार और मानसम्मान देते हैं जिस से उसे घर पराया नहीं, अपना लगे तो कहीं रिश्तों की आड़ में, परंपराओं के नाम पर या हमारे घर में तो ऐसा चलता है, यह रिवाज है, तुम्हें ऐसा करना होगा, तुम्हें वैसा करना होगा का दबाव रहता है। इस प्रकार के मानसिक दबाव के चलते वह तय नहीं कर पाती कि आखिर वह कहां तक सहयोग व समझौता करे।

कहीं कहीं तो पति का भी पूरा समर्थन साथ रहता है जो हर कदम पर अपनी पत्नी को नए माहौल में संभलने का, समझने का मौका देता है। वहीं दूसरी ओर कई पति भी परिवार के अनुरूप अपना दब-दबा बनाए रखना चाहते हैं। ऐसे में न चाह कर भी विद्रोह के बीज उपज ही आते हैं और जिंदगी एक अनकही अनबूझ पहेली-सी बन जाती है और आप अपने कदम जितने भी मजबूती से जमाना चाहें, धंसते ही चले जाते हैं और ऐसे में कलह-कलेश, अशांति, मानसिक हीनता के सिवा कुछ हाथ नहीं लगता। आपसी प्रेम, पारिवारिक मेल-जोल, एक भरा-पूरा परिवार, पति-पत्नी के रिश्ते में प्यार, विश्वास व आत्मीयता, बड़ों का सम्मान, छोटों को दुलार, ये सब बातें जैसे आज बेमानी होती चली जा रही हैं। हर कोई बस अपनी ही धुन में अपनी ही दुनियां में मस्त है।

आज जमाना चाहे कुछ भी हो, चाहे कितना ही स्वछन्द वातावरण व आधुनिक हो, समझदारी इसी में है कि हम रिश्तों में परस्पर मापदंड बनाए रखें और हर रिश्ते को पूरी ईमानदारी व आत्मीयता के साथ पूरी अहमियत दें। प्यार के मंथन से ही हम जीवन को सुखमय बना सकते हैं और छोटे-छोटे आपसी मतभेदों व कटुताओं को नजर अंदाज कर के ही हम रिश्तों को जोड़ सकते हैं वरना यह डोर इतनी नाजुक-सी होती है कि कब हाथों से छूट जाए, पता भी नहीं चलता और फिर पछताने से या लकीर पीटने से क्या फायदा-ह्यसब कुछ लुटा कर होश में आए तो क्या किया।

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