
सुदर्शन सोलंकी
हिमालय सरीखे नए पहाड़ों में बढ़ रहे हिमस्खलन बड़े संकटों की वजह बनते जा रहे हैं। कमाल यह है कि इन हिमस्खलनों को भुगतकर नवनिर्माणों पर कड़ाई से रोक लगाने की बजाए इन्हें विकास कहा जा रहा है और भारी-भरकम निवेश की मार्फत उन्हें और बढ़ाया जा रहा है। हिमस्खलन को ही देखें तो क्या होते हैं, उनके नतीजे?
कुछ दिन पहले उत्तराखंड के चमोली जिले में हिमस्खलन के कारण ‘सीमा सड़क संगठन’ (बीआरओ) के 54 श्रमिक फंस गए थे, जिनमें से 8 की मौत हो गई थी। पहाड़ी क्षेत्रों में हिमस्खलन की घटनाएं होना कोई नई बात नहीं है, लेकिन कुछ ही समय में बार-बार होने वाली ये घटनाएं हमें चिंतित करती हैं। हर वर्ष होने वाले हिमस्खलन के कारण कई लोगों की मौत हो जाती है। हिमस्खलन से दुनिया भर के पहाड़ी क्षेत्रों में मानव सुरक्षा और बुनियादी ढांचे को काफी खतरा है। हालाँकि हिमस्खलन वनस्पतियों और जीवों के लिए आवास बनाकर और उन्हें संशोधित करके महत्वपूर्ण पारिस्थितिक परिवर्तन के चालक के रूप में भी कार्य करता है।
हिमस्खलन ने कई लोगों की जान ली है, खासकर पहाड़ी युद्ध में। 216 ईसा पूर्व, हैनिबल ने यूरोप के आल्प्स पर्वत को पार करते समय हिमस्खलन और ठंड के कारण 20,000 सैनिकों को खो दिया था। 1951 में यूरोपीय आल्प्स में ही बीसवीं सदी की सबसे विनाशकारी सर्दियों के दौरान, हिमस्खलन ने 900 इमारतों को नष्ट कर दिया था और 256 लोगों की मौत हो गई थी। सन् 1979 में भारत में, लाहौल घाटी में हिमस्खलन की एक श्रृंखला ने 200 लोगों की जान ले ली थी। सन् 2012 और 2015 में, हिमस्खलन की एक श्रृंखला ने कई गांवों को नष्ट कर दिया था और अफगानिस्तान में लगभग 400 लोगों की जान ले ली थी। वर्ष 2014 में ‘माउंट एवरेस्ट’ के चढ़ाई मार्ग पर नेपाल में खुंबू हिमपात में हिमस्खलन हुआ, जिसमें 16 लोगों की मौत हो गई।
हिमस्खलन की गतिशील प्रक्रियाओं को बेहतर ढंग से समझने के लिए ‘हिम और हिमस्खलन परियोजना, परिमाण और आवृत्ति’ का अध्ययन करने के विभिन्न तरीकों का उपयोग किया जाता है। हिमस्खलन गड़बड़ी की समझ और पूवार्नुमान क्षमताओं को आगे बढ़ाकर, वैज्ञानिकों का लक्ष्य मनुष्यों के लिए खतरे को कम करना और हिमस्खलन की पारिस्थितिक भूमिका को पूरी तरह से समझना है। हिमस्खलन पर पहाड़ों से बर्फ तो गिरती ही है साथ ही मलबा, बोल्डर आदि भी गिरने लगते हैं जो कि काफी दूरी तक नुकसान पहुंचाते हैं। यह पहला मौका नहीं है, जब हिमालयी क्षेत्र में हिमस्खलन से इस तरह की घटना हुई है।
हिमस्खलन किसी ढलान वाली सतह पर तेजी से बर्फ (हिम) के बड़ी मात्रा में होने वाले बहाव को कहते हैं। यह सामान्यत: किसी ऊंचे क्षेत्र में उपस्थित हिमपुंज में अचानक अस्थिरता के कारण शुरू होते हैं। शुरू होने के बाद यह ढलान पर नीचे जाता हुआ हिम तेज गति पकड़ने लगता है जिससे इसमें बर्फ़ की और अधिक मात्रा शामिल हो जाती है। स्लैब हिमस्खलन बर्फ के द्रव्यमान की गति और बल तथा कभी-कभी हिमस्खलन से पहले होने वाली हवा के झोंके के कारण विशेष रूप से शक्तिशाली और विनाशकारी हो सकते हैं।
हिमपुंज में अस्थिरता होने के कई कारण हो सकते हैं। सम्भव है कि ढलान के ऊपर हिम की मात्रा इतनी बढ़ गई हो कि वह खिसकने की सीमा पर हो और इस स्थिति में उस पर वर्षा या और हिमपात हो जाए। बम विस्फोट और भूकंप से भी हिमस्खलन हो सकता है। हालाँकि इस तरह की घटनों का मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियर का पिघलना, पानी का दबाव संचय, भूस्खलन या भारी हिमपात आदि होते हैं। इनसे हिमालय ही नहीं पूरे विश्व के ग्लेशियरों को भी बड़ा खतरा है।
आबादी वाले क्षेत्रों और परिवहन मार्गों को प्रभावित करने वाली हिमस्खलन दुर्घटनाएँ अभी भी कुछ एशियाई और दक्षिण अमेरिकी देशों में आम हैं। जब पीड़ित पूरी तरह से दब जाते हैं, तो उनमें से आधे से भी कम जीवित बचते हैं। यदि उन्हें लगभग 35 मिनट के भीतर नहीं निकाला जाता है, तो पीड़ित ज्यादातर श्वासावरोध (लगभग 70%) से मर जाते हैं, क्योंकि ऊपरी वायुमार्ग में रुकावट होती है या चेहरा अभेद्य बर्फ से घिरा होता है। उच्च घनत्व वाले हिमस्खलन मलबे में मरने की संभावना अधिक होती है।
हिमालयी क्षेत्र में बर्फ की चट्टानें खिसकने की घटनाएं होती रही हैं, किन्तु पिछले एक दशक में इसकी आवृत्ति बढ़ी है, यह चिंता का विषय है। पहाड़ी इलाकों में जिस तरह मानव हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा है और प्रकृति को नुकसान पहुंचाया जा रहा है उससे तो लगता है कि इस तरह की आपदाओं की आवृत्ति और अधिक बढ़ती जाएगी जिसके गंभीर परिणाम हमें भुगतने होंगे। दूसरी ओर, वित्तीय, तकनीकी और पारिस्थितिक कारणों से, हिमस्खलन के खिलाफ शत-प्रतिशत सुरक्षा प्रदान करना कभी भी संभव नहीं होगा, किन्तु यदि हम प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर विकास करें, जलवायु परिवर्तन व वैश्विक तापमान को कम कर सकें तो काफी हद तक इस तरह की आपदाओं से निजात पाने में सफल हो सकेंगे।

