Sunday, May 31, 2026
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ऑनलाइन गेमिंग पर शिकंजा कसना जरूरी

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ऑनलाइन गेमिंग पर शिकंजा कसना जरूरी 2

केंद्रीय सरकार युवाओं को ऑनलाइन गेमिंग के चंगुल से बाहर निकालने और उन्हें सही दिशा दिखाने के उद्देश्य से एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए प्रमोशन एंड रेगुलेशन आॅफ आॅनलाइन गेमिंग बिल 2025 लेकर आई है। इस बिल के विधिवत कानून बनने के बाद पैसों से जुड़े सभी आॅनलाइन गेमिंग एप्लिकेशन पर सख्त रोक लगा दी जाएगी। सरकार का यह निर्णय निश्चित रूप से युवाओं के भविष्य को बचाने और समाज में फैल रही बुराइयों पर नियंत्रण लगाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। यह कदम जितना सराहनीय है उतना ही सार्थक भी है, क्योंकि आज की युवा पीढ़ी का एक बड़ा हिस्सा मोबाइल गेमिंग और ऑनलाइन सट्टेबाजी की गिरफ्त में फंसता जा रहा है।

जानकारी के मुताबिक, इस बिल में साफ प्रावधान किए गए हैं कि ऑनलाइन गेम खेलने वाले सामान्य खिलाड़ियों को कोई दंड नहीं मिलेगा, बल्कि कार्रवाई उन लोगों पर होगी जो इस तरह के एप संचालित करते हैं। ऐसे संचालकों को एक करोड़ रुपए तक का जुमार्ना और तीन साल तक की कैद भुगतनी पड़ सकती है। इतना ही नहीं, जो बड़े सितारे और सेलिब्रिटी इन गेमिंग एप्स का विज्ञापन करके युवाओं को बरगलाते हैं, उन पर भी दो साल तक की कैद और पचास लाख रुपए तक का जुमार्ना लगाया जाएगा। इस प्रकार, सरकार ने महज संचालकों पर ही नहीं, बल्कि ऐसे प्रचार-प्रसार करने वालों पर भी शिकंजा कसने का साफ संदेश दिया है।

नए बिल के तहत यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि सट्टेबाजी और दांव लगाने से जुड़े किसी भी प्रकार के गेम का कारोबार अब मंजूर नहीं होगा। ऑनलाइन गेमिंग की आड़ में चल रहे ऐसे सभी प्लेटफॉर्म, जो वास्तविक पैसे के लालच में बच्चों और युवाओं को आकर्षित करते हैं, अब पूरी तरह प्रतिबंधित होंगे। जिन खेलों में नकद कमाई का झांसा दिया जाता है या जहां खिलाड़ियों को लगातार पैसे लगाने के लिए प्रेरित किया जाता है, उन पर सरकार की नकेल कसना तय है।

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि ऑनलाइन सट्टेबाजी वाले खेलों में किशोर, वयस्क और यहां तक कि कामकाजी लोग तक अपनी मेहनत की कमाई और बचत को बर्बाद कर रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक, भारत का आनलाइन गेमिंग बाजार वर्ष 2016 में लगभग 54.30 करोड़ डॉलर का था। लेकिन महज छह वर्षों में यानी वित्त वर्ष 2022 तक यह बढ़कर लगभग 2.6 अरब डॉलर तक पहुंच गया। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इसी रफ्तार से विस्तार होता रहा, तो वर्ष 2027 तक यह आंकड़ा 8.6 अरब डॉलर को पार कर जाएगा। यह बढ़ोतरी महज आर्थिक पहलू नहीं दिखाती, बल्कि इस बात की भी पुष्टि करती है कि भारत में लोग किस तेजी से इस लत का शिकार हो रहे हैं।

गौरतलब है कि भारत इस वक्त पूरी दुनिया में सबसे अधिक मोबाइल गेम खेलने वाला देश बन चुका है। वर्ष 2021 में जहां तकरीबन 45 करोड़ भारतीय ऑनलाइन गेमर्स थे, वहीं महज एक साल के भीतर यह संख्या 50 करोड़ से अधिक हो गई। और तो और, एक रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2025 के अंत तक यह गिनती 70 करोड़ के करीब पहुंच सकती है। इनमें से एक बड़ा हिस्सा वे खिलाड़ी हैं जो वास्तविक पैसे लगाकर गेम खेलते हैं। वित्त वर्ष 2022 के दौरान ही भारत में लगभग 12 करोड़ मोबाइल यूजर्स ऐसे थे जिन्होंने ऑनलाइन गेमिंग के लिए वास्तविक धन का भुगतान किया। यह रकम गैंबलिंग और बेटिंग के अलावा गेम कॉइन्स, यूसी, गेम स्किन, गेम रैंक तथा अन्य वर्चुअल सामान खरीदने में खर्च की गई थी। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि देश में जुआ और सट्टेबाजी का ऑनलाइन प्लेटफॉर्म न केवल युवाओं बल्कि नाबालिग बच्चों तक को अपनी गिरफ्त में ले चुका है। जो इनकी बर्बादी का मुख्य कारण बन रहा है।

बेरोजगार युवाओं के लिए समय बिताने का सहारा या जल्दी अमीर बनने का सपना बनकर यह सट्टेबाजी उन्हें बर्बादी की राह पर ले जा रही है। कई परिवार आर्थिक संकट और कर्ज के बोझ तले दबते जा रहे हैं। वास्तविकता यह भी है कि जुए और सट्टे की इस प्रवृत्ति के चलते समाज में अपराध की घटनाएं लगातार बढ़ी हैं। चोरी, लूट और मारपीट जैसी घटनाओं में इजाफा हुआ है। और सबसे भयावह तथ्य यह है कि आनलाइन गेमिंग की लत तथा इसमें होने वाले आर्थिक नुकसान की वजह से देशभर से कई युवाओं द्वारा आत्महत्या करने के मामले भी सामने आए हैं।
यह कहना गलत नहीं होगा कि आॅनलाइन गेमिंग के जरिए युवा आबादी को जुए और सट्टे जैसी खतरनाक लत में धकेला जा रहा है। यह केवल आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं है, बल्कि मानसिक तनाव, पारिवारिक कलह और सामाजिक विघटन का भी कारण बनता जा रहा है। इसलिए सरकार का यह कदम समय की मांग है और पूरी तरह स्वागत योग्य है। जब यह कानून प्रभावी रूप से लागू होगा, तो निश्चित ही यह युवा पीढ़ी को एक नई दिशा देगा।

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