Saturday, March 14, 2026
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बारिश का पानी भी नही रहा शुद्ध

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बादलों को पीने योग्य पानी के लिए सबसे उपयुक्त स्रोत माना जाता है। यही वह अहम वजह है कि वर्षा जल के संचय पर सर्वाधिक बल दिया जाता है ताकि उससे भूजल भरण हो सके और उससे प्राणी मात्र के पीने के पानी के साथ साथ उसकी दैनिक उपयोग की दूसरी जरूरतें भी पूरी की जा सकें। लेकिन अब उसी वर्षा के जल की शुद्धता पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। अभी तक हमारे वायुमंडल और खान-पान की वस्तुओं में कीटनाशकों की मौजूदगी चर्चा का विषय थी जिससे जीवमात्र के लिए खतरा पैदा हो गया था। हालिया अध्ययनों ने यह साबित कर दिया है कि वायुमंडलीय ऐयरोसोल, हवा में मौजूद छोटे-छोटे कणों में भी कीटनाशक पाए गए हैं। ये ट्रोपोस्फेयर में भी पाए गए हैं। यह पृथ्वी के वायुमंडल की पहली परत है जो धरती की सतह से एक से दो किलोमीटर की ऊंचाई से शुरू होती है। अब तो नए-नए अध्ययनों में यह खुलासा हो रहा है कि अब बादल भी जहरीली धातुओं, प्लास्टिक और माइक्रोप्लास्टिक सहित कीटनाशकों से भरे पड़े हैं। बादलों में इनकी मौजूदगी खतरनाक संकेत तो हैं ही, इसने वैज्ञानिकों की चिंता और बढ़ा दी है कि बादलों में मौजूद ये जहरीले तत्व और कीटनाशक बारिश की बूंदों के साथ हरेक चीज पर बरस रहे हैं और उसे प्रदूषित कर रहे हैं, ये मानव जीवन के लिए बड़ा खतरा बन रहे हैं। इसका खुलासा फ्रांस और इटली के वैज्ञानिकों के संयुक्त अध्ययन और कोलकता स्थित भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान के अध्ययन में हुआ है।

गौरतलब है कि 1990 के दशक में भी बारिश के पानी में कीटनाशकों की मौजूदगी का अध्ययन किया गया था जिसमें जर्मन वैज्ञानिक फ्रांस ट्राटनर की टीम को बादलों में मौजूद अट्राजाइन हबीर्साइड का पता लगा था लेकिन तब उसमें उनको इनकी मात्रा का पता नहीं चल सका था। बाद में इस रसायन जो मक्का के खेतों में इस्तेमाल किया जाता था, पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। हालिया अध्ययन में बादलों और बारिश के पानी के नमूनों में 32 प्रकार के कीटनाशकों की मौजूदगी मिली है। खासियत यह है कि इस अध्ययन में जिन कीटनाशकों की मौजूदगी मिली, उन पर योरोप में पिछले एक दशक से प्रतिबंध लगा हुआ है।

अध्ययन के अनुसार ये बादल 10 से 50 माइक्रोमीटर आकार की बूंदों से बनते हैं। बादल कैमिकल रियेक्टर का काम करते हैं। सूर्य की किरणों से मिलकर बादलों में फोटो कैमिकल प्रतिक्रिया होती है। इसके चलते कीटनाशकों का स्वरूप बदल जाता है। बारिश के पानी के एक तिहाई नमूनों में कीटनाशकों की मात्रा पीने के पानी के लिए निर्धारित मानक से ज्यादा पायी गयी है। अध्ययकर्ता फ्रांस के क्लोरमाट ओवेंगे यूनिवर्सिटी के रसायनशास्त्री एंजोलेका बियान्को का कहना है कि इस मुद्दे पर अभी और अध्ययन किये जाने की जरूरत है ताकि नयी जानकारियां सामने आ सकें। साथ ही कीटनाशकों का इस्तेमाल कम किये जाने हेतु जागरूकता बढ़ाने की भी बेहद जरूरत है।

यह भी कटु सत्य है कि बादलों में अरबों टन पानी होता है जो धरती पर बरसता है। जहां तक कीटनाशकों का सवाल है, वह हरेक जगह वह चाहे नदी हो, झील हो या भूजल हो, बारिश का पानी हो या फिर खान-पान की वस्तु हो, में पाये जाते हैं। अध्ययनों में कीटनाशकों के एक नये ठिकाने का भी पता चला है। वायुमंडल की गतिशीलता की वजह से प्रदूषण से संपर्क में न रहने वाली जगह, जैसे ध्रुवीय क्षेत्रों में भी अब कीटनाशकों की पहुंच हो गयी है।

जहां तक हिमालय के बादलों का सवाल है, कोलकाता के भारतीय विज्ञान एवं शिक्षा अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों के मुताबिक देश के पश्चिमी घाट और हिमालय के बादलों में कैडमियम, क्रोमियम, तांबा और जस्ता समेत करीब 12 जहरीली धातुएं पायी गयी हैं। बादल प्रदूषित निचले इलाकों से जहरीली धातुओं को चुपचाप लेकर पृथ्वी के सबसे ऊंचे और नाजुक पारिस्थितिकीय तंत्र तक पहुंचा रहे हैं। पश्चिमी घाट की तुलना में पूर्वी हिमालय के बादलों में प्रदूषण का स्तर डेढ गुणा ज्यादा था। इसके पीछे सिंधु-गंगा के मैदान से होने वाला औद्योगिक और शहरी प्रदूषण का योगदान सर्वाधिक है। इन इलाकों से निकलने वाले कैडमियम, कापर और जिंक जैसी धातुओं का भार 40 से 60 फीसदी बढ़ गया है। बादलों के विश्लेषण में सोडियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम पाये गये हैं।महाबलेश्वर के बादलों में इनकी मौजूदगी औसतन 4.1 मिलीग्राम प्रति लीटर थी जबकि दार्जिलिंग के बादलों में इनकी मौजूदगी 2 मिलीग्राम प्रति लीटर थी। दार्जिलिंग के बादलों में लोहा, जस्ता, तांबा, निकिल, कैडमियम और क्रोमियम जैसी सूक्ष्म धातुओं की मौजूदगी ज्यादा मात्रा में मिली है। इन अध्ययनों से पर्यावरण प्रदूषण के प्रति सामूहिक जागरूकता में बढ़ोतरी तो हुई है, लेकिन इनके खतरों को नजरंदाज करना मानव जीवन के अस्तित्व के लिए भयावह चुनौती होगी। इसके लिए सतर्कता और बचाव के उपाय अभी से करने होंगे। अन्यथा इसकी भरपाई करना मुश्किल हो जाएगा।

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