Monday, March 16, 2026
- Advertisement -

फलस्तीन के हक में बड़ा कदम

02 18

टेन, कनाडा और आस्ट्रेलिया द्वारा 21 सितंबर को फलस्तीन को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता देना मध्य पूर्व की भू-राजनीति में एक ऐतिहासिक कदम है। यह फैसला गाजा में दो साल से चल रहे विनाशकारी युद्ध, वेस्ट बैंक में गैरकानूनी इस्राइली बस्तियों के विस्तार और विश्व शांति प्रयासों की असफलता के बीच आया है। यह कदम दो-राष्ट्र समाधान को पुनर्जनन देने का प्रयास है, जो इस्राइल और फलस्तीन के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की नींव रख सकता है। फिर भी, सवाल यह है: क्या यह प्रतीकात्मक कदम जमीन पर बदलाव ला पाएगा, या केवल कूटनीतिक बयानबाजी तक सीमित रहेगा? यह मान्यता 1917 के बाल्फोर घोषणापत्र की छाया में देखी जानी चाहिए, जब ब्रिटेन ने फलस्तीन में यहूदी राष्ट्रीय घर की स्थापना का समर्थन किया था, साथ ही गैर-यहूदी आबादी के अधिकारों की रक्षा का वचन दिया था। एक सदी बाद, उसी ब्रिटेन ने फलस्तीन को राष्ट्र का दर्जा दिया, जिसे कनाडा और आॅस्ट्रेलिया ने तुरंत समर्थन दिया। यह जी-7 देशों का साझा कदम है, जो अमेरिका—इस्राइल का सबसे मजबूत सहयोगी—की अनुपस्थिति में और भी महत्वपूर्ण है। संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों में से करीब 75 प्रतिशत पहले ही फलस्तीन को मान्यता दे चुके हैं, जिनमें चीन और रूस जैसे सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य शामिल हैं। अब, ब्रिटेन, कनाडा और आॅस्ट्रेलिया के जुड़ने से चार स्थायी सदस्यों का समर्थन मिला है, जो फलस्तीन की वैश्विक स्थिति को और मजबूत करता है।

हालांकि, यह मान्यता अभी प्रतीकात्मक है, क्योंकि फलस्तीन पूर्ण राष्ट्र नहीं है। इसकी कोई स्पष्ट सीमाएं, स्वतंत्र सेना, या अपनी राजधानी पर नियंत्रण नहीं है। वेस्ट बैंक पर इस्राइली सैन्य कब्जा और गाजा में हमास का प्रभाव इसकी संप्रभुता को सीमित करता है। फिर भी, यह कदम नैतिक और राजनीतिक रूप से शक्तिशाली है। यह संयुक्त राष्ट्र में फलस्तीन की पर्यवेक्षक भूमिका को मजबूत करेगा, राजनयिक कार्यालयों की संख्या बढ़ाएगा, और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर फलस्तीनी आवाज को बल देगा। खेल, सांस्कृतिक और वैश्विक आयोजनों में इसकी भागीदारी को और वैधता मिलेगी। सबसे बड़ा प्रभाव इस्राइल पर पड़ेगा, जो अब अंतरराष्ट्रीय अलगाव के कगार पर है।

गाजा में 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले के बाद शुरू हुआ इस्राइली सैन्य अभियान अब तक 65,000 से अधिक फिलिस्तीनियों की जान ले चुका है, जिनमें ज्यादातर आम नागरिक हैं। संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट बताती है कि गाजा का 90 प्रतिशत हिस्सा विस्थापित है, भुखमरी और बीमारियां फैल रही हैं, और बुनियादी ढांचा पूरी तरह नष्ट हो चुका है। वेस्ट बैंक में इस्राइली बस्तियों का विस्तार—जो अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत गैरकानूनी है—तेजी से बढ़ रहा है। ई-1 परियोजना जैसी योजनाएं वेस्ट बैंक को दो हिस्सों में बांट सकती हैं, जिससे फलस्तीनी राज्य की भौगोलिक संरचना खतरे में है। इस पृष्ठभूमि में, यह मान्यता इस्राइली नीतियों पर वैश्विक असंतोष का प्रतीक है। यह कदम गाजा में तत्काल युद्धविराम और मानवीय सहायता की मांग को मजबूत करता है, साथ ही दो-राष्ट्र समाधान की दिशा में दबाव बनाता है।

इस्राइल ने इस मान्यता को कड़े शब्दों में खारिज करते हुए इसे हमास के आतंक को पुरस्कार करार दिया। उसका तर्क है कि यह कदम हमास को सशक्त करता है और बंधकों की रिहाई को और जटिल बनाता है। इस्राइली नेतृत्व ने पहले फ्रांस और आॅस्ट्रेलिया पर “यहूदी-विरोधी भावनाओं को भड़काने” का आरोप लगाया था, और अब ब्रिटेन व कनाडा भी इस आलोचना के निशाने पर हैं। यह प्रतिक्रिया इस्राइल की उस रणनीति को उजागर करती है, जो जॉर्डन नदी के पश्चिम में किसी भी फलस्तीनी राज्य की स्थापना को स्वीकार करने से इंकार करती है। वर्तमान में, इस्राइली सरकार वेस्ट बैंक के बड़े हिस्सों को औपचारिक रूप से हड़पने की योजना बना रही है, जिससे दो-राष्ट्र समाधान की संभावनाएं और कमजोर हो रही हैं।

हालांकि, इस्राइल का यह रुख उसे वैश्विक मंच पर और अलग-थलग कर सकता है। फ्रांस, बेल्जियम, लक्जमबर्ग और माल्टा जैसे यूरोपीय देश जल्द ही संयुक्त राष्ट्र में ऐसी ही घोषणाएं कर सकते हैं। यह बदलाव इस्राइल पर गाजा में सैन्य कार्रवाई रोकने और वेस्ट बैंक में बस्तियों के विस्तार को समाप्त करने का दबाव बढ़ाएगा। साथ ही, यह अमेरिका के लिए भी एक चुनौती है, जो अब तक इस्राइल का अटल समर्थक रहा है। अमेरिका ने इस मान्यता को ‘प्रदर्शनकारी कदम’ कहकर आलोचना की है, लेकिन जब उसके जी-7 सहयोगी अलग रास्ता चुन रहे हैं, तो उसे अपनी नीतियों की समीक्षा के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।

यह मान्यता दो-राष्ट्र समाधान को पुनर्जन्म दे सकती है, जो 1967 की सीमाओं पर आधारित एक फलस्तीनी राज्य की स्थापना की कल्पना करता है, जिसमें पूर्वी यरूशलम राजधानी हो। फिर भी, कई बाधाएं बरकरार हैं। पहली, हमास का पूर्ण निशस्त्रीकरण, जो इस्राइल और पश्चिमी देशों की प्रमुख शर्त है। दूसरी, फलस्तीनी प्राधिकरण की अपनी जमीन और लोगों पर सीमित सत्ता, जो इस्राइली कब्जे और आंतरिक राजनीतिक विभाजन से कमजोर है। तीसरी, फलस्तीनी क्षेत्रों में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव, जिसमें हमास की कोई भूमिका न हो। चौथी, गाजा में तत्काल मानवीय सहायता और पुनर्निर्माण, जो युद्ध और नाकेबंदी के कारण असंभव-सा प्रतीत होता है।
क्षेत्रीय स्तर पर, यह कदम मध्य पूर्व की गतिशीलता को गहराई से प्रभावित करेगा। ईरान-समर्थित समूह जैसे हिजबुल्लाह और यमन के हूती विद्रोही इसे अपनी जीत मान सकते हैं, जिससे क्षेत्रीय तनाव और बढ़ सकता है। सऊदी अरब और फ्रांस द्वारा प्रस्तावित शांति सम्मेलन अब और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि यह फलस्तीनी मुद्दे को वैश्विक मंच पर केंद्र में लाता है। वैश्विक स्तर पर, यह कदम उन दक्षिणपंथी सरकारों को चुनौती देता है जो मानवाधिकारों को नजरअंदाज करती हैं। साथ ही, यह वैश्विक दक्षिण के देशों को प्रेरित करेगा, जो लंबे समय से फलस्तीनी संघर्ष का समर्थन करते रहे हैं।

यह मान्यता मुख्य रूप से प्रतीकात्मक है। फिर भी, यह कदम एक सशक्त नैतिक और राजनीतिक संदेश देता है: विश्व समुदाय अब इस्राइली नीतियों को मूक सहमति नहीं देगा। यह फिलिस्तीनियों को वैश्विक मंच पर नई ताकत प्रदान करता है और इस्राइल को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार के लिए बाध्य करता है। ब्रिटेन, कनाडा और आॅस्ट्रेलिया का यह कदम फलस्तीनी संघर्ष को वैश्विक केंद्र में लाता है, दो-राष्ट्र समाधान की दिशा में एक नया द्वार खोलता है। यह इस्राइल को अंतरराष्ट्रीय मंच पर और अलग-थलग करता है, साथ ही अमेरिका पर अपनी नीतियों की समीक्षा के लिए दबाव बढ़ाता है। लेकिन इसकी सफलता तभी संभव है, जब इसके साथ जमीनी कार्रवाई हो—गाजा में तत्काल मानवीय सहायता, वेस्ट बैंक में कब्जे का अंत, और फलस्तीनी एकता का निर्माण।

spot_imgspot_img

Subscribe

Related articles

UP: मुरादाबाद में दर्दनाक सड़क हादसा, ट्रैक्टर-ट्रॉली से टकराई कार, चार युवकों की मौत

जनवाणी ब्यूरो । नई दिल्ली: भरी ट्रैक्टर-ट्रॉली में जा घुसी।...

सिलेंडर बिन जलाए रोटी बनाने की कला

मैं हफ्ते में एक दिन आफिस जाने वाला हर...

सुरक्षित उत्पाद उपभोक्ता का अधिकार

सुभाष बुडनवाला हर वर्ष 15 मार्च को विश्व भर में...

पुराना है नाम बदलने का चलन

अमिताभ स. पिछले दिनों, भारत के एक राज्य और कुछ...
spot_imgspot_img