
अपनी हिन्दी में एक अनूठा, कहना चाहिए, कालजयी गीत है, विप्लव-गीत : ‘कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ, जिससे उथल-पुथल मच जाये!’
आजादी की लड़ाई के दौरान स्वतंत्रता सेनानी और साहित्यकार स्मृतिशेष बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ की लेखनी से निकला यह गीत आज भी कहीं गूंजता है तो सुनने वालों की भुजाएं फड़कने लगती हैं और उमंगों व उड़ानों का कोई पारावार नहीं रह जाता। लेकिन हमारी आज की पीढ़ी के ज्यादातर सदस्यों को शायद ही मालूम हो कि ‘नवीन’ ने इसे रचा तो भीषण मोहताजी के शिकार थे। उनके सामने पापी पेट का सवाल तो मुंह बाये खड़ा ही रहता था, तन ढकने के लिए साल में दो धोतियां भी नहीं जुड़ पाती थीं और पैबंदों से काम चलाना पड़ता था। ऐसे में उन्होंने इस गीत की आगे की पंक्तियों में नभ का वक्षस्थल फट जाने और तारों के टूक-टूक हो जाने की मनौती मानी तो समझा जा सकता है कि उन्हें इससे कम पर अपने हालात बदलने की कोई उम्मीद कतई नजर नहीं आई होगी।
प्रसंगवश, उनका जन्म 8 दिसंबर, 1897 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर राज्य के शाजापुर परगने के भयाना गांव में एक अत्यंत विपन्न वैष्णव ब्राह्मण परिवार में हुआ था। पिता जमनालाल शर्मा वैष्णवों के प्रसिद्ध तीर्थ नाथद्वारा में रहते थे, लेकिन अभाव व विपन्नता ने इस परिवार को ऐसा घेर रखा था कि मजबूर माता को बालकृष्ण को गायों के बाड़े में जन्म देना पड़ा था। बाद में भी आजीविका हीनता के चलते वे आस-पास के किसी समृद्ध परिवार में पिसाई-कुटाई करके ‘कुछ’ ले आतीं तो पहले बालकृष्ण का, फिर उनका पेट भरने की जुगत हो पाती।
ऐसे में भला वे बेटे की पढ़ाई-लिखाई की व्यवस्था कैसे करतीं? फिर भी बालकृष्ण ने किसी तरह पहले शाजापुर से मिडिल स्कूल की, फिर उज्जैन जाकर हाईस्कूल की परीक्षा पास की। तब तक भीषण गरीबी के बावजूद उनके तन-मन भारत माता को स्वतंत्र कराने की उमंग से ऐसे सराबोर हो चले थे कि किसी अखबार में दिसंबर, 1916 में लखनऊ में कांग्रेस का महाधिवेशन होने की खबर पढ़ी तो जैसे-तैसे कुछ पैसे जुटाये और कंधे पर कंबल व हाथ में लाठी लेकर नंगे पैर ही उसमें शामिल होने चल पड़े। हालांकि तब तक उन्होंने लखनऊ का नाम भर ही सुना था और उसका ‘इतिहास-भूगोल’ उन्हें कतई पता नहीं था।
जैसे-तैसे लखनऊ पहुंचे तो सबसे ज्यादा खुश तब हुए जब महाधिवेशन में उनका अपने चहेते नायकों लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और गणेश शंकर विद्यार्थी के साथ माखनलाल चतुर्वेदी व मैथिलीशरण गुप्त जैसी विभूतियों से परिचय और उनका सान्निध्य प्राप्त हुआ। वहां से लौटे तो उज्जैन से अपनी अगली परीक्षा उत्तीर्ण की, फिर ‘प्रताप’ के यशस्वी सम्पादक गणेशशंकर विद्यार्थी से बात करके कानपुर चले गए। वहां विद्यार्थी जी ने उन्हें क्राइस्ट चर्च कॉलेज में प्रवेश तो दिलाया ही, बीस रुपये महीने का एक ट्यूशन भी दिला दिया। ताकि उनकी गुजर-बसर में कोई बाधा न आये। बाद में राजनीति, इतिहास, दर्शन, धर्म, संस्कृत, अंग्रेजी और हिन्दी साहित्य के गम्भीर अध्ययन में रत होने के साथ वे ‘प्रताप’ के संपादन में भी उनका हाथ बंटाने लगे। उनकी मेहनत रंग लाई और थोड़े ही दिनों में उन्होंने राजनीतिक व साहित्यिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण स्थान बना लिया और कवि के रूप में खासे प्रसिद्ध हो गये। उनके एक गीत की ‘कवि, कुछ ऐसी तान सुनाओ, जिससे उथल-पुथल मच जाए’ पंक्ति तो लोगों का कंठहार ही बन गयी।
महात्मा गांधी के प्रति अपार श्रद्धा रखने के कारण उनके समकालीन साहित्यकार व पत्रकार, जिनमें कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ का नाम प्रमुख था, उन्हें ‘गांधी जी का मजनू’ कहा करते थे। स्मृतिशेष गणेशशंकर विद्यार्थी का स्मारक बनाने के लिए गठित निधिसंग्रह समिति का सारा जिम्मा भी उन्हीं के कंधों पर था। गांधी जी ने ‘हरिजन सेवक’ में लोगों से इस निधि में रकम भेजने का अनुरोध करते हुए लिखा था-‘जिस सम्पदा का संरक्षक बालकृष्ण हो, उसके बारे में सोच-विचार क्या!’ इसी बात से पता चलता है कि वे उन पर कितना विश्वास करते थे।
साहित्य की दुनिया की बात करें तो ‘नवीन’ को हिंदी कविता में छायावाद के समानांतर बहने वाली उस काव्यधारा का प्रतिनिधि कवि माना जाता है, जिसमें वीरता, प्रेम व श्रृंगार के अतिरिक्त राष्ट्रीयता व मानवीयता के स्वर प्रवाहित हैं। उनकी कृतियों में ‘उर्मिला’, ‘कुमकुम’, ‘रश्मिरेखा’, ‘अपलक’, ‘क्वासि’ और ‘विनोबास्तवन’ महत्वपूर्ण हैं। लेकिन उनके सिलसिले में साहित्य सृजन से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि उन्होंने साहित्य व स्वतंत्रता की एक साथ, अद्वितीय व बहुमुखी सेवा करते हुए न सिर्फ अपना घर-बार बल्कि पढ़ाई-लिखाई वगैरह भी होम कर डाली।
गरीबी की आंच में तपकर निकले होने के कारण कई बार लोग उन्हें गुदड़ी का लाल भी कहते, लेकिन अपनी गरीबी और उसकी जाई तकलीफों को लेकर उनके मन में कोई ग्रंथि नहीं थी। न ही कभी वे धन संग्रह के फेर में पड़े।

