
निश्चय ही भारत की गिरती प्रजनन दर एक उपलब्धि है, लेकिन यह एक कठिन परीक्षा भी है। ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ की खिड़की धीरे-धीरे बंद हो रही है। निर्भरता अनुपात गड़बड़ा रहा है। प्रजनन दर में क्षेत्रीय असंतुलन गहरा रहा है। इन सब से पार पाने का एक ही रास्ता है-मानव संसाधन के विकास के लिए ऐसी नीतियां अपनाई जाएं, जो क्षेत्रीय आवश्यकताओं और आकांक्षाओं के अनुरूप हों।
आतिफ रब्बानी
विकसित देशों में जनसंख्या वृद्धि ढलान पर है। इन देशों में जन्म दर घट रही है। दुनिया की आधी से अधिक आबादी ऐसे क्षेत्रों में रहती है, जहाँ प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर से नीचे है। ‘लैंसेट’ के एक अध्ययन के अनुसार साल 2021 तक विश्व के 204 देशों में से 110 देश ऐसे थे, जहाँ कुल प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर से नीचे थी। इनमें यूरोप, कनाडा, आॅस्ट्रेलिया, चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका के अधिकांश देश शामिल थे। अद्यतन नमूना पंजीकरण प्रणाली यानी सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम के आंकड़ों के अनुसार भारत भी उन देशों के समूह में शामिल हो गया, जिनका कुल प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर से नीचे पहुंच गया है।
हाल ही में जारी सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम की ‘सांख्यिकीय रिपोर्ट-2023’ इसी ओर इशारा कर रही है। रिपोर्ट के आंकड़े एक बड़े शांत जनसांख्यिकीय परिवर्तन की ओर संकेत कर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, भारत का कुल प्रजनन दर या टीएफआर घटकर 1.9 रह गया है। वर्ष 2021 और 2022 में यह 2.0 पर बना हुआ था। कुल प्रजनन दर या टीएफआर का तात्पर्य महिला की पूरी प्रजनन आयु—जो आमतौर पर 15 से 49 वर्ष के बीच मानी जाती है—में पैदा होने वाले बच्चों की औसत संख्या संख्या से है। 2.1 के टीएफआर को प्रतिस्थापन स्तर कहा जाता है। इस स्तर पर जनसंख्या स्वयं को प्रतिस्थापित करती है, यानी दीर्घावधि में जनसंख्या का आकार स्थिर बना रहता है। 2.1 से अधिक टीएफआर जनसंख्या वृद्धि को दशार्ता है, जबकि 2.1 से कम टीएफआर जनसंख्या में कमी को दशार्ता है। रिपोर्ट में पहली बार, ग्रामीण भारत की टीएफआर भी 2.1 के स्तर तक पहुंच गई है, जबकि शहरी भारत की दर और भी कम होकर 1.5 पर आ गई है।
अत्यंत भौगोलिक विविधता वाले देश भारत में, टीएफआर के मामलों में भी क्षेत्रीय असंतुलन देखने को मिल रहा है। बिहार ने सबसे अधिक टीएफआर दर्ज किया है, जो 2.8 के स्तर पर है। वहीं सबसे कम स्तर दिल्ली में रहा है, जो 1.2 है। कुल मिलाकर, 18 राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों में टीएफआर प्रतिस्थापन स्तर से नीचे रहा है। जिन राज्यों में यह दर अधिक रही, वे सभी उत्तरी भारत में हैं झ्र बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़। दिल्ली के बाद पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और महाराष्ट्र का टीएफआर 2.0 से नीचे रहा है।
टीएफआर में यह गिरावट सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक बदलावों की वजह से दर्ज की गई है। शहरीकरण की तेज रफ़्तार, बच्चों की परवरिश की बढ़ती लागत, गर्भनिरोधकों की उपलब्धता और महिलाओं की शिक्षा-जैसे अनेक कारक है, जिनसे टीएफआर में कमी आई है। गर्भनिरोधकों की उपलब्धता ने पारिवारिक आकांक्षाओं को बदल दिया है। नोबेल पुरस्कार से सम्मानित सुविख्यात अर्थशास्त्री क्लाउडिया गोल्डिन का कहना है कि महलाओं की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में परिवर्तन लाने में गर्भनिरोधक ने क्रांतिकारी किरदार अदा किया है। इसको वह ‘खामोश क्रांति’ की संज्ञा देती हैं। वे अपने शोधपत्र ‘द पॉवर आॅफ द पिल’ में बताती हैं कि गर्भनिरोधक तक पहुंच ने अधिक महिलाओं को उच्च शिक्षा और करियर बनाने में सक्षम बनाया। इसने महिलाओं की श्रम शक्ति में भागीदारी को बढ़ा दिया। नतीजतन शादी की उम्र बढ़ गई और प्रजनन दर कम हुई। हालांकि उनका यह अध्ययन 60-70 के दशक में अमेरिकी महिलाओं के संदर्भ में था, लेकिन इसके निष्कर्ष मौजूदा भारतीय परिप्रेक्ष्य में भी काफी हद तक सही साबित होते हैं।
जाहिर है कि कुल प्रजनन दर में होनेवाली यह गिरावट एक सकारात्मक संकेत है-यह लैंगिक सशक्तिकरण की पेशरफ़्त है। वहीं, इसके जटिल आर्थिक परिणाम भी हो सकते हैं। सबसे बड़ी चिंता तो भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश पर खतरे को लेकर है। देश की युवा कार्यबल सबसे बड़ी आर्थिक ताकत रही है। चूंकि प्रजनन दर ढलान पर है, इसलिए आने वाले दशकों में कार्यशील आबादी अपनी चरम सीमा पर पहुंचकर घटने लगेगी। इसका सीधा असर निर्भरता अनुपात पर पड़ेगा। निर्भरता अनुपात का तात्पर्य कार्यशील आयु वर्ग की तुलना में आश्रितों की संख्या का अनुपात है। यह कार्यशील जनसंख्या पर सामाजिक समर्थन के बोझ को दशार्ता है। उच्च अनुपात का मतलब है कि अर्थव्यवस्था पर अधिक दबाव है, जबकि कम अनुपात बेहतर आर्थिक और सामाजिक स्थिति का संकेत देता है। जाहिर है कि टीएफआर के प्रतिस्थापन स्तर से कम होते जाने पर निर्भरता अनुपात गड़बड़ाएगा। इसका मतलब होगा-कम कार्यशील लोग अधिक निर्भर आबादी का भार उठाएंगे।
राज्यों के बीच असमान प्रजनन दर ने इस स्थिति को और जटिल बना दिया है। उत्तर भारतीय राज्यों में अपेक्षाकृत उच्च प्रजनन दर है, जबकि दिल्ली, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्य औसत से काफी नीचे हैं। इससे राज्य के बीच श्रमिकों का प्रवास बढ़ सकता है, जिससे अनेक सामाजिक तनाव उत्पन्न हो सकते हैं। कृषि, विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों को युवा श्रमिकों की कमी का सामना करना पड़ सकता है। वहीं पेंशन, स्वास्थ्य सेवाओं और बुजुर्गों की देखभाल पर दबाव बढ़ेगा।
इस परिवर्तनों का समाधान संतुलित और सूझबूझ भरी नीतियों से ही संभव है। परिवार नियोजन नीतियों को क्षेत्रीय विविधताओं के अनुरूप ढालना होगा। उच्च-प्रजनन दर वाले राज्यों को जनसंख्या स्थिरीकरण पर ध्यान देना होगा। वहीं कम प्रजनन दर वाले राज्यों को बच्चों के जन्म को प्रोत्साहित करने के लिए बाल देखभाल सुविधाएँ, मातृत्व-पितृत्व अवकाश और वित्तीय प्रोत्साहन-जैसे अनेक उपायों को अपनाना होगा।
इन उपायों में सबसे पहले, नीतिकारों का ध्यान संख्या अथवा मात्रा के बजाय गुणवत्ता की ओर होना चाहिए। जिसके लिए भारत को मानव संसाधन में भारी निवेश करना होगा। बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और रोजगार के अवसर सुनिश्चित करने के उपाय ढूंढने होंगे। शिक्षा में निवेश निम्न प्रजनन दर के नकारात्मक प्रभाव को संतुलित कर देता है। हाल ही में जर्मनी के रोस्टॉक स्थित मैक्स प्लैंक जनसंख्या अनुसंधान संस्थान के एक अध्ययन ने दिखाया कि शिक्षा पर किया गया खर्च, कम जन्म दर के दीर्घकालिक आर्थिक प्रभावों की भरपाई कर सकता है। शोध बताता है कि शिक्षा में निवेश न केवल पेंशन के बोझ को कम करता है, बल्कि कामकाजी वर्षों को बढ़ाता है। घटती प्रजनन दर के दौर में शिक्षा में किया गया निवेश, नागरिकों के स्वास्थ्य और कल्याण को बेहतर बनाने की क्षमता रखता है। साथ ही कम प्रजनन दर वाले देशों में घटती कार्यबल के कारण उत्पन्न आर्थिक चुनौतियों को भी कम करता है।
निश्चय ही भारत की गिरती प्रजनन दर एक उपलब्धि है, लेकिन यह एक कठिन परीक्षा भी है। ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ की खिड़की धीरे-धीरे बंद हो रही है। निर्भरता अनुपात गड़बड़ा रहा है। प्रजनन दर में क्षेत्रीय असंतुलन गहरा रहा है। इन सब से पार पाने का एक ही रास्ता है-मानव संसाधन के विकास के लिए ऐसी नीतियां अपनार्इं जाएं, जो क्षेत्रीय आवश्यकताओं और आकांक्षाओं के अनुरूप हों।

