Friday, March 27, 2026
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शारदीय नवरात्रि 2025: चतुर्थ दिवस पर मां कूष्मांडा की पूजा का विशेष महत्व, जानें पूजन विधि और लाभ

नमस्कार,दैनिक जनवाणी डॉटकॉम वेबसाइट पर आपका हार्दिक स्वागत और अभिनंदन है। शारदीय नवरात्रि का चौथा दिन देवी दुर्गा के चतुर्थ स्वरूप मां कूष्मांडा को समर्पित होता है। इस दिन श्रद्धालु अत्यंत श्रद्धा और निष्ठा के साथ मां की पूजा करते हैं, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि माता की उपासना से साधक के भीतर स्थित अनाहत चक्र जाग्रत होता है, जो आध्यात्मिक उन्नति और सकारात्मक ऊर्जा का केंद्र होता है।

जब कुछ न था, तब थीं मां कूष्मांडा

शास्त्रों के अनुसार, जब संपूर्ण सृष्टि अंधकार में डूबी हुई थी और चारों ओर शून्यता का साम्राज्य था, तब मां कूष्मांडा ने अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की। इसी कारण उन्हें “कूष्मांडा” कहा गया, जिसका अर्थ है — अण्ड की रचना करने वाली देवी।

मां कूष्मांडा को सृष्टि की आदिशक्ति और सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि वे सूर्यलोक में निवास करने वाली एकमात्र शक्ति हैं, जिनका तेज सूर्य के समकक्ष है। उनका प्रकाश दसों दिशाओं को आलोकित करता है।

अष्टभुजा स्वरूप और दिव्य आयुध

मां कूष्मांडा का स्वरूप अत्यंत तेजस्वी और दिव्य है। वे अष्टभुजा धारी हैं और प्रत्येक हाथ में अलग-अलग आयुध सुशोभित हैं —

कमंडलु, धनुष, बाण, कमल, अमृतकलश, चक्र, गदा और जपमाला।
इनका वाहन सिंह है, जो शक्ति, साहस और निर्भयता का प्रतीक है।

पूजन विधि और विशेष भोग

नवरात्रि के चौथे दिन प्रातः काल स्नानादि के बाद कलश पूजन कर मां कूष्मांडा का ध्यान करें। उन्हें फूल, धूप, दीप, नैवेद्य और गंध अर्पित करें।
मालपुए का भोग विशेष रूप से प्रिय माना जाता है। इस दिन ब्राह्मणों को भोजन कराना और प्रसाद वितरित करना पुण्यकारी होता है।

देवी मंत्र

“सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥”

पूजा से प्राप्त होने वाले लाभ

मां की कृपा से साधक को रोग, शोक, भय और क्लेश से मुक्ति मिलती है।

जीवन में यश, आयु, बल और बुद्धि का संचार होता है।

जो कार्य लंबे समय से बाधित हैं, वे भी पूर्ण होने लगते हैं।

आध्यात्मिक चेतना का विकास होता है और साधक भक्ति मार्ग में आगे बढ़ता है।

श्रद्धा से करें व्रत-पूजन, पाएं मां का आशीर्वाद

मां कूष्मांडा की आराधना सहज है, परंतु उसमें निश्छलता और श्रद्धा होना आवश्यक है। ऐसा विश्वास है कि मां अपने भक्तों की छोटी-सी सेवा से भी प्रसन्न होकर उन्हें सुख, शांति और समृद्धि प्रदान करती हैं।

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