हमें तंगनजरी छोड़ दिलों के दरवाजे खोलने होंगे। रवादरी की रवायत को बरकरार रखना होगा। अदब को सही अर्थों में बरतना होगा। क्योंकि अदब ही वह खनकती कुंजी है, जो नफरतों के जंगआलूद ताले खोल सकती है। अदब ही वह डोर है जो दिलों के तार जोड़ सकती है। अदब ही वह ढाल है, जो अहले-मोहब्बत को सायबान अता करती है। लेकिन आज अफसोस से कहना पड़ता है कि अदब के बादबान लहराने वाले खाक हो चुके हैं।
आतिफ रब्बानी
‘अदब’ उर्दू जबान का एक लफ़्ज है। इस शब्द के कई अर्थ हैं। लेकिन जिन दो अर्थों में इसका अक्सर प्रयोग होता है, उसके लिए अंग्रेजी में शब्द हैं लिट्रेचर और रिस्पेक्ट-यानी साहित्य और सम्मान या आदर। विडंबना है कि जैसे-जैसे हम आधुनिकता की मंजिÞलें तय कर रहे हैं, वैसे-वैसे हम अदब से दूर होते जा रहे हैं। आज की पीढ़ी के पास न तो बड़े-बुजुर्गो के लिए अदब या सम्मान का जज्बा है, और न ही इनके पास इतना वक़्त कि किताबों में मौजूद अदब या साहित्य को पढ़ सके। जबकि अदब इंसान को बा-अदब बनाता है। उसको संवेदनशील बनाता है। दूसरों की भावनाओं के प्रति संवेदनशील बनाता है। लेकिन जमाने के साथ अदब के मायनो-मतलब में भी परिवर्तन आ गया है।
अदब के हवाले से एक किस्सा याद आ गया। कहानी यूं है-मौलाना जलालुद्दीन रूमी अपने मुरीदों और शागिर्दों के साथ कहीं जा रहे थे। रात का वक़्त था कि एक तंग गली में पहुंचे। आगे एक बड़ा तगड़ा कुत्ता सोया हुआ था, जिससे रास्ता रुक गया था। अगर ऊपर से फलांग के जाते, तो वह कुत्ता उठ जाता। ऐसे में मौलाना रूमी खड़े हो गए और काफी देर तक खड़े रहे। एक शख़्स आया और कुत्ते को पांव से मार कर रास्ते से हटाने की कोशिश की। मौलाना ने उस शख़्स का हाथ पकड़ लिया और कहा-‘कुत्ता आराम कर रहा है, इसके आराम में क्यों खलल डाल रहे हो? जब वह नींद पूरी करके जाग जाएगा तो हम गुजर जाएंगे’।
ऐसे लोग तो कुत्तों का भी इतना खयाल रखते थे, और आज हम इंसानों का कितना खयाल रखते हैं? दुनिया ऐसे ही लोगों के चलते आबाद है। ऐसे लोग हर दौर, हर युग में रहे हैं। लाइब्रेरियों की अलमारियों में धूल खाती किताबों के पन्ने ऐसे अनगिनत मिसालों से भरे पड़े हैं, जिनके हर हर्फ़ से अदब छलकता है। लेकिन इस दौरे-हाजिर में किसी के पास इन पन्नों को पलटने का समय कहां!
अदब और अदीबों के प्रति आदर का भाव खत्म हो चुका। पिछले दिनों की ही घटना को लीजिए। कोलकाता में पश्चिम बंगाल उर्दू अकादमी द्वारा एक कार्यक्रम आयोजित किया जाना था। इस कार्यक्रम में मशहूर शायर जावेद अख़्तर को आना था। पश्चिम बंगाल के कट्टरपंथियों को इस प्रोग्राम में जावेद अख़्तर की शिरकत से ऐतराज था। ऐतराज क्यों था? वह इसलिए कि जावेद अख़्तर अलल-ऐलानिया यानी खुले तौर पर अपने को नास्तिक कहते हैं।
जावेद साहब के खयालात और नजरियात दुनिया से ढके-छुपे नहीं हैं। वे हमेशा-से मजहबी इंतिहापसंदी के खिलाफ खुलकर बात करते रहे हैं। कट्टरता और कूपमंडूकता को उन्होंने हमेशा निशाना बनाया है। हालिया दिनों में उन्होंने कोई ऐसी बात भी नहीं कही जिसे ‘भड़काऊ’ कहा जा सके। ऐसा कोई वक्तव्य जारी नहीं किया जिससे ‘भावना आहत’ हो। और जिसकी बुनियाद पर ‘सच्चे ईमान वालों’ का गुस्सा यूं भड़क उठे, जिसका प्रदर्शन कोलकाता में हुआ। उर्दू अदब के कर्णधारों के मुलम्मे में कट्टरपंथियों ने उनकी बेअदबी का बीड़ा उठाया। इन लोगों ने ऐसी भाषा इस्तेमाल की, जो अफसोसनाक भी थी और गैर-मुहज्जब भी। अब इन कट्टरपंथियों को कौन समझाए कि उर्दू शायरी का बेशतर हिस्सा कुफ्र और इल्हाद यानी नास्तिकता के रंग में सराबोर है। उर्दू के सबसे बड़े शायर मिर्जा गालिब तो खुदा के वजूद पर ही सवालिया निशान लगाते हैं-
न था कुछ तो खुदा था कुछ न होता तो खुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता।
मजहब बताता है कि खुदा आदिल है यानी न्याय करनेवाला है। अद्ल या इंसाफ खुदा की सिफत है। गालिब फिर आरोप गढ़ते हैं-
पकड़े जाते हैं फरिश्तों के लिखे पर नाहक
आदमी कोई हमारा दमे-तहरीर भी था
साहिर लुधियानवी तो और आगे बढ़ गए! खुदा को तो उन्होंने इंसान की तखलीक करार दे दिया। वे कहते हैं-
हर एक दौर का मजहब नया खुदा लाया
करें तो हम भी मगर किस खुदा की बात करें।
जौन एलिया तो सिरे से ही खुदा का इंकार करते हैं। वह कहते हैं-
यूं जो तकता है आसमान को तू
कोई रहता है आसमान में क्या।
जोश मलीहाबादी का क्या ही कहना! वो तो खुदा को अपने से भी छोटा बता रहे हैं। जोश मलीहाबादी का असल नाम शब्बीर हसन खां था। वह कहते हैं-
लेता है जो इंतकाम तो खोटा है खुदा
जिसमें शामिल न हो सोना वो गोटा है खुदा
शब्बीर हसन खां नहीं लेते बदला
शब्बीर हसन खां से भी छोटा है खुदा।
गुमान गालिब है कि इन बेमिसाल शायरों को भी, अगर वो आज जिंदा होते, पाश्चिम बंगाल उर्दू अकादमी उन्हें अपनी बात कहने का मौका नहीं देती। उनके खिलाफ भी गैर-मुहज्जब और बेअदब भाषा इस्तेमाल की जाती। अच्छा हुआ कि ये शायर अब दुनिया में नहीं हैं।
अगर किसी समूह के पास चेतना न हो, तो वह भीड़ में बदल जाता है। और अगर एक समूह के पास चेतना हो, तो वह जागृत समुदाय में बदल जाएगा। बामंजिÞल हो जाएगा। सितमजरीफी है कि हमने अदब से नाता ही तोड़ लिया। हम मजहब के नाम पर हठधर्मिता पर आमादा हैं। बात-बेबात हमारी भावनाएं आहत हो जाती हैं। शायर ने खूब कहा है- शेर से शायरी से डरते हैं कम-नजर रौशनी से डरते हैं।
हमें तंगनजरी छोड़ दिलों के दरवाजे खोलने होंगे। रवादरी की रवायत को बरकरार रखना होगा। अदब को सही अर्थों में बरतना होगा। क्योंकि अदब ही वह खनकती कुंजी है, जो नफरतों के जंगआलूद ताले खोल सकती है। अदब ही वह डोर है जो दिलों के तार जोड़ सकती है। अदब ही वह ढाल है, जो अहले-मोहब्बत को सायबान अता करती है। लेकिन आज अफसोस से कहना पड़ता है कि अदब के बादबान लहराने वाले खाक हो चुके हैं। अल्लामा इकबाल ने कहा है-
खमोश ए दिल भरी महफिल में चिल्लाना नहीं अच्छा
अदब पहला करीना है मुहब्बत के करीनों में।

